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बकरीद की अाठ महत्तवपूर्ण बातें

 

४ सितम्बर

 

1. इस्लामिक मान्यता के अनुसार हजरत इब्राहिम अपने पुत्र हजरत इस्माइल को इसी दिन खुदा के हुक्म पर खुदा कि राह में कुर्बान करने जा रहे थे, तो अल्लाह ने उसके पुत्र को जीवनदान दे दिया जिसकी याद में यह पर्व मनाया जाता है।

 

2. बकरीद शब्द का बकरों से कोई संबंध नहीं है। न ही यह उर्दू का शब्द है। असल में अरबी में ‘बक़र’ का अर्थ है बड़ा जानवर जो जि़बह किया (काटा) जाता है। उसी से बिगड़कर आज भारत, पाकिस्तान व बांग्ला देश में इसे ‘बकरा ईद’ बोलते हैं।

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3.बकरीद के मौके पर बकरे की कुर्बानी एक प्रतीकात्मक कुर्बानी होती है। लेक‌िन यह जरुरी नहीं क‌ि हर क‌िसी को इस मौके पर बकरे की कुर्बानी देनी ही होती है।

4.कुरान में कहा गया है क‌ि अल्लाह के पास ह‌ड्ड‌ियां, मांस और खून नहीं पहुंचता है। पहुंचती है तो खुशु यानी देने का जज्‍बा।

 

5.अगर कोई व्यक्त‌ि कुरान के न‌ियमानुसार अपनी कमाई का ढ़ाई प्रत‌िशत दान देता है इसके बाद सामाज‌िक कार्यों में अपना धन कुर्बान करता है तो यह जरुरी नहीं है क‌ि वह बकरे की कुर्बानी दे।

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6.कुर्बानी का बकरा लाख रुपए का हो या हजार रुपये का हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मतलब है कुर्बानी के जज्बे से।

7.जो इंसान दूसरे इंसान का भला करता है अल्लाह सबसे अध‌िक उसे प्यार करता है। जो प्याऊ लगता है उसकी कुर्बानी सबसे बड़ी मानी जाती है।

 

8. ईद उल अजहा के दो संदेश है पहला परिवार के वड़े सदस्य को स्वार्थ के परे देखना चाहिए और खुद को मानव उत्थान के लिए लगाना चाहिए।

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