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कागराज

 

बिमला देव

लेकर सब दिन हाथ में रोटी
जाती थी मैं छत पर हसँती
न्यौता देने काग राज को
आकर खा लो अपनी रोटी ।

दूर से देख रहा होता था
आस में बैठे आम वृक्ष पर
ज्यों ही जाती थी मैं छत पर
झूंड में आ जाता था मिल कर ।

बस में ज्यूही रखकर रोटी
खड़ी बगल में थी हो जाती
देखने काग राज को ऐसे
खाता है रोटी वह कैसे ?

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कोई टुकड़ा एक उठाता
कोई चोंच में दो–दो भरता
जाके कुछ दूरी पर बैठ के
दवा के पाँव से खाता रहता ।

फिर लेने कुुछ वापस आता
दूसरा उस को मार भागता
मैं छुपके सब देखती रहती
फिर आकर वो ले ही जाता ।

कुछ पल का वो लोभ दिखता
फिर मिलकर ही था खाता
आया नहीं जो दूर का कौवा
कांव कांव कर के पास बुलाता ।

सब हरकत बालक सा ही था
ले रोटी ओ कूद रहा था
लगा मुझे मानव का बच्चा सा
कितना चंचल वो कौआ था ।
भैसेपाटी, ललितपुर

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