बाबुल के आँसुओंका उपहार लेकर जाती है बेटियाँ : लक्ष्मण नेवटिया
“बहुमत के वश” : लक्ष्मण नेवटिया
जनसंख्या विस्फोट को उजागर करती रचना
हम दो ने
बरसातमें भिजते
उन दो को
घरमें बुलाया।
खिलाया,
पिलाया ,
ठहराया।
दश वर्षमें
हम दो के हुए “दो”।
उन दो के हुए दश।
गल्ती गहरी
हो गयी बस
किसको दें अपयश।
अब वे अन्दर
हम है बाहर
उनके बहुमतके वश ।
सावधानी हटी
दुर्घटना घटी
जनसंख्या अनुपातके
चक्रव्यूह में
यदी गए फंस।
बेटियाँ
आँख की पुतली होती है बेटियां,
कितनी प्यारी होती है बेटियां,
निकलती है दिल से आवाज
बेटियोंको मत जाने दो,
पर कहते है रीति रिवाज. मत रोको जाने दो,
रखा भी न जाए – छोड़ा भी न जाए
अपनी होकर भी
कितनी पराई होती है बेटियां!! ।
चोंच से चुगा खिलाकर
चिड़िया पालती है अपनी नन्हीं को,
पर पाते ही सुयोग्य वर
फरर उड़जाती है बेटियाँ,
खुदको धोखा दे भी सकता है आदमी
पर मुश्किल है धोखा देना आंखों को
डब डबा आती है आँखें
तभी तो होती है जब बिदाई
बाबुल के आँसुओंका उपहार लेकर जाती है बेटियाँ।

विराटनगर -९

