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बिस्मिल्ला खान शहनाई को अपनी बेगम कहते थे, जिसे चंद पैसाें के लिए पाेते ने ही बेच दिया था

 

जन्मदिन विशेष

प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खां  किसी परिचय के मोहताज नहीं है। प्रत्येक वर्ष आज ही के दिन उनका जन्मदिन मनाया जाता है। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने अपने शहनाई वादन से समूचे देश का नाम रौशन किया। बता दें, पूरी दुनिया में शहनाई को लोकप्रिय बनाने वाले भारत रत्‍न उस्‍ताद बिस्मिल्लाह खां ने देश को दुनिया में एक अलग मुकाम दिलाया। आज उनके 104वें जन्मदिन पर उन्हें याद किया जा रहा है।

कौन थे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां
शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब का इंतकाल 21 अगस्त 2006 में हुआ था। भारतीय शास्त्रीय संगीत  और संस्कृति की फिजा में शहनाई के मधुर स्वर घोलने वाले शहनाई वादक बिस्मिल्ला खान शहनाई को अपनी बेगम कहते थे।

एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार में जन्मे थे कमरुद्दीन। कुछ लोग साल 1913 मानते हैं और कुछ 21 मार्च 1916 दिन माना जाता है । इनका जन्म भी बनारस नहीं, बिहार के डुमरांव में हुआ था। दादा ने पहली बार चेहरा देखा तो बरबस मुंह से निकला बिस्मिल्लाह कहा जाता है कि उसके बाद उन्हें बिस्मिल्लाह कहा जाने लगा। वो तो ईद मनाने मामू के घर बनारस गए थे। क्या पता था कि यही उनकी कर्मस्थली बन जाएगी। मामू शहनाई बजाते थे और छोटे मामू यानी अली बख्श साहब भी। अली बख्श बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे और वहीं रियाज भी करते थ। बिस्मिल्लाह साथ होते।

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ऐसे थे बिल्मिल्लाह खां…
शहनाई से लगाव देखकर उनके पिता ने उन्हें मामू अली बक्श के यहां बनारस भेज दिया। साधारण शहनाई पर शास्त्रीय धुन बजाकर बिस्मिल्लाह खां ने पूरे वर्ल्ड में अपनी पहचान बनाई। सबसे पहले 1930 में इलाहाबाद (Allahabad) में उन्होंने कार्यक्रम में हिस्सा लिया था।

खां साहब को गंगा और काशी विश्वनाथ से खास लगाव था। इसीलिए वो कभी काशी छोड़कर नहीं गए। इंदिरा गांधी शहनाई सुनने के लिए उन्हें इनवाइट करती थीं। राजनेता ही नहीं अभिनेता भी उनके मुरीद थे। स्व .राजीव गांधी  ने एक बार उन्हें खुद दिल्ली बुलवाया था और घंटों सोनिया गांधी के साथ बैठकर शहनाई सुनी थी।

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यही नहीं, एक बार मुंबई में खान साहब की मुलाकात स्व. बाला साहब ठाकरे से हुई। बाला साहब ने उनसे शहनाई कि धुन में बधैया को सुनाने का आग्रह किया। जिसके बाद करीब 40 मिनट तक उन्होंने शहनाई की ऐसी तान छेड़ी कि बाला साहब उनसे प्रभावित हो गए।

हिंदू देवी और सरस्वती के भक्त थे बिस्मिल्लाह खान…
बिस्मिल्लाह खान साहब मुस्लिम होने के बावजूद वह हिंदू देवी और सरस्वती के बहुत भक्त माने जाते हैं। बता दें कि उन्होंने कई फिल्मों में भी संगीत दिया।

उन्होंने कन्नड़ फिल्म ‘सन्नादी अपन्ना’, हिंदी फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ और सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसाघर’ के लिए शहनाई की धुनें छेड़ी। आखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिन्दी फिल्म ‘स्वदेश’ के गीत ‘ये जो देश है तेरा’ में शहनाई की मधुर तान बिखेरीं। उस्ताद लिए शहनाई ही बेगम और मौसिकी थी। इंतकाल के वक्त उन्हें सम्मान देने के लिए साथ में एक शहनाई भी दफ्न की गई थी।

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कौन-कौन सा मिला अवॉर्ड
संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार: 1956
पद्मविभूषण: 1968
पद्म भूषण: 1980
तराल मौसकि: 1992
भारत रत्न: 2001

चोरी हुई थी बिस्मिल्लाह खां की शहनाई
5 दिसंबर 2016 को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाइयां चोरी हो गई थी। घटना के बाद यूपी पुलिस ने जांच स्पेशल टास्क फोर्स को सौंपी थी। पुलिस के मुताबिक, इस घटना को उस्ताद के पोते नजरे ने ही अंजाम दिया था। उसने शहनाइयां 17 हजार रुपए में लोकल ज्वैलर को बेच दी थीं।

आरोपी नजरे हुसैन ने अपने दो साथियों ज्‍वैलर सुजीत और शंकर लाल सेठ के साथ मिलकर घटना को अंजाम दिया था। उसने उस्ताद की पेटी से चार शहनाइयां चुराईं। इनमें से चार चांदी की थीं। 5वीं लकड़ी की थी। ज्वैलर ने चारों शहनाइयों को गला दिया और इसकी चांदी निकाल ली। नजरे ने स्वीकार किया था कि उसने सुजीत सेठ को 17 हजार रुपए में शहनाइयां बेची थीं।

 

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