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तुम बने सागर  : पूजा बहार

 

एक नदी अनमनी सी,
चंचल, कलकल, धवल
थी वो पगली सरल,सजल सी !
पहाड़ों से छलाँग लगाकर,
बर्फ बनकर और पिर खुद को गलाकर,
अपने साजन से मिलन की खातिर,
हर पीड़ा वो सही हँसकर ।
एक नदी अनमनी सी ।
करीब जब वो सागर के आई,
सागर से कहा लो प्रियतम मै तेरे साथ रहूंगी,
साथ बहूँगी,परछाई बन तुम्हारा अनुसरण करूंगी ।
मार ठहाका सागर हँसने लगा,
व्यंग कसते हुए कहा,
अरी वो पगली,
मुझमें आकर मिल जा,
तू कितनी छोटी सी है,
मेरी एक लहर से तू अपना अस्तित्व खो सकती है !
ये सुनकर नदी की आँखे छलक गई,
वो बोली मै सूख जाऊँगी,
पर अपनी पहचान कभी ना
खोऊँगी,
हुई हम जाने कितनी नदियाँ तुझपर कुर्बान,
तब ही तो तुम बने सागर वृहद महान ।

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