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रूस-यूक्रेन युद्ध में नेपाली: एक ओर भागकर बचे, दूसरी ओर सेना में भर्ती

 

रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के चार साल पूरे होने पर यह रिपोर्ट उन नेपालियों की कहानी बयाँ करती है जो इस संघर्ष में विभिन्न रूपों से फँसे।

गोरखा के संजीत भट्ट उस दिन को याद करते हैं जब युद्ध शुरू हुआ था। कीव में रह रहे वे जान बचाने के लिए पोलैंड भागे। बसें नहीं चल रही थीं, इसलिए उन्हें पाँच दिनों तक जंगल के रास्ते पैदल चलकर सीमा पार करनी पड़ी। रास्ते में भारतीय, पाकिस्तानी और यूक्रेनी नागरिक भी थे।

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जहाँ लगभग दो हज़ार नेपाली सुरक्षित बाहर निकलने में सफल रहे, वहीं रूसी सेना में भर्ती होने वालों की संख्या भी उतनी ही थी। नेपाल, कतार, यूएई और मलेशिया से कई नेपाली युवा रूसी सेना में शामिल हुए।

दैलेख के प्रकाश बोहरा ने बताया कि उन्होंने घर वालों को बिना बताए स्टूडेंट वीज़ा के ज़रिए रूस जाकर सेना ज्वाइन कर ली। पाँच दिनों में भर्ती और सात दिनों की ट्रेनिंग के बाद उन्हें फ्रंटलाइन पर भेज दिया गया। उन्होंने 18 महीने युद्ध में बिताए, जहाँ उनके सामने साथी मारे गए। उनकी 30 सदस्यीय टीम से 10-15 दिनों में महज 5-10 लोग ही लौटते थे। बावजूद इसके, वे बिना किसी चोट के बच गए।

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नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार, रूसी सेना में भर्ती हुए अब तक 118 नेपाली मारे जा चुके हैं, 132 लापता हैं और 219 घायल हैं। हाल ही में ड्रोन हमले में मारे गए रौतहट के मानबहादुर तामाङ की आधिकारिक जानकारी अभी तक नहीं दी गई है।

रूसी नागरिकता ले चुके कुछ नेपाली अब भी युद्ध में हैं और उन्हें वापस लौटने नहीं दिया जा रहा है। रूस ने विदेशी नागरिकों को भर्ती करने के लिए आकर्षक वेतन और एक वर्ष में नागरिकता देने की नीति बनाई है। इस कारण मानव तस्करों के माध्यम से भारत, खाड़ी देशों और मलेशिया के रास्ते कई नेपाली रूसी सेना में भर्ती हुए। अनुमान है कि करीब 1500 नेपाली रूसी सेना में शामिल हो चुके हैं।

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