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डॉ श्वेता दीप्ति, अंक फरवरी ०२६। नेपाल की धरती के कण–कण में पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएँ छिपी हुई हैं । विशेषकर तराई क्षेत्र में इतिहास बिखरा पड़ा है । यहाँ की मिट्टी में पर्यटन की अपार संभावनाएँ हैं, लेकिन सरकार का ध्यान इस ओर बहुत कम गया है । स्थानीय सरकार की निष्क्रियता भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है । आज हम सिमरौनगढ़ के कलात्मक इतिहास पर एक दृष्टि डालते हैं, जो आज भी उपेक्षा का शिकार है ।
नेपाली कला, संस्कृति और सभ्यता की चर्चा करते समय हम अक्सर सिमरौनगढ़ की सभ्यता को भूल जाते हैं । जब नेपाली कला–संस्कृति की बात होती है, तो प्रायः लिच्छवी और मल्ल काल की कला पर ही चर्चा की जाती है । किंतु दसवीं से चौदहवीं शताब्दी तक कला और शिल्प में वैभव बनाए रखने वाले सिमरौनगढ़ के अध्ययन के बिना नेपाली इतिहास, कला, धरोहर और संस्कृति की खोज अधूरी है ।
गढीमाई मंदिर से बारा के बरियारपुर होते हुए गंडक नहर के किनारे–किनारे पूर्व दिशा में महागढीमाई नगरपालिका, पचरौता नगरपालिका और आदर्श कोतवाल गाँव से लगभग २० किलोमीटर की यात्रा के बाद सिमरौनगढ़ पहुँचा जा सकता है ।

ऐतिहासिक रूप से सिमरौनगढ़ को सिमरा, वनगढ़ और सिम्मनगाड़ा के नाम से भी जाना जाता है । कर्नाट वंशीय राज्य की स्थापना नान्यदेव द्वारा की गई थी । फ्रांसीसी इतिहासकार सिल्वाँ लेवी के अनुसार नान्यदेव, सिमरौनगढ़ के चालुक्य राजा विक्रमादित्य (ख्क्ष्) के सेनापति थे ।

बारा जिले के दक्षिण–पूर्वी कोने में स्थित सिमरौनगढ़ (सिमरवंगढ़) और बरगाढ़ी को जिले का प्रमुख ऐतिहासिक स्थल माना जाना चाहिए, क्योंकि नेपाली इतिहास में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व मुख्यतः सिमरौनगढ़ और कुछ हद तक बरगाढ़ी ही करते हैं । सूर्यविक्रम ग्यावाली द्वारा २०१९ में लिखित ‘नेपाल घाटी का मध्यकालीन इतिहास’ में उल्लेख है कि १०९७ ईस्वी में सिमरौनगढ़ तिरहुत राज्य की राजधानी था और दक्षिण भारत के कर्नाटक मूल निवासी नान्यदेव यहाँ के प्रथम राजा थे । प्रारंभ में संभवतः यह राज्य दक्षिण भारत के चालुक्य सम्राट के अधीन शासित था ।
१०९७ में राज्य की स्थापना के बाद उनके उत्तराधिकारी गंगदेव, नरसिंहदेव, रामसिंहदेव, शक्तिसिंहदेव और हरिसिंहदेव ने शासन किया । पूर्व में कोसी, पश्चिम में गंडकी, उत्तर में महाभारत पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में गंगा तक सिमरौनगढ़ का शासन फैला हुआ था ।

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नेपाल के इतिहास के अनुसार १३२४ में गÞियासुद्दीन तुगलक के आक्रमण से सिमरौनगढ़ राज्य नष्ट हो गया । युद्ध में पराजित राजा और दरबारी उत्तर की पहाडÞियों की ओर भाग गए । अंतिम राजा हरिसिंहदेव (जिन्हें कुछ इतिहासकार हरसिंह भी कहते हैं) सिंधुली के तिपाट (वर्तमान तीनपाटन) में कुछ समय तक रहे ।
इतिहासकारों के अनुसार तीनपाटन में राजा की मृत्यु के बाद रानी देवलदेवी, उनके पुत्र जगतसिंह और दरबारी तामाकोसी के किनारे–किनारे चलते हुए दोलखा, बनेपा होते हुए भक्तपुर पहुँचे और शरण ली ।
रानी देवलदेवी ने अपने पुत्र जगतसिंह देव का विवाह भक्तपुर के राजा रुद्रमल्ल की विधवा पुत्री से कराया । बाद में उनकी पुत्री का विवाह तिरहुत के एक युवक से हुआ, जो आगे चलकर जयस्थिति मल्ल के नाम से प्रसिद्ध हुए । इतिहासकारों का मानना है कि रानी देवलदेवी अपने कुलदेवी की मूर्ति सिमरौनगढ़ से साथ लाई थीं, जो आज भक्तपुर में तलेजू (तुलजा) भवानी के रूप में पूजित हैं ।
आज भी हरिहरपुर स्थित सिमरौनगढ़ क्षेत्र में तलेजू भवानी मंदिर के खंडहर मिलते हैं । लगभग एक दशक पूर्व यहाँ खुदाई भी हुई थी, जिसमें कलात्मक पत्थर के स्तंभ और द्वार के अवशेष मिले थे, जो अब भी देखे जा सकते हैं ।
इशरा तालाब के पास कंकाली मंदिर के सामने एक प्राचीन घंटा है, जिस पर विक्रम संवत १३४९ (ईस्वी १२९२) का उल्लेख है । इसकी स्थिति अच्छी नहीं है, पर यह इतिहास के रहस्यों को उजागर कर सकता है । किंवदंती है कि सिमरौनगढ़ के राजा शिवसिंह (शक्तिसिंह देव) ने अपनी प्रिय इशरा के लिए यह झील बनवाई थी । पुरातत्वविदों के अनुसार यहाँ प्राप्त कलाकृतियाँ कर्नाट वंश और गुप्तकालीन प्रभाव को दर्शाती हैं । खुदाई में मिली खंडित मूर्तियाँ कंकाली मंदिर परिसर में एकत्र कर रखी गई हैं, किंतु उनका उचित संरक्षण नहीं हुआ है ।
इशरा झील से लगभग डेढ़ किलोमीटर पश्चिम में रानीवास मंदिर स्थित है । यह ऊँचे स्थान पर होने से संकेत मिलता है कि संभवतः यहाँ राजप्रासाद रहा होगा । स्थानीय लोगों के अनुसार यहाँ मिट्टी के बर्तन, घड़े, मूर्तियाँ और मुद्राएँ भी मिली हैं ।
मंदिर के पश्चिमी कोने में एक प्राचीन कुआँ है और पूर्वी प्रवेश द्वार के दाहिने ओर एक पुराना इनार है । चारों ओर टूटी–फूटी मूर्तियाँ बिखरी पड़ी हैं । पश्चिम दिशा में एक सुंदर कमलपोखर भी है, जिसके अवशेष अब भी मौजूद हैं ।

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जंग बहादुर राणा शिकार के दौरान यहाँ पहुँचे थे । कहा जाता है कि शिकार शिविर के निर्माण के समय महल और मंदिर के खंडहर मिले । उनके निधन के बाद उनके पुत्र जितजंग ने उनकी स्मृति में राम मंदिर बनवाया, जिसमें जंग बहादुर और उनकी रानी की मूर्तियाँ राम–सीता की ओर मुख किए स्थापित हैं ।

मंदिर के चारों ओर गुठी व्यवस्था भी की गई थी । कहा जाता है कि तुर्क आक्रमण के बाद मिले अवशेषों को मंदिर परिसर में स्थापित किया गया । कर्नाट वंशकालीन कला के नमूने आज भी यहाँ देखे जा सकते हैं । स्थानीय लोगों के अनुसार दक्षिणी द्वार के पास पहले एक शिलालेख था, जिसमें नान्यदेव के छंद अंकित थे ।

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रानीवास मंदिर से एक किलोमीटर दक्षिण में खजहानी गाँव है, जिसे कर्नाट राजाओं का खजाना रखने का स्थान माना जाता है । यहाँ खेतों और पोखरों की खुदाई में आज भी पुरातात्विक वस्तुएँ मिलती हैं ।
प्रसिद्ध पुरातत्वविद तारानंद मिश्र के अनुसार भक्तपुर की वास्तुकला पर सिमरौनगढ़ का गहरा प्रभाव है । कहा जाता है कि सिमरौनगढ़ के राजा ने भक्तपुर–बनेपा–सिंधुली मार्ग का निर्माण कराया था ।
नेपाल के इतिहास में मल्लकाल को वास्तुकला का स्वर्ण युग माना जाता है, किंतु राजधानी की कला और संस्कृति पर सिमरौनगढ़ का योगदान भी महत्त्वपूर्ण है ।

आज आवश्यकता है कि सिमरौनगढ़ के संरक्षण के लिए ठोस योजना बनाई जाए । जनप्रतिनिधियों को स्थानीय लोगों, इतिहासकारों और विशेषज्ञों की बात सुननी चाहिए । एक मास्टर प्लान तैयार कर नक्शा, खुदाई, धरोहर सामग्री का संरक्षण और व्यवस्थित बस्ती विकास की योजना बनाई जानी चाहिए । राज्य सरकार और पुरातत्व विभाग की सहायता से सीमांकन और सावधानीपूर्वक खुदाई की जाए तो सिमरौनगढ़ एक प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थल बन सकता है ।
राज्य को सिमरौनगढ़ की खुदाई और अध्ययन में देरी नहीं करनी चाहिए । इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि इसके भूमिगत इतिहास, कला और धरोहर का संरक्षण किया जाए, तो सिमरौनगढ़ नेपाल की पर्यटन अर्थव्यवस्था को समृद्ध कर सकता है ।

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