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बंदूक की सुरक्षा : सरिता गिरी

 

बंदूक की सुरक्षा

घेरे के उस पार बर्दीधारी खडे थे,
उनके हाथों मे बंदूके थीं ।
इस पार बच्चे और युवा थे ,
उनके हाथों मै बैनर था।
बैनरों से शब्द उभर कर
अपनी उपस्थिति जता रहे थे ।
न्याय दो , काम दो
शांति दो , सुरक्षा दो
ह्मको हमारा अधिकार दो ।

तुम्हारे तिजोरियों में रखा
हमारा धन हमको वापस दो ।
और गरीबी की गत्र्त से हमें निकालो ।

बंदुकधारी कम थे और
बच्चे और युवा ज्यादा ।
यह कोई सरहद तो थी नहीं
लेकिन सब कुछ युद्धमय होते जा रहा था ।

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इधर सब निहत्थे थे ।
उनको े लगा
बंदुकधारी हमारी सुरक्षा में खडे हैं।
क्ुछ ही दिन पहले सरहद के पार के देश में
किसी उस्मान मियाँ को
किसी ने सडक पर गोली से मार गिराया था।
यहाँ भी वैसा ही कुछ ना हो जाए ,
शायद इसीलिए बंदूकधारी तैनात हैं ।

लेकिन अचानक
किसी बंदूक के पडकने की आवाज आयी, ,
फायर, करो फायर करो की चिल्लाहट सुनाई पडी, ,
और उसके बाद ताबडतोड बंदूकें चलने लगी ।
गोलियाँ बंदूक की नालों से बरसने लगी ।
फिर सडक पर भगदड मच गयी ,
रक्त के फव्वारे इधर उधर फूटने लगे।
सबकुछ अचानक हो गया ।
पता नहीं बच्चों पर गोली चलाने का आदेश किस ने दिया था।

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शायद आकाश से ताकती आँखो ने
कहीं संदेश पहुँचा दिया था
कि बंदुक कम हैं और लोग बाग ज्यादा ।

आदेश आया होगा
गोली चलाओ ,गोलियाँ कम हैं
आदेश आया होगा
गोलियाँ कम हैं और बंदूक पुराने
इसीलिए
गोलियाँ ऐसे दागो कि
कम गोलियों से ही
काम मुक्कमल हो जाए ।

जब जनता ज्यादा होती है
और बंदुक कम ं,
तो सुरक्षा बंंदुक की जरुरत बन पडती है ।
लोकतन्त्र में जो अल्पसंख्यक हैं,, ,
बंदूक की सुरक्षा उनको ही मिलती है ।
लोकतन्त्र का नियम यही है ।
इसीलिए आदेश आया कि कम संख्या में रहे
ब्ांंदूक. की सुरक्षा के लिए गोली चलाते रहो ।
लेकिन किसी ने यह भी बताया कि
सडकं पर गोली चलाने वाले
भय से कांपते हए अपने हाथों से
गोली तो बरसा रहे थे
लेकिन समय मिलते ही पीछे हटकर
सडक के कनारे के किसी खम्भे
या किसी दरख्त के पीछे
खडे होकर अपने चेहरे को छिपा भी रहे थे ।

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सरिता गिरी, २५ अक्तूबर, २०२५

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