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चुनौतियों के बीच सुशासन की उम्मीद : श्वेता दीप्ति

 

डॉ श्वेता दीप्ति, सम्पादकीय, हिमालिनी सितम्बर। वर्ष २०८२ (२०२५, ८ सितम्बर) नेपाल के राजनीतिक इतिहास में अभूतपूर्व परिवर्तन के वर्ष के रूप में याद किया जाएगा । जेन–जी पीढ़ी के नेतृत्व में ‘सुशासन क्रांति’ ने दशकों से जड़ जमाए भ्रष्टाचार, अस्थिरता और फिजूलखर्ची की नींव हिला दी है और पुरानी सत्ता संरचना को तहस–नहस कर दिया है । इस आंदोलन ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की को प्रधानमंत्री पद पर बिठाया है । जिन्हें नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य हासिल हुआ है । उनकी प्रखर और निडर छवि, भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके कड़े निर्णयों और सरकार को चुनौती देने के उनके विगत की कार्यशैली ने उन्हें इस जटिल दायित्व के लिए एक उपयुक्त उम्मीदवार बनाया है । उन्हें ऐसे समय में जिम्मेदारी मिली है जब देश की सारी व्यवस्थाएँ चरमराई हुई हैं । भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बल पर नियुक्त कार्की के सामने छह महीने के भीतर संसदीय चुनाव कराने और सुशासन की नींव रखने की चुनौती है ।

देश के वर्तमान संविधान को विश्व का उत्तम संविधान कह कर प्रचारित किया गया है । यह संविधान नेपाल को एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करता है, हालांकि यह व्यवस्था देश हित के लिए की गई है किन्तु पिछले समय में अगर देखा जाए तो इस व्यवस्था के कुछ प्रावधानों ने देश पर प्रशासनिक बोझ, अस्थिरता और भ्रष्टाचार को ही बढ़ाने का काम किया है । जेन–जी आंदोलन ने इन कमियों को उजागर किया है और संविधान में संशोधन या पुनर्लेखन की माँग की है । विश्लेषकों का मानना है कि कार्की सरकार को इन संवैधानिक सुधारों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिससे फिजूलखर्ची में कमी आएगी और सुशासन की नींव रखी जा सकेगी ।

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पहली महिला प्रधानन्यायाधीश बनकर इतिहास रचने वाली सुशीला कार्की ने पहली महिला प्रधानमंत्री बनकर एक और इतिहास रच दिया है । २५ जेष्ठ २००९ को मोरंग के शंकरपुर में जन्मी कार्की ने विराटनगर के महेंद्र मोरंग महाविद्यालय से बी.ए. और बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एम.ए. किया । त्रिभुवन विश्वविद्यालय से २०३४ में विधि स्नातक करने के बाद, जब उन्होंने २०३५ में वकालत शुरू की, तब विराटनगर में कोई महिला वकील नहीं थीं । बाद में, कुछ महिला वकील आईं, लेकिन वे टिक नहीं पाईं । कार्की ने अडिग होकर वकालत जारी रखी । कार्की ने नेपाल के लोकतांत्रिक और जनवादी आंदोलनों में भी सक्रिय भूमिका निभाई । २०४६ के जन आंदोलन के दौरान, पंचायत के विरुद्ध प्रदर्शन करते हुए कार्की को गिरफ्तार भी किया गया था । कार्की ने तत्कालीन क्षेत्रीय न्यायालय से लेकर अपील न्यायालय तक वकालत का अनुभव प्राप्त किया था ।

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२७ वर्षों की वकालत के बाद, वह वरिष्ठ अधिवक्ता बनीं और २०६५ में सर्वोच्च न्यायालय की अस्थायी न्यायाधीश बनीं । २०६७ में उन्हें न्यायाधीश नियुक्त किया गया । और, सात वर्ष बाद, १ बैसाख २०७३ को, वह कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनीं । प्रधान न्यायाधीश बनने के तीन महीने बाद, उन्होंने १५ महीने तक सर्वोच्च न्यायालय का नेतृत्व किया । परन्तु वह सर्वोच्च न्यायालय के अध्यक्ष के रूप में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं, क्योंकि उन्हें महाभियोग का सामना करना पड़ा । हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के कारण महाभियोग निरस्त होने के बाद, दोनों पक्षों ने महाभियोग वापस ले लिया ।

एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में जन्मी, कार्की को कहा जाता है कि वो बचपन से ही जिद्दी, हठी और निडर हैं । सुशीला कार्की के नेतृत्व में, नेपाल के पास सुशासन, स्थिरता और आर्थिक दक्षता के एक नए युग में प्रवेश करने का अवसर है । संवैधानिक सुधार (प्रदेश, आयोग, आरक्षण, समानुपातिक प्रतिनिधित्व, प्रतिनिधि सभा की संख्या, जिला संरचना, मुख्य कार्यकारी, उपाध्यक्ष) और नीतिगत सुधार (भ्रष्टाचार जाँच, मिशनों का उन्मूलन, सलाहकार प्रतिबंध, कर्मचारी संगठनों पर प्रतिबंध, सांसदों और मंत्रियों का पृथक्करण, चुनावी सीमाएँ) नेपाल के प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचे को मजÞबूत करने की चुनौती उनके समक्ष है । जिसके लिए उनके सामने राजनीतिक प्रतिरोध, कानूनी जटिलताएँ और संसाधनों की कमी है । कार्की को तुरंत एक कार्ययोजना तैयार करनी होगी और लोगों का विश्वास जीतना होगा । विशेष रूप से, भ्रष्टाचार जाँच और संसाधन जुटाने का अभियान, नई पीढ़ी की अपेक्षाओं पर खरा उतरना । यदि ये सुधार प्रयास सफल होते हैं, तो इसे इतिहास में ‘नई पीढ़ी के चमत्कार’ के रूप में दर्ज किया जाएगा । यह नेपाल के पुनर्जागरण की शुरुआत है, जो देश को भ्रष्टाचार मुक्त, स्थिर और समृद्ध बना सकता है ।

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