गणतंत्र हेतु व्यक्तित्व पहचान : अजय कुमार झा
अजय कुमार झा, हिमालिनी अंक जुलाई।नेपाल के राजनीतिक पाठयपुस्तक में जो पाठ्यक्रम डाला जाता है, उसकी आधार भूमि भारत में है । आज फिर एकबार बालेन और हर्क जैसे इमानदार छवि ने नेपाली राजनीति के पाठ्यक्रम को संशोधन करने के लिए बाध्य क र दिया है । आज से आठ वर्ष पहले भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध, ‘अन्ना हजÞारे और बाबा रामदेव के आंदोलन ने जहां एक ओर स्थापित राजनीति के खोखलेपन को उजागर किया वही एक विकल्प की अनिवार्यता को भी आम नागरिकों के अंतःकरण में स्थापित किया था । वास्तव में देश को मात्र राजनीतिक विकल्पों की ही नहीं एक वैकल्पिक राजनीति की तलाश है । ’ उस वैकल्पिक राजनीति की तलाश करने के लिए हमें अँधेरे में लालटेन लेकर निकलने की जÞरूरत नहीं है । देश भर में सदाचारी राजनीति के लिए जनता के व्याकुल नयना जिसे तलाश रहे हैं, वो हमारे भीतर ही कहीं छुपा है । हमारे इर्द–गिर्द ही हमारी आह्वान की प्रतीक्षा कर रहा है ।
हमारी उदारता और सहानुभूति पूर्ण दृष्टिपात का इंतजार कर रहा है । बस, देरी हमारी आंखों पर जमे वर्षो के संघ, संगठन, दल, राजनीति, बाद, सिद्धांत, जात, पात, धर्म, क्षेत्र, प्रदेश और षडयंत्र रूपी धूल को साफ करने की है ।
नेपाल में वैकल्पिक राजनीति के लिए जÞरूरी विचार और उर्जा देश के भीतर जबरदस्त रूप में मौजूद है । मुख्यधारा की राजनीति के बाहर इस देश में अनेकानेक जनसंगठन, जनांदोलन और राजनीतिक संगठन मौजूद हैं । इनमें से अधिकांश संगठन देश के एक छोटे इलाके में सघन काम कर रहे हैं, लेकिन किसी न किसी बड़े समन्वय से जुड़े हैं । ये संगठन अक्सर किसी एक मुद्दे पर आंदोलन चला रहे हैं, लेकिन इनकी दृष्टि व्यापक है । मीडिया की आँखों से ये कार्यकर्ता भले ही ओझल हों, मगर इनका कद वाकई बहुत बड़ा है । देश में वैकल्पिक राजनीति खड़ा करने के लिए जÞरूरत है इन सब कार्यकर्ताओं, आंदोलनों और संगठनों को एक सूत्र में पिरोने की । विडम्बना यह है कि जिस वैकल्पिक राजनीति की तलाश देश को है वो खुद जनता की तलाश में है ।
हमारे सामने होते हुए भी टीवी के पर्दों से ओझल है, अखÞबार के पन्नों से गायब हैं, जनमानस पर दर्ज नहीं होता । लेकिन, हाल ही में सम्पन्न स्थानीय निर्वाचन में आम नागरिकों ने अपनी आंतरिक भावनाओं को जिस तरह प्रकट किया है वह पार्टी और दल तथा समस्त राजनीतिक विचाराधारा को जड़ से खारिज करने का दृढ़प्रतिज्ञा का संकेत करता है । आज नेपाल के राजनीतिक पटल पर सर्वाधिक लोकप्रिय चरित्र के रूप में बालेन हर्क का जोड़ी है । अतः अब हमें मायूस होने की आवश्यकता नहीं है । नेपाल में सक्रिय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों की उर्जा का एक छोटा सा भी अंश जनता को इस वैकल्पिक राजनीति से जोड़ने में लग जाए तो जल्द ही देश में राजनीतिक तूफान आ सकता है ।
युद्ध तथा बाहरी शक्ति से अपनी संस्कृति और राष्ट्र को सुरक्षित रखने के लिए मनुष्य के जीवन में संगठन का बड़ा महत्व है । अकेला मनुष्य शक्तिहीन है, जबकि संगठित होने पर उसमें शक्ति आ जाती है । संगठन की शक्ति से मनुष्य बड़े–बड़े कार्य भी आसानी से कर सकता है । संगठित परिवार, समाज और देश को बाहर के कोई भी दुश्मन कुछ नहीं बिगाड़ सकता, जबकि असंगठित होने पर दुश्मन जब चाहे हम पर हावी हो सकता है । संगठन का प्रत्येक क्षेत्र में विशेष महत्व होता है, जबकि बिखराव हरेक क्षेत्र के लिए घातक सिद्ध होता आय है । परंतु, यदि हम किसी गलत उद्देश्य के लिए संगठित हो रहें हैं तो ऐसा संगठन मानवता के अभिशाप है, और राष्ट्रीय अस्तित्व के घातक । जबकि सृजनात्मक कार्य के लिए संगठन वरदान साबित होता है । प्रत्येक धर्म ग्रंथ संगठन और एकता का संदेश देते हैं । संगठन में प्रत्येक व्यक्ति का विशेष महत्व होता है इसलिए जब मनुष्य संगठित होकर कोई कार्य करता है तो उसके परिणाम में विविधता देखने को मिलती है । जिस तरह प्रत्येक फूल अपनी–अपनी विशेषता और विविधता से किसी बगीचे को सुंदर व आकर्षित बना देते हैं उसी तरह मनुष्य भी अपनी–अपनी विशेषता और योग्यता से किसी भी कार्य को नया आयाम प्रदान कर सकते हैं ।
उपरोक्त विचार आज विश्वमंच पर एक थोथी सिद्धान्त के रूप में मात्र दिखाई देता है । अधिकांश सांगठनिक ढांचा हिंसा और मानवता विरोधी दुश्चक्रों को षडयंत्र पूर्वक सहजीकरण का आधार बनता जा रहा है । ऐसी स्थिति में हमें बाध्य होकर इन संगठनों के वैज्ञानिक विश्लेषण कर आगे बढ़ना चाहिए । मेरे विचार से तो दुनिया से संगठन का नारा ही बंद होना चाहिए । आज के समय में किसी संगठन की कोई जरूरत नहीं है । आज आदमी अकेला इस पूरे संसार को वैचारिक स्तर पर प्रभावित करने के लिए काफी है । आखिरकार विचार ही तो व्यवहार में परिवर्तन होता है न । अतः संगठन की जरूरत क्या है ? आखिर संगठित किस लिए होना है ? हम भौतिक रूप से संगठित होकर भी अपने पड़ोसी देश भारत और चीन के साथ लड़ नहीं सकते ! यदि फिर भी हमें लड़ना है तो संगठन की जरूरत है । नहीं लड़ना है, तो संगठन की क्या जरूरत है ? तो जो भी संगठन हैं, वह सब मानवता के दुश्मन है । चाहे उनके नाम कुछ भी हों । और जो भी संगठन करवाने वाले हैं वह सब मनुष्यता के हत्यारे हैं, चाहे उनके नाम कुछ भी हों । अब तो ऐसे लोग चाहिए जो सब संगठनों को तोड़ देने के, सब संगठनों को विकेंद्रित कर देने के, सब संगठनों को डिआर्गनाइज कर देन के, और एक–एक व्यक्ति को मूल्य देने के पक्ष में हों । संगठन को मूल्य नहीं देना है । एक–एक व्यक्ति को मूल्य देना है । आप–आप हैं । मैं–मैं हूं । किसी सृजनात्मक अथवा उत्पादनमुलक कार्य को सहज ढंग से गतिशील तथा संपादन करने के लिए सांगठनिक स्वरूप दिया जा सकता है । परंतु आइडियालॉजी पर खड़े हुए संगठन दुनिया में नहीं चाहिए । चाहे उनका नाम कुछ भी हो । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता । हम भी तो समाजवाद, लेलिनवाद, गांधीवाद, मार्क्सवाद और माओवाद के संगठन को मजबूत बनाने में अपना समय व्यतीत किए हैं । क्या मिला ? माओवाद के नाम पर इक्कीस हजार नेपाली युवाओं का बलिदान ! समाजवादी संगठन के नाम पर लाखों नेपाली युवा युवती अपनी जीवन के अमूल्य क्षण को विदेशी भूमि में वर्वाद करने को बाध्य हुए । सैकड़ों मधेशी युवाओं को बलिदान देकर मधेशी संगठन ने क्या दिया ? राजा महेंद्र के मधेशी विरोधी मंडले संगठन ने देश को कमजोर और आत्म हत्या के अलावा और क्या दिया ?
इसलिए सावधान रहें ! किसी संगठन ने आज तक मनुष्यता को आगे नहीं बढ़ाया । और न कोई संगठन मनुष्यता को आगे बढ़ा सकता है । रही बात वैचारिक एकता की तो यह भी संभव नहीं है कि किसी विषय पर सभी व्यक्तियों का मत एक जैसा ही हो, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति किसी विषय या समस्या को अपने नजरिये से ही देखता है । और इसी आधार पर उसका समाधान भी खोजता है, लेकिन जब बात सामूहिक समझदारी की आती है तब मनुष्य को वही करना चाहिए जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों का दूरगामी भलाई हो । इसके लिए बृहद संवाद कर शैक्षणिक संस्थानों के पाठ् यक्रम में सृजनात्मक समझदारी के विभिन्न स्वरूप, आयाम, क्रियान्वयन और लाभ को केंद्र में रखकर समाहित करना होगा । आनेवाली पीढ़ी में यह संवाद रूपी समझदारी का संस्कार डालना होगा । आज तो कोई किसी की बात तक सुनने को तयार नहीं है । विरोध करना महानता और बुद्धिमत्ता का प्रतीक बनता जा रहा है । जिसका गंतव्य सामूहिक विनाश ही हो सकता है ।
वैसे आज हम नेपाली जनता भी गणतंत्र का मजा ले रहे हैं । प्रजातंत्र को आए हुए साढ़े तीन दशक पूरा होने लगा है । इन पैंतीस वर्षों में हमारे ऊपर ऋण के भार के अलावा किसी चीज में वृद्धि नहीं हो पाई है । आज हमारा देश कंगाली के अंतिम पायदान पर पहुंच गया है । क्या गणतंत्र का यही परिणाम होना चाहिए ? आखिर हमने गणतंत्र को क्या समझा ? गणतंत्रः– ‘गण’ मूलतः वैदिक शब्द है । इसका अर्थ समूह होता है, जैसे देवगण, मनुष्यगण और राक्षसगण । ऐसेही अंग्रेजी में गन का अर्थ घातक हथियार ’बन्दुक’ होता है । जो शत्रुओं से बचाव और युद्ध में लड़ने के लिए प्रयोग हेतु निर्माण किया गया है । तथा तंत्र का अर्थ प्राणली होता है । किसी भी संघ, संस्था, परिवार अथवा देश को सुव्यवस्थित ढंग से गतिशील तथा संचालित करने के लिए जो विधि का निर्माण किया जाता है; उसे प्रणाली कहते हैं ।
अब सोचने बाली बात यह है कि, हमारे ऊपर कौन सा ‘गण’ शासन कर रहा है ! डेढ़ दशक के राजनीतिक घटना क्रमः– भ्रष्टाचार, हिंशा, न्यायहिनता, लुट–खसोट और सत्य से ध्यान भटकाने हेतु उग्र राष्ट्रवाद का नारा के भठ्ठी में युवाओं झोककर एक पीडादायक अवस्था का सृजना किया गया है, उससे यही प्रमाणित होता है कि अभी राक्षसगण अपनी बन्दुक के बलपर नेपाली जनता के अस्मिता को लूट रहा है ।
आर्थिक और भौतिक रूप से हमें दरिद्र बनाने वाले उग्र राष्ट्रीयता के नाम पर मनोवैज्ञानिक रूप से भी हमें खोखला बनाते जा रहे हैं । और हम उन्हें अपना भाग्य विधाता माने बैठे हैं ।
भारत के बैचारिक सहयोग और भौतिक संरक्षण में पोषित माओवादी जनयुद्ध नेपाल सरकार, संसदिय दलों तथा माओबादी विद्रोहियो के बीच का सत्ता संघर्ष था । सशस्त्र रूपमे किया गया यह युद्ध सन १९९६ से २००६ तक निरंतर चलता रहा । नेकपा माओवादी के द्वारा १ फागुन २०५२ वि सं (१३ फरवरी १९९६) से आरम्भ यह संघर्ष नेपाल के राजतन्त्र की खात्मा और संघीय गणतंत्र की स्थापना हेतु लक्षित था । जो २१ नोभेम्बर २००६ के दिन तत्कालीन सरकार और माओबादी विद्रोहीयो के बीच हुए बृहत शान्ति सम्झौता में पूर्ण हुआ । लेकिन, क्या माओवादीओं ने जिस युद्ध को जनता के भाव से संवोधित कर जन समर्थन पाया था, भारत के द्वारा सुरक्षित राजनैतिक अवतरण संभव हुआ था, अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबन्ध निष्क्रिय हुआ था । क्या उस जन भावना को आज डेढ़ दशक बीत जाने के वाद भी संवोधित करने का प्रयास किया गया है ? क्या सत्ता और शक्ति का सामूहिक सुख नेपाली जनता को मिल पाया है ? इन सबके वावजूद आज सत्ता और शक्ति देउवा, प्रचंड और ओली जी के इर्द गिर्द घूमती दिख रही है । आम नेपाली नागरिक भारत को गाली देकर अपने को शक्ति संपन्न होने का मनोवैज्ञानिक सुख से तृप्त होते दिख रहे हैं । गणतंत्र का परिभाषा उनके लिए इतना ही पर्याप्त है । वैसे भी भैंस के लिए घास फूस ही महा सुखदायक होता है । सायद इस रहश्य को वर्त्तमान राजनीति कर्मी अच्छे से जानते हैं । यही कारण है कि नेपाली नेताओं के बैचारिक स्तर में २००७ साल से लेकर आजतक में कोई खÞास उत्थान नजर नहीं आ रहा है । जिस प्रकार वि.पि. के समाजवाद को और लौह पुरुष गणेशमान जी के त्याग और हार्दिकता को एक भी कांग्रेसी नेताओं ने नहीं समझ पाया, उसी प्रकार साम्यवाद के समता और समत्वभाव को तथा नागरिक के समवेदना को एक भी बामपंथियों ने समझने की कोशिस नहीं की ।
नेपाल के सभी राजनीतिक व्यक्ति और सत्ताधारियों का एक ही आदर्श है; वह है– उग्र राष्ट्रवाद के नामपर आमजन और देसके भविष्य को गर्त में डालते हुए भी व्यक्तिगत विकास और पारिवारिक उन्नति करना । धन और पद के आगे धर्म, संस्कृति और सभ्यता तक को बेचने वालों से सुरक्षित भविष्य का कल्पना करना मूढ़ता का ही प्रतीक है । आज, क्या एक भी नेपाली नागरिक अपनेआप को विश्व के किसी भी देश में गौरव के साथ माओवादी के नामपर शिर उठाके जीने का अनुभव कर पा रहे हैं ? नेपाल के किसी राजनीतिक बिचारक के आदर्श को विश्व पटल पर स्थापित होने का गरिमा से मंडित होने का सौभाग्य मिल पाया है ? इस विश्व मंच में यदि आज नेपाल को जो कुछ गरिमा प्राप्त है वह राजर्षि जनक और सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के कारण है, जिसे नेपाल के तथाकथित माओवादी, मार्कसवादी, समाजवादी और लेलिनवादियों ने इसाइयों के हाथो बेच डाला है । धर्म निरपेक्षता के षडयंत्र तहत ९०% नेपालियो के आत्मा से छल किया गया है । देस के सर्वोच्च व्यक्तियों द्वारा होली वाइन के नामपर आत्मा पतन रस पीना बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग और सम्यक आहार तथा सम्यकता रूपी नेपाली संस्कार का धज्जी उड़ाया गया है । हिन्दू संस्कृति के शिखर अस्तित्व के रुपमे चीर परिचित पशुपति नाथ, स्वर्गद्वारी, जानकी मंदिर, बराह क्षेत्र को नजरअंदाज करना संस्कारगत पतन का द्योतक है । क्या संस्कार है हमारे नेतृत्व वर्ग में कि जिसके कारण आज हमें विश्व में प्रतिष्ठा और पहचान मिल पाए ? वास्तव में हम मूढ़ता रूपी धर्म निरपेक्षता के नामपर योजनाबद्ध तरीके से सामूहिक रूपसे अपनी ही जड़ो को उखाड़ने पर तुले हैं, और खुद को आधुनिक समझ गौरवान्वित समझ रहे हैं । क्या हम इतने दीनहीन और बुद्धू हो गए हैं कि जिसके निर्देस पर क्षणिक लोभ में पÞmसकर हम अपनी धर्म, संस्कृति और सभ्यता को लात मार रहे हैं, वही, वो अपनी धर्म, संस्कृति और सभ्यता का पाँव हमारे यहाँ पसार रहा है, और हमें वोध तक नहीं हो रहा ! जनसाधारण इसबात से वाकिपÞm होते हुए भी खुद को अपने ही चक्रव्यूह में पÞmसा हुआ और मजबूर अनुभव कर रहा है । लोग देख रहे हैं, कि सबकुछ जनता के नामपर ही किया जा रहा है; लेकिन उन्हें बोलने तक का अधिकार नहीं है । यहाँ के अधिकाँश प्रौढ़ नागरिक भोलेभाले हैं और युवावर्ग बेहोश है । ये धूर्त राजनीति कर्मी अपनी तात्कालिक लाभ और सत्ता समरक्षण के लिए इन्हें बड़ी आसानी से अपनी चक्रव्यूह में फसाकर युवाओं के द्वारा ही युवाओं के भविष्य को मटियामेट कराते आरहे हैं । दुर्भाग्य तो तब लगता है, जब देश के भविष्य युवा पुस्ता इन्हें अपना आदर्श और संरक्षक मानकर इनके लिए मरने मारने को उतारू हो जाते हैं ।
तथाकथित बिकाऊ नेपाली बुद्धिजीबी वर्ग क्षणिक लाभ के लिए अपनी ही युवाओं को गुमराह कर सामूहिक आत्महत्या के लिए अपनी कलम को गतिमान कर तात्कालिक वाहवाही लुटने में अपनी काबीलियत समझते हैं । कबीर दास ने कहा है “बुरे बंश कबीर के उपजे पूत कमा ।”
अतः देश के एक भी आम नागरिक, जो किसी भी पार्टी और संस्था के सदस्य नहीं है; उनसे गणतंत्र का स्वाद पूछा जाय, तब जा के पता चलेगा कि लोकतंत्र में लोक का हाल क्या है ! इसके बावजूद निराशा की कोई बात नहीं है । हम बदल सकते हैं; हम बदल रहे हैं; इसका प्रमाण काठमांडू के बुद्धिमान देशभक्त नागरिकों ने वालेन को अपना समर्थन देकर दे दिया है । इस से एक ही तीर से दो काम सहज हो गया है । पहला मधेस और पहाड़ के विशुद्ध नेपाली जनता के बीच का वह दरार जो राजा महेंद्र से लेकर गणतंत्रवादी नेताओं के के द्वारा योजनाबद्ध तरीके से प्रायोजित था, का खात्मा होने लगा है । दूसरा नेपाल के अस्तित्व संरक्षण एवं संवर्धन के लिए गणतंत्र नहीं गणतंत्र के गुणवत्ता और आवश्यकता की पहचान । हमें अब इसी पहचान को पोषित करते हुए आनेवाले समय में पूरी जिम्मेदारियों के साथ सक्रिय भूमिका निर्वाह करना होगा । समाज में दवे छुपे अच्छे व्यक्तियों को सम्मान के साथ राजनीति में सक्रिय भूमिका निर्वाह करने के लिए उत्साहित करना होगा । जैसे चिकित्सक के हाथों का छुरा भी प्राणदायी सिद्ध होता है वैसे ही जब ईमानदार के हाथों में हम अपना बागडोर सौपेंगे तो भविष्य सुंदर होगा ही ।
प्रत्येक समाज में कुछ लोग ईमानदार होते ही हैं । ईमानदारी का भी एक जुनून होता है । कुछ लोग मिल जाएंगे जो भ्रष्टाचारी के बदले कष्ट झेलना पसंद करेंगे लेकिन बेइमानी पर नहीं उतरेंगे । क्या ऐसे लोग आप के समाज में नहीं हैं ? ध्यान रहे ! संसार में सत्य है, ईमानदार है; इसी लिए असत्य और बेईमान भी जिंदा है । एक बस ड्राईभर पर हम विश्वास करते हैं; तब जाकर पूरे परिवार का जीवन उसके हाथों में सौंप देते हैं । परंतु, किसी पागल अथवा नसेड़ी पर हम इतना भरोसा नहीं कर सकतें । अतः हमें इतना तो विश्वास है, कि समाज के सब लोग खरब ही नहीं है । बहुत बड़े बड़े समाजसेवी, त्यागी, महात्मा, योगी आज भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ हमारे बीच उपस्थित हैं । उन्हें पहचान ने के लिए हमें ही एक्टिव होना होगा । क्या योगी आदित्य नाथ इसका सर्वोत्तम उदाहरण नहीं हैं ? जाति, पार्टी, क्षेत्र और सिद्धांत विशेष के आधार पर हम विश्वास करने लायक अच्छे व्यक्तियों को नहीं खोज पाएंगे । ऐसे लोगों का अपना अलग सामाजिक और राजनीति कार्नर होता है । ऐसे लोग अपनी सत्ता बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने में नहीं हिचकते । इस तरह के षडयंत्रों से ही राजनीति भरी पड़ी है । महाभारत, प्रथम और दूसरा विश्वयुद्ध, भारत पाक बड़वारा, सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और जापान का एटम कांड और रूस यूक्रेन युद्ध; मानवता के इतिहास में कलंक का धब्बा ही है । ऐसा कलंक तब लगता है जब हम पागल, उद्दंड, अति लोभी, अति लालची, स्वार्थी, पतित तथा गुंडों के हाथों में राष्ट्रीय शक्ति रूपी सत्ता सौंप देते हैं । क्या कमी थी कृष्ण प्रसाद भट्टराई में ? किसके कहने पर काठमांडू बासी ने उन्हें हराया था ? क्या उसका दुष्परिणाम आज नेपाली जनता, राजनीति और अर्थव्यवस्था को नहीं झेलना पड़ रहा है ? जनता के प्रिय राजा वीरेंद्र के परिवार का सामूहिक हत्या क्या नेपाली के सहयोग बिना संभव था ? क्या उस समय के सरकार से हमने यह प्रश्न किया ? हमारे ऊपर वैदेशिक कर्ज बढ़ता जा रहा है । गर्भ में पल रहे बच्चे लाखों के कर्ज में डूबे हुए हैं; इसका खयाल है हमें ? कल ऋण न चुका सकने पर हमें अपनी ही देश में गुलाम की भांति जीना पर सकता है; कभी सोचा हमने ? नहीं न ? अरे, ऊपर से ऋण का भार दिन प्रतिदिन इन नेताओं को पालने में बढ़ता जा रहा है । कौन सोचेगा इस पर ? आप ही बताइए ?
अब एक बात साफ हो गया है कि वर्तमान के नेपाली राजनीति के इन भेड़ों से कुछ भी आशा नहीं किया जा सकता है । यहां के किसी पार्टी का कोई सिद्धांत नहीं है । सब मिल जुलकर लूटने में माहिर हैं । यहां न पक्ष है न विपक्ष । सबके सब मतलब के यार हैं । जिस देश में कांग्रेस और कमयूनिष्ट भी मिलकर देश लूटता हो; उस देश में राजनीतिक आदर्श की बात करना ही मूर्खता है । अतः अब व्यक्तित्व की पहचान किया जाय । और अच्छे व्यक्तियों को सम्मान के साथ राजनीति में आगे बढ़ाया जाए ।

