Fri. Jul 10th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

थापथली स्थित परोपकार प्रसूति गृह और स्त्री रोग अस्पताल में ‘प्री-नेटल स्क्रीनिंग टेस्ट’ 

 

 

नेपाल के किसी सरकारी अस्पताल ने पहली बार ‘प्री-नेटल स्क्रीनिंग टेस्ट’ की तकनीक शुरू की है। थापथली स्थित परोपकार प्रसूति गृह और स्त्री रोग अस्पताल द्वारा लाए गए ‘प्री-नेटल स्क्रीनिंग टेस्ट’  में यह पता चलेगा कि मां के गर्भ में पल रहे बच्चे को आनुवंशिक समस्या तो नहीं है यह जानकारी अस्पताल की निर्देशक डा. संगीता मिश्रा ने दी है ।

अगर हम दुनिया में विभिन्न शारीरिक समस्याओं के साथ जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या को देखें तो यह एक भयावह स्थिति लगती है। अध्ययनों से पता चला है कि अनुमानित 7.9 मिलियन नवजात शिशु हर साल किसी न किसी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या के साथ पैदा होते हैं। अध्ययन के अनुसार, इनमें से लगभग 30 लाख बच्चे मर जाते हैं और 32 लाख बच्चे दीर्घकालिक विकलांगता से पीड़ित होते हैं।

यह भी पढें   नई सरकार हालात पुराने - टूटते युवाओं के सपने : कंचना झा

बच्चों में जन्म दोष और उसके परिणामों पर लगभग 10 महीने पहले किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि नेपाल में हर 1,000 लोगों में से औसतन 5.8 लोगों को किसी न किसी तरह की जन्मजात शारीरिक समस्या है। बीएमसी जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में पाया गया कि समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में यह समस्या होने की संभावना अधिक होती है। अस्पताल का कहना है कि प्रौद्योगिकी इन समस्याओं को हल करने में भी मदद करेगी। प्रसव पूर्व जांच में एक स्क्रीनिंग और दूसरा डायग्नोस्टिक टेस्ट भी शामिल है। स्क्रीनिंग टेस्ट केवल बच्चे को कितना जोखिम है यह जानने के लिए किया जाता है । डायग्नोस्टिक टेस्ट से बच्चे में कौन सी बीमारी दिखाई देती है यह पता चलता है ।  डॉ मिश्रा का कहना है कि, ”अगर गर्भ में कोई बच्चा हाई रिस्क में पाया जाता है, तो उसे आखिरकार डायग्नोस्टिक टेस्ट दिया जाता है.” गर्भपात के जोखिम के कारण, शुरुआत में नैदानिक ​​परीक्षण नहीं किए जाते हैं।

यह भी पढें   हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव पर रक्सौल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भव्य पथ संचलन

गर्भावस्था के दौरान दो बार प्रसव पूर्व जांच की जाती है। पहला परीक्षण गर्भावस्था के 10 से 13 सप्ताह के बीच किया जाता है। यह पहला परीक्षण 10 से 13 सप्ताह के बीच किया जाता है। इसमें ब्लड टेस्ट होता है। तीन प्रकार के डबल मार्कर, ट्रिपल मार्कर और चौगुनी मार्कर हैं। इसके साथ ही अल्ट्रासाउंड भी किया जाता है। इन दोनों को एक साथ रखने पर किसी प्रकार के अनुवांशिक रोग होने की क्या सम्भावना है? यह पता लगाने में मदद करता है। यह स्पष्ट तो  नहीं बताता है लेकिन इससे पता चलता है कि कौन से भ्रूण अधिक जोखिम में हैं और कौन से कम हैं।

यह भी पढें   बाल मंदिर गबन प्रकरण... तीन लोग हिरासत में

इसी तरह दूसरा टेस्ट 18 से 22 सप्ताह के बीच किया जाता है। चूंकि इस समय तक बच्चे की शारीरिक रचना तैयार हो जाती है, परीक्षण किसी भी समस्या का पता लगा सकते हैं। “इस दौरान हम देखेंगे कि क्या बच्चे के अंग अच्छी तरह से तैयार हैं,” डॉ। मिश्रा कहते हैं, ‘यदि कोई अंग बनता है, तो उसका विकास क्या है? अंगों की शारीरिक संरचना क्या है? प्रसव पूर्व जांच को वैज्ञानिक भाषा में दोहरा परीक्षण, तिहरा परीक्षण और चौगुना परीक्षण भी कहा जाता है।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *