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ॐ परमात्मा की ध्वनि है

 

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। गीता 8/13।।

अर्थ: जो ॐ इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण कर, मेरा स्मरण करता हुआ देहाध्यास का त्याग कर देता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

व्याख्या: ॐ की ध्वनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अनादि काल से लगातार गूंज रही है, यह परमात्मा की ध्वनि है और उसका ही नाम है। इसी को ब्रह्म का वाचक कहते हैं। योगी, इसी ध्वनि का साक्षात्कार करके इसको ब्रह्माण्ड और अपने भीतर अनुभव करने लगते हैं।

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देहाध्यास से ऊपर उठने के लिए यहां एक उपाए बताया है कि जो साधक इस ॐ का उच्चारण उसके अर्थ और भाव से करता है और साथ में परमात्मा का भी स्मरण करता है उसकी धीरे-धीरे इच्छाएं, वासनाएं, विकार और अहंकार नाश होने लगते हैं, जिसके फल स्वरूप योगी का चित्त पूरी तरह निर्मल हो जाता है।

इससे वह अपने देहाध्यास का त्याग कर देता है और अंत में परम गति अर्थात परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।

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