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जेन–जेड की चेतावनी: राजनीति नहीं बदली तो नया संकट अपरिहार्य

 


कैलास दास, जनकपुरधाम, 28 मंसिर। यदि राजनीतिक दल जेन–जेड युवाओं और महिलाओं को प्राथमिकता के साथ राजनीति में सहभागी नहीं बनाते, तो देश में शांति, सुशासन और सतत विकास संभव नहीं हो पाएगा—यह निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से सामने आया है। जनकपुरधाम में ‘राइट्स क्लिनिक’ द्वारा आयोजित ‘आसन्न आम निर्वाचन: जेन–जेड युवा और महिलाओं की सहभागिता’ विषयक संवाद कार्यक्रम में सहभागी जेन–जेड युवाओं ने वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व के प्रति तीव्र असंतोष व्यक्त करते हुए संरचनात्मक परिवर्तन की मांग की।

कार्यक्रम में सहभागी जेन–जेड युवाओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब केवल पुराने नेताओं के नेतृत्व से देश का रूपांतरण संभव नहीं है। उन्होंने राजनीतिक दलों के निर्णय-स्तर से लेकर उम्मीदवार चयन तक कम से कम 40 प्रतिशत युवाओं और महिलाओं की सहभागिता सुनिश्चित करने की मांग की। युवाओं के अनुसार सहभागिता केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन में निर्णायक भूमिका के साथ होनी चाहिए।

भदौ 23 और 24 के आंदोलन का संदर्भ देते हुए युवाओं ने कहा कि वर्षों से जड़ बन चुकी राजनीतिक संरचनाओं में परिवर्तन को असंभव माना जाता था, लेकिन 27 घंटों के भीतर सत्ता और व्यवहार में बदलाव संभव होने का प्रमाण मिल चुका है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आसन्न चुनाव में संख्या के आधार पर भी युवाओं और महिलाओं को टिकट नहीं दिया गया, तो वर्तमान से कहीं अधिक गंभीर राजनीतिक संकट उत्पन्न हो सकता है। यह वक्तव्य केवल आक्रोश नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक अस्थिरता का संकेत भी है।

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जानकी महिला जागरण की अध्यक्ष तथा राइट्स क्लिनिक की सदस्य मन्दाकिनी कर्ण की अध्यक्षता में सम्पन्न इस कार्यक्रम में जेन–जेड युवाओं और महिलाओं की उल्लेखनीय सहभागिता रही। सहभागियों ने वर्तमान नेतृत्व के प्रति अविश्वास व्यक्त करते हुए देश के भ्रष्टाचार, महंगाई और बढ़ते कर्ज के जाल में फँसे होने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि जनता पर ऋण का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जबकि सत्ता में बैठे नेता केवल अपनी व्यक्तिगत समृद्धि पर केंद्रित हैं। चुनाव के समय सूटकेस लेकर वोट मांगने की संस्कृति ने राजनीति को बदनाम किया है—यह कहते हुए युवाओं ने चेतावनी दी कि यदि नेता सचेत नहीं हुए, तो युवा पीढ़ी कोई और कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी।

कार्यक्रम में नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले, नेकपा माओवादी केंद्र, जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) नेपाल, लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी, तराई–मधेश लोकतांत्रिक पार्टी और राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी नेपाल के नेताओं की उपस्थिति रही। इसी मंच से जेन–जेड युवाओं ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि दल समय रहते नहीं सुधरे, तो युवाओं के नेतृत्व में एक अलग राजनीतिक पार्टी के गठन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह वक्तव्य स्थापित दलों के प्रति बढ़ते अविश्वास और वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति की संभावना को उजागर करता है।

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विशेष रूप से कांग्रेस, एमाले और माओवादी केंद्र के प्रति जेन–जेड युवाओं और महिलाओं का आक्रोश अधिक देखने को मिला। उन्होंने अपने आंदोलन की मांगों को गंभीरता से संबोधित करने की अपील राजनीतिक दलों से की। युवाओं के दबाव के बाद नेताओं ने विभिन्न प्रतिबद्धताएँ व्यक्त कीं, लेकिन वे व्यवहार में उतरेंगी या नहीं—यह प्रश्न यथावत बना हुआ है।

जेन–जेड की मांगों पर प्रतिक्रिया देते हुए नेकपा माओवादी केंद्र के केंद्रीय सदस्य एवं प्रदेश सभा सदस्य भरत प्रसाद साह ने कहा कि माओवादी केंद्र अपने विधान में जेन–जेड युवाओं को एक भ्रातृ संगठन के रूप में शामिल करेगा और पार्टी के सभी निकायों में उनकी सहभागिता सुनिश्चित करेगा। वहीं, नेकपा एमाले की मधेश प्रदेश महिला विभाग संगठन प्रमुख शारदा थापा ने कार्यक्रम में उठे मुद्दों को पार्टी के भीतर रखने का आश्वासन देते हुए कहा कि युवाओं और महिलाओं का आक्रोश जायज है।

जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) नेपाल के केंद्रीय सदस्य एवं प्रदेश सभा सदस्य रामआशिष यादव ने युवाओं और महिलाओं की सार्थक सहभागिता के लिए संविधान संशोधन को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि मधेशवादी दल शुरू से ही इस विषय पर आंदोलनरत रहे हैं। लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के महासचिव परमेश्वर साह ने राजनीतिक दलों में युवाओं और महिलाओं की सहभागिता को अनिवार्य बताते हुए कहा कि इसके लिए उन्हें स्वयं सक्रिय होकर आगे आना होगा। बिना संघर्ष कोई उपलब्धि संभव नहीं—यह उनका स्पष्ट संदेश था।

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राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के पूर्व आयुक्त एवं वरिष्ठ मानव अधिकारकर्मी सुशील प्याकुरेल ने भी कहा कि वे युवाओं और महिलाओं की प्रत्येक राज्य संरचना में सहभागिता के लिए लंबे समय से आवाज उठाते आ रहे हैं।

कार्यक्रम में नेपाली कांग्रेस के धनुषा उपाध्यक्ष गणेश झा, तराई–मधेश लोकतांत्रिक पार्टी की केंद्रीय सदस्य विभा ठाकुर, राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के सचिव संजय चौधरी, राइट्स क्लिनिक के कैलास दास, रिंकु यादव, राजु पासमान सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने-अपने विचार रखे।

समग्र रूप से, यह संवाद कार्यक्रम केवल एक चर्चा तक सीमित नहीं रहा। इसने नेपाली राजनीति में जेन–जेड युवाओं और महिलाओं के बढ़ते असंतोष, अपेक्षाओं और संभावित वैकल्पिक राजनीतिक मार्ग का स्पष्ट संकेत दिया है। यदि स्थापित दलों ने इस आवाज़ को समय रहते गंभीरता से नहीं सुना, तो इसके परिणाम आगामी चुनावों और समग्र राजनीतिक संरचना पर गहरे प्रभाव के रूप में सामने आ सकते हैं।

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