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मृत्योर्मा अमृतं गमय : अजय कुमार झा

 
जलेश्वर | आज के इस कोरोना रूपी युग प्रवर्तक महामारी के कारण धन जन का भयानक क्षती होने जा रहा है। प्राकृतिक जीवन शैली को घटिया कह आधुनिक कास्मेटिक जीवन जीने वाले  पशुओं के ऊपर इस महामारी का विशेष नजर है। आधुनिकता का शिरमौर यूरोप अमेरिका आज इस महामरी के आगे त्राहिमाम है। फिर हम जैसे युरोपियन कुत्तो के चरवाहा तथाकथित आधुनिक नेपालियों की औकाद ही क्या है! आज के इस महामारी से प्राकृतिक जीवन जीनेवाले नेपाली अवश्य टक्कर लेने में समर्थ हैं। अतः जीवन अब पांचतारे होटल में नहीं ग्रामीण परिवेस में मिलेगा। जैसे आत्मा को मारकर शरीर को जिन्दा नहीं रखा जा सकता वैसे ही अपनी जन्मभूमि को नष्ट कर विदेस में जीवन सुरक्षित नहीं हो सकता। आज के इस महामारी ने इस तथ्य से सबको अबगत करा दिया है। विदेसी पांचतारे होटल में प्राणियों के सूप पिनेबाले आज अपनी मृत्यु तांडव को देख खून की आँशु रो रहे हैं। स्वदेस लौटने के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं। किसी ने खूब कहा है ‘होम से होटल, होटल से हॉस्पिटल’  और अब हॉस्पिटल से सीधे परमधाम के लिए कोरोना एक्प्रेस खुल  गई है जिसमे अधिकतर सिट आधुनिक हिंशक दानवो के लिए ही सुरक्षित है।
निर्मम हत्या और मांशाहार दानवता के प्रतीक होता है जबकि शाकाहारी भोजन सभ्यता का प्रतीक होता है। “प्रेम से प्रकट हो ही भगवाना” अर्थात मनुष्यता का उत्कर्ष प्रेममय होना है। जड़ और चेतन जीव के प्रति प्रेमपूर्ण और संवेदनशील होना है। प्राणिमात्र के कल्याण हेतु तत्पर रहना है। सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय भाव से भावित रहना है। यह मनुष्यता के विकास और देवत्व का प्रतीक है। परन्तु इन आधुनिक भेड़ों ने हत्या-हिंशा तथा मांसाहार को सभ्य और शाकाहार को असभ्य घोषित कर मानवता पर घोर कलंक लगा दिया है। युवा पीढ़ी को आधुनिकता का आत्मघाती शिक्षा और संस्कार देकर पशुवत बनादिया गया है।  आकांक्षाओं का पहाड़ खड़ा कर दिया गया है। पुरे जीवन दाव पर लगाकर अपने बच्चों को उच्च कोटी का दानव और हिंशक बनाया जा रहा है। अपनी संस्कृति, सभ्यता, रहन-सहन और समाज से घृणा करना शिक्षित का प्रमाण पत्र माना जा रहा है। भीख मांगना, विदेशियों की गुलामी करना, बहु बेटियों को विदेशियों के हाथों बेचकर एश करना हमारा संस्कार बनने लगा है। क्या इतना पतीत होना आवश्यक था ? क्या हमारी मातृभूमि में हम को पालने की क्षमता नहीं है। जहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य को एक झलक पाने के लिए पाताल से लाखों की संख्या में लोग हर साल आते हों, उसके संतान को विदेशियों का झूठन उठाना इस धरती माता का अपमान नहीं है? जहाँ के सांस्कृतिक विरासत में अपने पौराणिक आनंद को खोजने के लिए विभिन्न महादेसों से लोग आते हों उस भूखंड के संतान को विदेशियों के हाथों बिकना क्या इस भूमि का बेइज्जती नहीं है? जिस भूमिपर आत्मज्ञान प्राप्त कर मानवता को धन्य बनाने हेतु विश्वभर के प्राज्ञ और दार्शनिक लोग आने को मजबूर होते हों उसका संतान चन्द पैसों के लोलुपता में विदेस पलायन करना क्या मातृभूमि को कलंकित करना नहीं है? इन सबके वावजूद हम इतिहास के एक छोटी सी घटना पर नजर डालकर अपनी गरिमा को देख सकते हैं।
आज से लगभग 80 वर्ष पहले भारत में अंग्रेज के शासन काल में 1943-44 में बंगाल जो वर्त्तमान के (वर्तमान बंगलादेस,भारत का पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा) में आँधी तूफ़ान के कारण भयानक अकाल  पड़ा था जिसमें लगभग 30 लाख लोग भूख से तड़पकर प्राण गवां दिए। ये समय द्वितीय विश्व युद्ध का था। ब्रिटेन के तात्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने जानबूझकर लाखों भारतीयों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया। उस समय नेपाल (मधेस) ने भारत को एक लाख टन धान सहयोग दिया था। (दि इण्डियन एक्सप्रेस, १६ नोभेम्बर, १९४३)। ज्ञातब्य हो! उतना सहयोग के वावजूद भी नेपाल में दो वर्ष के लिए अनाज पड़ा हुआ था। नेपाल में प्रजातंत्र आने से पहले यहाँ के मधेस भूभाग से भारत की ओर वर्ष भर अनाजों का निकासी होता था। और भारत से कपड़ा तथा औषधियों का आयात किया जाता था। अर्थात निर्यात के तुलना में आयात बहुत कम था। यह एक सबल राष्ट्र का द्योतक है। 2046 साल में आए प्रजातंत्र के वाद मधेसवाद और खसवाद का सिद्धांत व्यवहारिक रुपमे लागू होना सुरु हुआ। गिरिजा वावू के नेतृत्व में जहाँ सभी मधेस विरोधी विचारधारा के लोग एक हो गए वही मधेस के सदभावना पार्टी के मुठ्ठीभर समर्थक वाहेक सभी पार्टी के लोग पद लोलुपता हेतु खसवाद के समर्थक हो गए। खसवादियों के मन में मधेसियों के प्रति सौता का मनो वैज्ञानिक दवाव पड़ने लगा। वो लोग मधेसियों को भारतीय समर्थक मानकर खुदको भारत के शत्रु के खेमे जाना दूरदर्शिता समझा और शुरु हुआ षडयंत्र का दौड़। जिसमे सबसे पहले मधेस के रीढ़ और नेपाल के आर्थिक श्रोत कृषि को नष्ट करना सुरु किया। हिमाल और पहाड़ी भाग में पर्यटन व्यवसाय को पौराणिक कृषि के विकल्प में खड़ा किया गया। वैदेशिक रोजगार के रेमिटांस पर उत्सव मनाया गया। युवा युवतियों को विदेसी के हाथों का खिलौना बनाकर खुदको बीर बहादुर का संतान कहकर गौरव करने बाले आजके भस्मासुर को भावी परिणाम का कुछ वोध तो था नहीं। आज लाखों नेपाली युवा युवती कोरोना महामारी के कहर से विदेस में लड़ने को वाध्य है। नेताओं ने उनकी जवानी तो लुटा ही अब जीवन भी लुटने पर उतारू हैं। शाषक भ्रष्ट होनेपर नागरिक को दुःख भोगना ही पड़ता है। यही हालत आज नेपाल का है। अब जबकि बिदेस में फ़से नेपालीयों को हर हालत में लाना तो पड़ेगा ही, फिर उनको जीवन यापन के लिए यहाँ कौन सा काम होगा? सरकार क्या व्यवस्था करेगी? पराधीन- परपीड़क सरकार से शुभ संकेत तो कदापि नहीं मिल सकता। हा, सामाजिक व्यवस्थापन के नाम पर नयाँ क्रान्ति हेतु मधेसी कृषको को दरिद्र बनाने का योजना जरुर लाया जाएगा। मधेस को हड़पने के लिए मधेसियों को दरिद्र, मजबूर, कमजोर और दिशाहीन बनाना ही खासवाद का लक्ष्य है और आपसी कलह तथा षडयंत्र में जीना मधेसियों का लक्ष्य है। अतः हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारा जो आधार सतम्भ कृषि था और है, उसे कैसे वैज्ञानिक बनाया जाय! कैसे समय-सापेक्ष उत्पादनमूलक बनाया जाय! केंद्र सरकार के उदासीनता के वावजूद भी हम अपनी भूमि का वैज्ञानिक रूपसे चकालाबंदी कर अत्यधिक उत्पादन ले सकते हैं। किशान के व्यक्तिगत बलबूते से अब भूमि का पूर्ण सदुपयोग नहीं किया जा सकता है। 500 बीघा के क्षेत्र को सामूहिक रूपसे निजी संस्थाओं से सम्बधन करके पानी, खाद, बीज और बाजार का जिम्मा कंपनियों के हाथों में देकर हम कम लागत में अत्यधिक उत्पादन और आमदानी कर सकते हैं। इसमे कृषक को न खाद बीज तथा पानी का चिंता रहेगा न बाजार का। व्यक्ति व्यक्ति को नलकूप तथ उत्तम खाद बीज के लिए परॆसान होने की कोई जरुरत नहीं। किसान के जिम्मे सिर्फ कृषि कार्य  और संरक्षण करना ही रह जाएगा।
इस प्रकार हम वर्तमान समय में आधुनिक ढंग से बड़ी ही सहजता और समस्वरता पूर्वक जीवन को जी सकते हैं। इसी में हमें पूर्ण आत्म सम्मान, स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता का आनंद भी प्राप्त हो सकेगा। अन्यथा समूल नष्ट ही लक्ष्य होगा।

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