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मधेशी दलों को अब शीघ्र ही जीत के नशे से निकलना जरूरी

 

मधेश के दलों को अब शीघ्र ही जीत के नशे से निकल कर यह समझ लेना चाहिए कि वास्तव में वे अपनी साख मात्र बचा पाए हैं । असली संघर्ष तो सामने है जब उन्हें न केवल संगठित शक्तियों का सामना करना पड़ेगा वरन मधेश की दृष्टि से प्रतिगामियों से भी लड़ना पड़ेगा । इसलिए एकत्व के बल पर राजनीति की विसात सँभलकर चलनी चाहिए । महाभारत के भीम की तरह की विजयान्धता बहुत बड़ी नादानी होगी । ( कुमार सच्चिदानन्द सिंह के वाल से )

काँग्रेस और माओवादी केन्द्र की स्थिति को देखते हुए फिलहाल मधेशवादी दलों को भी आत्ममंथन की आवश्यकता है । जो परिणाम सामने है उसे देखते हुए मधेशवादी दलों को भी खुशफहमी से निकलना होगा क्योंकि पूरी तरह खुश होने की स्थिति अब भी नहीं है । कई मोर्चे पर गलती उनसे हुई है । ससफो और राजपा के विभाजन ने कमजोर किया और यही वजह है कि तीसरे पक्ष को आगे निकलने का अवसर मिल गया । अन्तर्घात ने भी मधेशवादी दलों को कमजोर किया वहीं टिकट के बँटवारे में लिए गए गलत निर्णय ने उनसे कई स्थानों को छीन लिया । पैसों के खेल ने जहाँ एक ओर किसी को मजबूत किया तो वहीं दूसरी ओर किसी के हाथ से कमान फिसल गई । आगे आने वाले समय के लिए उन्हें मिलकर तैयारी करनी होगी और क्षेत्र पकड़ना होगा नहीं तो मोहरे भी बदल जाते है. और चाल भी नाकाम हो जाती है । (डा.श्वेता दीप्ति के आलेख से)

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