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अँधेरे में डूबते हुए रिश्तों के खौफ, अकेलेपन और दर्द में यूँ कैसे बदल गए? :प्रतिभा राजहंस

 

 

क्यों?

कल तक जानी-पहचानी
आज क्यों और कैसे
यह दुनिया अनजानी हो गई
रिश्तों की खुशबू और कशिश
हुईं क्यों अपमान और दबिश

अँधेरे में डूबते हुए
रिश्तों के खौफ
अकेलेपन और दर्द में
यूँ कैसे बदल गए?

यह अदल- बदल
यह अपनत्व का दलदल
कितना गिजगिजा
कितना बदबूदार
कितना लिजलिजा
और उबाऊ

क्यों मुझे बार-बार
एहसास दिलाता है
कि यह जीवन का
रास्ता ही है अभी भी
मंजिल नहीं

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बस
पड़ाव- दर – पड़ाव
ये ही मिलते हैं मुझे

क्यों नहीं थकाते
और ऊबाते हों
पीठ पर पड़ी
चाबुक की मानिंद
मुझे हाॅंफते-हाॅंफते भी
दौड़ते रहने को दबाते हों

थकते पाॅंव
दुखने लगे हैं
जोड़ -जोड़
पोर- पोर
टूटने लगे हैं
साॅंसें रह – रह
टूट- टूट जाती हैं
उम्र का यह पड़ाव
अधिक भारी
क्यों होता जाता है

किससे पूछूँ
कौन बतलाए
कौन प्यार करे
कौन सहलाए
कोई नहीं कहीं नहीं
क्यों मैं ही
निपट अकेली रह गई.

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1 thought on “अँधेरे में डूबते हुए रिश्तों के खौफ, अकेलेपन और दर्द में यूँ कैसे बदल गए? :प्रतिभा राजहंस

  1. एक महिला बनाकर स्त्री बने रहने की आकांक्षा में व्यथित होता मन, उसकी टूटन, उसकी विडंबना को शब्द दिया है । अच्छी रचना

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