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बेटे ले जाते वृद्धाश्रम, बहुओ ने अक्सर कोसा है : प्रियंका पेड़ीवाल  अग्रवाल

 

बुढ़ापा

उम्र की हर ऋतु का,

बन जाए जो समागम,

ऐसी सोंधी खुश्बु सा, 

होता बुढ़ापे का मौसम,

पहले सी फुर्ती नहीं बदन में

दो कदम चलने में थकने लगा हूँ

गिनी हुई सांसे है बांकी

एक- एक को खींच के लेने लगा हूँ।

अपना फर्ज निभाकर चौके से ऑफिस से

आज बैठे घर पे,

अपनी ही गृहस्थी को सौंप रहें हैं

अपने ही अंशों के कंधो पे।

निर्मम नाग विषैले घर के

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पल पल काया डसने लगते,

अभिलाषा के सुमन सूखते,

शूल व्यथा के हंसने लगते।

पट पीड़ा की बुनती रातें,

तानों की होती बरसाते।

बातों का कड़वा विष पीकर,

अपने ही मृत्यु को निकट बुलाते ।

जिस घर के मालिक थे,

आज उस पर बोझ बने हैं,

क्युँ यौवन पर इतना इतराए ?

सच्चाई जब देख रहे हैं |

बुढापा एक एेसी बीमारी है जो

एक दिन सबको आनी हैं,

कर्म की चक्री घूमेगी

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अब फल पाने की बारी हैं |

बोझ मानती वो संतानें, जिनको पाला पोसा है।

बेटे ले जाते वृद्धाश्रम, बहुओ ने अक्सर कोसा है ।

फिर भी यह दुआ मांगते, 

परिवार तुम्हारा फूले फले।

जितनी विपदा आए बच्चों पर,

गम वो सारे हमें मिले ।

प्रियंका पेड़ीवाल  अग्रवाल

प्रियंका पेड़ीवाल  अग्रवाल

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