बात खतम : लक्ष्मण नेवटिया
उसने कहा
क्या तुम अंधे हो
मैंने उधर देखा ही नही
बात उसने कह ली
और मैंने सह ली
बात खतम ।
उसने कहा
क्या तुम अपाहिज हो?
मैं उधर गया ही नहीं
बात उसकी रह ली
और मैंने सह ली
बात खतम ।
उसने कहा,
क्या तुम बहरे हो?
मैंने कर दी अनसुनी,
बात उसने कह ली,
और मैंने चुप रह सुन ली,
बात खतम ।
उसने कहा,
क्या तुम गधे हो,
मैं रहा चुप’
किया नहीं ढेचूं ढेचूं,
वह हो गया उदास,
बात खतम ।
वो पीड़ित स्वयं इनसे,
मानसिक रूप से,
जीतना चाहता था मुझसे,
पर जब मैंने,
स्वयं मान ली हार,
बात खतम ।

विराटनगर -९


