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24 साल बाद भी नारायणहिटी हत्याकांड का रहस्य बरकरार

 

19 जेष्ठ, काठमांडू।

आज नारायणहिटी दरबार हत्याकांड को 24 साल पूरे हो गए हैं। 19 जेष्ठ, 2058 की शाम को नारायणहिटी दरबार  के अंदर तत्कालीन राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह के राजवंश को नष्ट कर दिया गया था।दरबार हत्याकांड में तत्कालीन राजा बीरेंद्र, रानी ऐश्वर्या, युवराज दीपेंद्र, राजकुमार निरजन, राजकुमारी श्रुति, राजकुमार धीरेंद्र, राजकुमारी जयंती, राजकुमारी शांति, राजकुमारी शारदा, कुमार खड्ग और अन्य मारे गए थे।

हालांकि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई थी कि दीपेंद्र ने अपने परिवार के सदस्यों को गोली मारी और फिर खुद को भी गोली मार ली, लेकिन नेपाली नागरिकों ने इस पर विश्वास नहीं किया।

उच्च सुरक्षा घेरे वाले दरबार में हुई हत्या अभी भी रहस्य में डूबी हुई है। पारिवारिक समारोह के दौरान हुई 19 जेष्ठ की भयावह घटना आज भी हर नेपाली को झकझोर देती है। भले ही देश में राजशाही खत्म हो गई हो और गणतंत्र की स्थापना हो गई हो, लेकिन जेष्ठ 19 की वह अप्रिय छाप, जब तत्कालीन राजपरिवार के वंश को नष्ट कर दिया गया था, नेपालियों के मन से नहीं मिट पाई है।

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उदार राजा की छवि बनाने वाले बीरेंद्र के वंश के नष्ट होने के बाद नेपाल में राजशाही ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई। राजा बीरेंद्र के बाद उनके छोटे भाई ज्ञानेंद्र शाह गद्दी पर बैठे। जब उन्होंने सीधे सत्ता लेकर तानाशाह बनने की कोशिश की, तो नेपाल के राजनीतिक दलों ने 2062/63 में दूसरा जनांदोलन छेड़कर और नेपाल को गणतंत्र घोषित करके राजशाही को खत्म कर दिया।

नारायणहिटी दरबार हत्याकांड के सात साल बाद यानी जेष्ठ 15, 2065 को देश में राजशाही के अंत और गणतंत्र की स्थापना की घोषणा की गई। ज्ञानेंद्र शाह नेपाल के इतिहास में आखिरी राजा बने। अब राजशाहीवादी इस मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं कि उन्हीं ज्ञानेंद्र या ज्ञानेंद्र के वंशजों को गद्दी पर वापस बैठाया जाए।

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महल हत्याकांड के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश केशव प्रसाद उपाध्याय और तत्कालीन स्पीकर तारानाथ राणाभट के समन्वय में एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की गई थी। राणाभट ने रिपोर्ट सार्वजनिक की, जिसमें क्राउन प्रिंस दीपेंद्र को जेष्ठ 19 की घटना के लिए दोषी बताया गया।

तत्कालीन माओवादी अध्यक्ष प्रचंड के नेतृत्व वाली दूसरी कैबिनेट में गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे बिमलेंद्र निधि ने महल हत्याकांड की जांच का मुद्दा उठाया था। हालांकि निधि ने ज्ञानेंद्र के पदच्युत होने के बाद भी उनके राजनीतिक बयानों के प्रतिशोध में जांच का मुद्दा उठाया था, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा।

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अनेक संदेहों और अटकलों के बावजूद नारायणहिटी हत्याकांड अभी भी रहस्य बना हुआ है।

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