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कल्याण सिंह जिन्हें बगावत के बाद भी मिला सम्मान!

 
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
लंबे समय तक जीवन मृत्यु के बीच संघर्ष करते हुए आखिरकार कल्याण सिंह मौत से मात खा गए।रक्षा बंधन से एक दिन पहले शाम के समय वे इस दुनिया से अलविदा हो गए।उनके निधन पर उत्तर प्रदेश ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया तो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, नेताप्रतिपक्ष समेत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके निधन को अपूर्णनीय क्षति बताया।उनको भाजपा के वरिष्ठ नेता के रूप में सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।लेकिन उनका अपनी महत्त्वाकांक्षा और बगावत से भी गहरा नाता रहा है।अपनी हिंदूवादी छवि और बढ़ते वर्चस्व के बीच वे अटलबिहारी वाजपेयी जैसे बड़े नेता से भी स्वयं को बड़ा मानने लगे थे।जो उनके राजनीतिक हाशिये का कारण भी बनी।
 बात समय की है जब नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक हुआ करते थे।राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उन्हें कल्याण सिंह से मिलने और कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर बातचीत करने के लिए भेजा।मिलने के लिए समय मांगने पर कई दिनों बाद कल्याण सिंह ने उन्हें मिलने का समय दिया, वह भी अकेले में नही बल्कि उन्ही के साथ कुछ अन्य लोगों को भी वही समय दिया गया। नरेंद्र मोदी ने अकेले में बात करने को कहा तो उन्होंने मना कर दिया था। नरेंद्र मोदी ने कुसुम राय का मामला उठाया, तो उन्होंने उसे बेहद अनमने ढंग से लिया और उनके सामने ही अटल बिहारी वाजपेयी के लिए अच्छी भाषा का प्रयोग नही किया।”हालांकि सन 2004 में कल्याण सिंह की जब बीजेपी में वापसी हुई तो उसका श्रेय भी अटल बिहारी वाजपेयी को ही जाता है।भाजपा के तत्कालीन वरिष्ठ नेता प्रमोद महाजन ने उनको भाजपा में पुनः शामिल कराने के लिए कोशिश की थी, जिसपर कल्याण सिंह भाजपा में दोबारा शामिल हो पाए। भाजपा ने सन 2007 का विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा लेकिन कोई ख़ास सफलता नहीं मिल पाई।भाजपा छोड़ने के बाद कल्याण सिंह ख़ुद भी लगभग अवसाद की हालत में आ गए थे। भाजपा के बहुत ही कम लोगों ने उनके साथ पार्टी छोड़ी थी और बाद में उनमे से भी कुछ किनारा कर गए थे।जिसकारण उनके साथ बहुत कम लोग रह गये। सन 2009 में कल्याण सिंह एक बार फिर भाजपा से नाराज़ होकर पार्टी से बाहर चले गए थे।उन्होंने समाजवादी पार्टी से भी अपनी नज़दीकियाँ बढ़ाईं और उन्होंने समाज वादी पार्टी की मदद से  एटा लोकसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव भी जीत लिया था, लेकिन कल्याण सिंह के इस साथ ने समाजवादी पार्टी को काफ़ी नुक़सान पहुँचाया ,जिस कारण समाजवादी पार्टी  ने उनसे दूरी बना ली थी।सन 2010 में पाँच जनवरी को कल्याण सिंह ने जन क्रांति पार्टी नाम से एक नई पार्टी बनाई और अपने बेटे राजबीर सिंह को पार्टी का अध्यक्ष बना कर एक नई शुरूआत करने की कौशिश की।सन 2012 में उनकी पार्टी ने विधानसभा चुनाव भी लड़ा लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।जिसपर सन 2013 में कल्याण सिंह एक बार फिर भाजपा में शामिल हो गए और सन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में  प्रचार किया। जिसका इनाम  सन2014 में ही राजस्थान का राज्यपाल बनाकर दिया गया।
राज्यपाल का कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्होंने एक बार फिर भाजपा की सदस्यता ली, लेकिन उसके बाद भाजपा ने उन्हें कोई ज़िम्मेदारी नहीं दी।हालांकि उनके बेटे राजवीर सिंह इस समय सांसद हैं, तो पोते संदीप सिंह उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के मंत्री हैं।छह दिसंबर सन 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस होने के बाद कल्याण सिंह सरकार बर्ख़ास्त हो गई थी। जिसके बाद उत्तर प्रदेश में उस समय कमण्डल की राजनीति भारी पड़ी और भाजपा को सत्ता में वापस आने के लिए पाँच साल तक संघर्ष करना पड़ा।
सन 1997 में कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के दोबारा मुख्यमंत्री बन गए थे लेकिन इस बार वे पहले जैसी छाप नहीं छोड़ पाए।इस बार वे  मात्र दो साल ही मुख्यमंत्री रह पाये और उनकी पार्टी भाजपा ने ही उन्हें हटाकर दूसरा मुख्यमंत्री बना दिया था।भाजपा नेतृत्व से उनके मतभेद इतने अधिक बढ़ गये थे कि कल्याण सिंह ने  भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था और उसके  बाद में उन्होंने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बना ली थी। 30 अक्टूबर, सन 1990 को मुलायम सिंह यादव के उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाई गई, जिसमें कई कारसेवकों की मौत हो गई थी। भाजपा ने मुलायम सरकार का मुक़ाबला करने के लिए कल्याण सिंह को आगे किया था।उस कड़े संघर्ष के बाद कल्याण सिंह ने मात्र एक साल में भाजपा में जान फूंक दी। जिसपर  सन 1991 में भाजपा की उत्तर प्रदेश में  पूर्ण बहुमत की सरकार बन गई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बन गए। मुख्यमंत्री बनते ही कल्याण सिंह ने अयोध्या का दौरा किया और राम मंदिर निर्माण की शपथ ली ।भारतीय जनता पार्टी का सन 1980 में गठन हुआ था। कल्याण सिंह को नवगठित भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश महामंत्री बनाया गया था।सन 1980 के विधानसभा चुनाव में कल्याण सिंह को हार का सामना भी करना पड़ा था।अलीगढ़ ज़िले की अतरौली तहसील के मढ़ौली गाँव में पाँच जनवरी सन 1935 को एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कल्याण सिंह बचपन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य बन गये थे।उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अध्यापक की नौकरी की और राजनीति भी करते रहे।कल्याण सिंह ने  हिन्दूवादी नेता के तौर पर उस समय अपनी राजनीति की शुरुआत की थी, जब उत्तर प्रदेश से लेकर पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व था।सन 1967 में जनसंघ के टिकट पर अतरौली सीट से उन्होंने पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीत कर विधायक बने।  जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया और सन 1977 में उत्तर प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनने पर उन्हें राज्य का स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया।कल्याण सिंह अपनी राजनीतिक यात्रा में पहले जनसंघ ,फिर जनता पार्टी और फिर भारतीय जनता पार्टी के नेता के तौर पर  विधायक से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे और बाद में राजस्थान के राज्यपाल भी बने, लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उनकी हिन्दूवादी नेता की छवि को तो धूमिल किया ही, राजनीति में असमय ढलान का कारण अतिमहत्त्वाकांक्षा ही रही।फिर भी उन्हें अंतिम समय तक वह सम्मान मिला जिसके वे हक़दार थे।(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
पोस्ट बॉक्स 81,रुड़की,उत्तराखंड
मो0 9997809955

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