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हिमालिनीः १५ बर्षीय यात्रा

hindi magazine january
 

भाषा जो भी हो, मानव उसके माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को पर्ूण्ाता प्रदान करता है। इसी आधार पर विश्व साहित्य में अभिव्यक्त विचार अपनी सीमाओं, बन्धनों, कुण्ठाओं जातीय भेदभावों और रुढिÞवादी विचारों को पार करता हुआ मानवीय संवेदनाजन्य एकता के शाश्वत सत्य को उद्घाटित करता आ रहा है। इस सर्न्दर्भ में हम विचार करें तो लगेगा कि हिन्दी और नेपालीसाहित्य की धरातलीय मूलभूत आत्मा समान है। कारण भारत-नेपाल में सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं वैचारिक धरातल की

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पृष्ठभूमि एक सी है। समान पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए मेरे गुरुवर स्व. कृष्णचन्द्र मिश्र के नाम पर स्थापित डा. कृष्णचन्द्र मिश्र अकादमी और नेपाल हिन्दी साहित्य कला संगम के सहयोग से ‘हिमालिनी’ हिन्दी पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। वैसे तो प्रस्तुत हिमालिनी हिन्दी पत्रिका से पर्ूव हिन्दी भाषा में कई पत्रिकाएं प्रकाशित हर्ुइ और असमय कालकवलित होती गई। इसके कई कारण हैं। पर मुख्य कारण है हिन्दी भाषा के साथ शासकों द्वारा अपनाया गया सौतेला व्यवहार और हिन्दी भाषा-भाषी समाज की संकर्ीण्ा मानसिकता। ऐसी विषम परिस्थिति में भी अकादमी और संगम दोनों के सहयोग से ‘हिमालिनी’ हिन्दी पत्रिका जनवरी १९९८ में प्रकाशित हो सुधी पाठकों के हाथों में आई। तब से लेकर आज तक की १५ वर्षकी यात्रा ‘हिमालिनी’ ने पूरी कर ली है, और आशा एवं विश्वास है कि पाठकों, लेखकों एवं विज्ञापन दाताओं की सदाशयता बनी रहेगी तो निश्चय ही हिमालिनी अपनी सुधारात्मक प्रक्रिया को अपनाती हर्ुइ आगे की यात्रा भी सुगमता से तय करेगी।
हिमालिनी परिवार चाहता है कि हरेक अंक नई खोजों के साथ प्रकाशित हो और नये संकल्प, नए जोश के साथ आगे बढेÞ। साथ ही हिमालिनी भाषा, साहित्य, समाज, संस्कृति, कला, धर्म पर्यटन की सेवा करती रहे। हिमालिनी हिमालय की तरह धीरता रखकर हरेक चुनौती का सामना करती हर्ुइ सतत आगे बढÞती रहे, यही देवाधिदेव पशुपतिनाथ से पर््रार्थना है।
हिमालिनी ने अपने शुरुवाती दिनों में त्रैमासिक साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका के रुप में यात्रा शुरु की थी। जिसका उद्देश्य था- हिन्दी-नेपाली साहित्य के बीच लेखकीय विचारों और भावनाओं का परस्पर आदन-प्रदान हो ताकि दोनों साहित्य में व्यक्त साहित्यिक, सांस्कृतिक चेतना का उत्कर्षहो। फलस्वरुप हिमालिनी अपने प्रारम्भिक दिनों में तुलनात्मक अध्ययन और अनुवाद कार्य द्वारा नेपाली-हिन्दी साहित्यों के बीच भावनात्मक ऐक्यवद्धता और परस्पर सद्भाव निरन्तर आगे बढÞे, इसके लिए प्रयासरत रही। इसके सहारे यह साहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिका हिमालिनी का मूलभूत उद्देश्य आपसी एकता, प्रेम, सहृदयता जैसी भावनाओं को बढÞाने के लिए संर्घष्ारत रही।
यह पत्रिका प्रथम अंक से ही संर्घष्ा करती हर्ुइ आगे बढÞ रही है। संर्घष्ा की पृष्ठभूमि थी, धुस्वाँ सायमी द्वारा लिखित लघु उपन्यास ‘एक चिथडÞा आदमी’ वाली पंक्ति, जो आवरण पृष्ठ पर लिखा गयी थी, उसी के नीचे राजा वीरेन्द्र का चित्र भी अंकित था। इस संयोग को तत्कालीन पंचायती शासक वर्ग राजा से जोडÞ कर इस साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका को बन्द कराने पर तुल गया। यह अंक अनेक कारणों से संग्रहणीय है, कारण इसी अंक में शोषित पीडिÞत तर्राई को अधिकार दिलाने के लिए वर्तमान तमलोपा अध्यक्ष महन्थ ठाकुर ने शेर बनकर दहाडÞने का काम किया है। उस समय ठाकुर संचार तथा सूचना मन्त्री थे। उन्होंने कहा था- तर्राई का अस्तित्व आज है और पहले भी था, कुछ पाने के लिए कुछ खोना पडÞता है। इसी अंक में वी.पी कोइराला और ‘तीन घुम्ती’ का औपन्यासिक विश्लेषण प्रकाशित है। ‘नेपाल की क्रान्ति कथाः  एक प्रमाणिक दस्तावेज’ जो डा. मिथिलेश कुमारी मिश्र द्वारा लिखित है। इसी दस्तावेज में आंचलिक उपन्यासकार रेणु ने मैला आँचल और परती परिकथा द्वारा नेपाली जनता और हिन्दी संसार में क्रान्ति का आहृवान किया है। जिसका मूल्यांकन करते हुए इस आहृवान को स्वर्ण्ााक्षरों में अंकन योग्य डा. मिश्र ने बताया। इसी अंक में ख्यात्रि्राप्त प्रो. विजयेन्द्र स्नातक द्वारा लिखित ‘भारतीय भाषाओं में साम्यमूलक विचार का सूत्रपात’ लेख भी सामाविष्ट है।
वर्ष१ अंक २ हिमालिनी में भी विविध लेख समावेश है। नेपाल में बौद्धशिला के आयाम नामक ले डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ का है। इस में नेपाल की वौद्ध पृष्ठभूमि और परम्पराओं की प्रामाणिक जानकारियाँ प्राप्त हैं। काठमांडू के हृदय में बहनेवाली पौराणिक, धार्मिक, ऐतिहासिक, नदी बागमती की पीडा भी है।
हिमालिनी पत्रिका राजनीतिक प्रहार को झेल ही रही थी, इससे सम्बन्धित व्यक्तियों को भारतीय दलाल की संज्ञा देकर कभी इसे बन्द कराने की योजना बनाई गई थी। फिर भी हिमालिनी अपनी यात्रा दूसरे वर्षमें आरम्भ की।
‘हिमालिनी’ नौ वर्षतक साहित्यिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर अनेक थपेडÞांे का सामना करती हर्ुइ निकल रही थी। पर समय की गतिशीलता के साथ नेपाल के राजनीतिक चक्र को सुधारात्मक परिवर्तन की ओर मुडÞते देख हिमालिनी परिवार को लगा कि अब हमें इस पत्रिका को समयसापेक्ष बनाना चाहिए। विशुद्ध साहित्यिक से समकालीन राजनीतिक चटखारे व्यञ्जनों के साथ पाठकों के आगे परोसा जया तो हिमालिनी का भविष्य अच्छा होगा। ऐसी सोच लेकर २००र्६र् इ. में नए जोश-उत्साह के साथ नए रंग-रुप में नए राजनीतिक कलेवर के साथ विशेषांक के रुप में प्रकाशित हर्ुइ। इसी वर्षसे यह पत्रिका राजनीतिक यात्रा करने लगी और आज तक अनेक झंझावातों को झेलते हुए अपने अस्तित्व को बचाए आ रही है। इस बीच हिमालिनी और हिमालिनी परिवार को अनेक आक्रमणों का शिकार होना पडÞा।
२००७ जनवरी-फरवरी अंक में प्रवीणकुमार मिश्र द्वारा लिखित ‘बारुद के ढÞेर पर मधेश’ आलेख जब बाजार में आया तो राजनीतिक क्षेत्र में खलबली मच गई। क्योंकि उस आलेख में जनजातान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चा के संयोजक जयकृष्ण गोईत से हर्ुइ विशेष बातचीत छापी गई, जिस में गोईत ने कहा था- ‘मैं नेपाली नहीं हूँ …। उस समय वाईसीएल का आतंक अपनी चरम सीमा पार था। गोईत द्वारा व्यक्त विचार हिमालिनी में छपने के बाद ‘हिमालिनी परिवार पर चारों ओर से आक्रमण होने लगा, फोन के द्वारा चेतावनियाँ आने लगी। कब क्या होगा – हम आशंकित थे ही कि एक रात हिमालिनी के प्रकाशक डा. कृष्णचन्द्र मिश्र अकादमी के संस्थापक सच्चिदानन्द मिश्र जी के घर पर रात को आक्रमण हुआ। जिसमें उन्हें बहुत अधिक आर्थिक हानि उठानी पडÞी। हमारा समाज ऐसा ही है कि पत्रिका प्रकाशन के लिए पुरस्कार देने के बजाय आर्थिक, मानसिक दण्ड देता है।
वर्ष१३ अंक ३ में एक कार्टर्ूूछापी थी, जिस में तमलोपा अध्यक्ष महन्थ ठाकुर को हृदयेश त्रिपाठी द्वारा अंगुली पर नचाने का दृश्य का संकेत किया गया था। इस कार्टर्ूूमें संकेतिक दृश्य को तमलोपा कार्यकर्ताओं द्वारा गलत अर्थ लगाया गया। परिणाम स्वरुप कार्यकर्ताओं द्वारा चेतावनी भरा फोन आने लगा। फिर कुछ कार्यकर्ता तोडÞफोडÞ करने के उद्देश्य से कार्यालय में आए। उस समय मैं लेखक अकेले वही था। मैंने अपनी ओर से उन्हें समझाने का प्रयास किया। उचित तर्काें को सुनकर वे आश्वस्त हुए और विना विध्वंसक कार्य किए लौट गए। एक बार सम्पादकीय में मधेशी दलों में हो रहे फूट के सम्बन्ध में व्यक्त विचार को अपने ऊपर समझकर एक मधेशी मन्त्री ने धमकाया कि हमारे बारे में बुरा-भला लिखने से परिणाम अच्छा नहीं होगा। ऐसी धमकियों का शिकार हमें आए दिन होना पडÞता है। पत्रकारिता जगत में ऐसी धमकियाँ आती रहती हैं। पर मेरा मानना है कि सही बात पत्रिका में आनी ही चाहिए।
हिमालिनी के कई अंकों में नेपाल में चीन की शंकास्पद भूमिका, दलाई लामा की स्थिति, चीन के खौफनाक मंसूवे, लुम्बिनी का सौदा, आदि आलेख का शर्ीष्ाक आवरण पुष्ठ पर अंकित हो निकली है, जिसके कारण हिमालिनी परिवार को कई दिक्कतें सहनी पडÞी हैं। इस पीडÞा को कौन अनुभूति करेगा – काश हमारी पीडÞा को कोई क्षेत्र अनुभूति करने की कोशिश करता तो हम भी धन्य होते।
हिमालिनी केवल बाहृय आक्रमणों को ही नहीं, अपितु समय-समय में आन्तरिक पीडÞाओं को भी सहती हर्ुइ आगे बढÞ रही है। इसके अतिरिक्त हिमालिनी पत्रिकाविरुद्ध भ्रम फैलाने के लिए लिखित आवेदन भारतीय राजदूतावास में भी दिया गया था, यह प्रसंग भी कम पीडÞादायी नहीं है। इससे भी बडÞी पीडÞा है, दो वर्षपर्ूव प्रेस काँउन्सिल में दायर की गई उजुरी ।
अन्त में हिमालिनी के हितचिन्तकों एवं पाठकों को स्मरण दिलाना चाहूँगा कि नेपाल से प्रकाशित होनेवाली यह एक मात्र दर्ीघजीवी हिन्दी मासिक पत्रिका है। यह एक ऐसी पत्रिका है, जिसने नेपाल की कला, संस्कृति, पर्यटन, धर्म, ऐतिहासिक एवं राजनीतिक घटनाओं के बारे में आलेख प्रकाशित कर अन्तर्रर्ाा्रीय स्तर पर १५ वर्षों से प्रचार-प्रसार किया है। और भविष्य में भी इसे निरन्तरता प्रदान करने की कोशिश जारी रहेगी, ऐसा विश्वास है। पीत पत्रिकारिता को यह पत्रिका प्रश्रय नहीं देगी और स्वच्छ पत्रकारिता के पथ पर निर्भीक होकर निरन्तर आगे बढेगी।
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