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ओली की नकली राष्ट्रवाद की हवा निकल गई : मुरलीमनोहर तिवारी

 

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), बीरगंज, २३ नोभेम्बर |

“१०० दिन चले अढ़ाई कोश”…. मधेश आंदोलन शतक लगा चूका। समीक्षा जरुरी है। पहाड़ी नजरिया में कोई बदलाव नहीं आया है, जो हालात आंदोलन के पहले सप्ताह में थे, आज भी सत्ताधारी उसी पर अटके है। स्थाई सत्ता को ऐसा लगता है, वह अपने मुंह में चांदी के चमच्च लिए पैदा हुए है, और ये अपरिवर्तनीय है। ये डेमोक्रेसी का मजाक उड़ा रहे है, डेमोक्रेसी नाका पर सड़ रही है और कातिल सरकार निर्लज्ज हस रही है। इनके नजर में डोमोक्रेसी का अर्थ है “दे-मोको-राशि”। परंतु इनलोगो को पता ही नहीं चला, इनके पतंग की डोर कट चुकी है।

sipu-1ओली सरकार भारत को कोसते- कोसते खुद कटघरे में खड़ी हो गई है। सारे अंतर्राष्ट्रीय मंच मधेश के साथ खड़े है। भारतीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के चीन यात्रा के बाद चीन से मिलने वाली मदद भी धूमिल हो गई है। ओली सरकार अपनी अकड़ दिखाने के चक्कर में इतनी अकड़ी की तेल की तस्करी करती फिर रही है। दुनिया के किसी मुल्क के सरकार के इतने बुरे दिन नहीं आए होंगे। इनके नकली राष्ट्रवाद की हवा निकल गई। असली राष्ट्रवादी तो मधेशी है जिनके दम पर दक्षिणी सीमाएं सुरक्षित है। अगर मधेश अपनी राष्ट्रीयता छोड़ दे तो कही भी सिमा का पत्थर निशान दिखाई नहीं देगा।

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आंदोलन के बहती गंगा में हाथ धोने को गद्दार भी लालायित है। कांग्रेस और माओवादी के गद्दार मधेशी नकाब ओढ़कर घुसने की फ़िराक में है। लेकिन इनका छलावा अब नहीं चलेगा। मधेशी मोर्चा आंदोलन का आहवान करते-करते अहंकारी हो गए है। इन्हें लगता है आंदोलन का पेटेंट अधिकार इनके पास है। जबकि इनके मना करने के बावजूद औषधी वाले ट्रक में आग लगा दी गई। स्कूल अभी तक खुल नहीं पाएं। इसका अर्थ है आंदोलन इनके नहीं मधेशी जनता के हाथ में है। कई मौको पर लगा की आंदोलन इनके लिए साँप-छुछुंदर की तरह हो गया है, जो ना उगली जाए ना निगली जाएं। इनके एकाधिकार के चक्र को तोड़ने और मधेशी दल को एक साथ लाने का बीड़ा उठाएं, तमरा अभियान ने रामसपा, फोरम(ग), और सद्भावना को जोड़कर आंदोलन से बिचलन को रोकथाम का सराहनीय कार्य किया। इस गठवन्धन ने मधेश के सभी वर्ग की राय लेकर मधेश की जनअपेक्षित मांग को मोर्चा के समक्ष लिपिबद्ध रूप में रखने का प्रण लिया है। जिससे मोर्चा किसी अन्य दबाव में आकर गलत सहमति ना कर सके।

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नेपाल ने कल्पना किया था की संविधान ऐसा होगा, जिसकी प्रेरणा से कोयल कहेगी- मैं हु सहेली, मैना कहेगी- नहीं तू अकेली। तू हँसेगी तो मैं भी हसूँगी, तू रोए तो मैं भी रो पडूँगी। मगर ये हो ना सका, और अब ये आलम् है की तू भी नहीं और मैं भी नहीं। मधेश ने असीम धैर्य का परिचय दिया है। लाख उपहास, तिरस्कार और उकसाहट के वावजूद मधेश संयमित है। सौ दिन में मधेश के आंसू तो सुख गए है, पर उसकी लकीरें दिखती है। हमें ये भ्रम निकाल देना होगा ही ये सीधे तरीके से मानेंगे। ऐसा नहीं है की किसी त्रुटि के कारण मधेश की मांग छुट गई है, ये जानबूझकर नियतवश किया गया है। सोएं को जगाया जा सकता है, बहरे को सुनाया जा सकता है, पर जो सोने को अभिनय कर रहा हो उसे नहीं जगाया जा सकता, उसे नहीं सुनाया जा सकता।

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मधेश आंदोलन ने आंदोलन के समय और उपस्थिति के सारे गणितीय पूर्वानुमान को चकनाचूर कर दिया। जिस लोभ और अवसरवाद के बादल ने मधेश को गुलाम किया था, उसे मधेश ने नकार दिया। मधेश के भीगती नसों में, घूमती रगो में आज क्रांति की ज्वाला धधक रही है। किसने सोचा था कबूतर अचानक गिद्ध बन सकता है, खरगोश अचानक शेर बन सकता है। मधेश को अब कोई भय नहीं है। जो मधेश के लिए प्राण दे, जो मधेश के लिए प्राण लें, वही एकमात्र सर्वशक्तिमान है। ये मधेश की पुकार है, यही भागवत का सार है, की युद्ध ही वीर का प्रमाण है। मधेश को चुनाव के लिए कुछ ही मार्ग शेष बचे है, दया का भाव, शौर्य का चुनाव या हार का घाव। सोच लीजिए……. जय मधेश।sipu-2

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