कोरोना वायरस वैक्सीन का आज इंसानों पर ट्रायल, टकटकी लगाए दुनिया देख रही है
अजय श्रीवास्तव
आज दुनिया भर के स्वास्थ्य वैज्ञानिकों की नजर आँक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी पर टिकी रहेगी क्योंकि ये संस्था वैक्सीन का जानवरों पर सफल परीक्षण के बाद इंसानों पर अपना प्रयोग करेगा । इस वैक्सीन को आँक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में तीन चरणों में 510 वालंटियर्स पर यह ट्रायल किया जाएगा । इस वैक्सीन पर काम करनेवाले इसके शुरुआती परिणाम देखकर काफी आशान्वित हैं । विश्व प्रसिद्ध “वैक्ससीनोलाँजिस्ट और जेनर इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर एड्रियन हिल का दावा है कि अगले पाँच महीने में वैक्सीन तैयार हो जाएगी । उन्होंने यहाँ तक कहा कि यद्यपि दुनिया भर में रिसर्च चल रहे हैं मगर हम वास्तविकता के बेहद करीब हैं । अगर कोई मानवीय चूक नहीं हुई तो हमारा ये ट्रायल सुरक्षित रहेगा । हमारी ये कोशिश है कि इस वैक्सीन के जरिए लोगों को सुरक्षा प्रदान की जाए । हमारा ये टारगेट है कि हम अगस्त-सितंबर तक यह वैक्सीन तैयार कर लेंगे । वैक्सीन की खोज के बाद अगला पड़ाव इसे बडे मात्रा में तैयार करना होगा जो मुश्किल नहीं है । प्रोफेसर एड्रियन हिल ने कहा कि सितंबर तक एक मिलियन डोज तैयार कर लिए जाएंगे जबकि 2020 के अंत तक 100 मिलियन डोज तैयार कर लिया जाएगा ।
प्रोफेसर ने अपने दावों के बीच आशंका भी जताई कि किसी भी वैक्सीन के ट्रायल के कई जोखिम भी होते हैं । जब तक यह सफल न हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता है । प्रोफेसर ने जोर देकर कहा कि हमारा प्रयोग जानवरों पर शत प्रतिशत सफल रहा है, यही वजह है कि हम इसके परिणाम को लेकर काफी आशान्वित हैं ।
ब्रिटिश स्वास्थ्य मंत्री मैट हैनकॉक ने मंगलवार को इसकी जानकारी देते हुए कहा कि गुरुवार को इंसानों पर इस वैक्सीन का प्रयोग किया जाएगा । उन्होंने दबी जुबान में ये स्वीकार किया कि इसकी सफलता के बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी । आपको बता दें ब्रिटिश सरकार ने टीका विकास परियोजनाओं में शामिल प्रत्येक के लिए बीस मिलियन के सार्वजनिक धन का वायदा किया है ।
मैट हैनकॉक ने कहा कोरोना वायरस को हराने का सबसे अच्छा तरीका एक वैक्सीन है, क्योंकि यह एक नई बीमारी है, यह अनिश्चित विज्ञान है । लेकिन मुझे यकीन है कि हम वैक्सीन विकसित करने के लिए अपना सबकुछ दाव पर लगा देंगे । पैसे की कमी आडे आने नहीं दी जाएगी।
इसी बीच “आब्जर्वर” के साथ एक साक्षात्कार में विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेष दूत डेविड नाबरो ने चेतावनी दी है कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आनेवाले महीनों में एक कोरोना वायरस टीका सफलतापूर्वक विकसित किया जा सकता है । लोगों को भविष्य के लिए कोरोना वायरस के खतरे के साथ रहना होगा और उसी के अनुसार अनुकूलित करना होगा क्योंकि कोई गारंटी नहीं है कि इसका टीका सफलतापूर्वक विकसित किया जा सकता है । लोग चाहते हैं कि टीके की खोज तुरंत हो जाए और वे सुरक्षित हो जाएं।ऐसा जरूरी नहीं है कि जो वैक्सीन विकसित हो पूर्णतया कारगर हो,सुरक्षित हो और प्रभावी हो । कुछ वायरस बहुत हीं मुश्किल होते हैं और ये तो बिल्कुल खतरनाक है ।
डेविड नाबरो जो एक बडे स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं उनका मानना है कि भविष्य के लिए हमें इस वायरस के साथ एक निरंतर खतरे के रूप में जीवन के बारे में जीने के तरीक़े खोज़ने होंगे । इसका मतलब है कि जिन लोगों में कोरोना के लक्षण दिखलाई देते हैं उन्हें क्वारेंटाइन करना होगा और जिन लोगों में इसके लक्षण नहीं हैं उनकी रक्षा करनी होगी । हमें इस महामारी से निपटने के लिए अस्पताल की क्षमता सुनिश्चित करनी होगी ।
आज जब अमेरिका ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को मिलने वाली सहायता को रोक दिया है तब से WHO के स्वर बदले बदले से हैं । अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ये आरोप लगाया है कि WHO कोरोना वायरस के फैलने में अपनी भूमिका साबित करने में पूर्णतया असफल रहा है । ट्रंप का कहना है कि जब WHO को 31 दिसंबर को हीं इस संक्रमण की जानकारी मिल गई थी तो उन्होंने वैश्विक यात्रा रोकने के लिए मना क्यों नहीं किया । अगर यात्रा रोक दी गई होती तो आज इतनी बडी जन-धन की हानि नहीं होती । आपको बता दें अमेरिका अकेले WHO के फंड में चालीस से पचास करोड़ डालर सालाना देता है जबकि चीन का योगदान महज चार करोड़ डालर सालाना है।
जहाँ तक मेरा मानना है इस मामले में WHO पूरी तरह असफल हीं साबित हुआ है । दुनिया के पैसों से ऐश करनेवाले ये अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में पूरी तरह असफल रहें हैं फिर सहयोग की मांग करना बेमानी हीं तो है । आज फिर WHO ने अमेरिका से गुहार लगाई है कि वे इस संगठन की सहायता को न रोकें, नहीं तो बहुत से खोज और प्रोजेक्ट पैसे के अभाव में रूक जाएंगे । शायद आपको नहीं मालूम WHO के हेड चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बेहद करीबी हैं क्योंकि वे भी साम्यवाद को मानने वाले लोगों में से एक हैं ।
आज अकेले अमेरिका में 8,42,000 लोग कोरोना संक्रमित हो गए हैं जबकि 50,000 लोग कालकवलित हो चुके हैं।ये आँकडा कहाँ जाकर थमेगा कोई नहीं जानता । भारत में भी कोरोना संक्रमितों की संख्या लगातार बढती जा रही है।एक सरकारी आँकड़े के मुताबिक बीते आठ दिनों में हीं संक्रमण के 10,000 मामले सामने आए हैं । भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या 20,000 पार कर गई है जो सभी को डरा रही है । गौरतलब है कि भारत में बेहद कम टेस्ट हो रहें हैं । विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ज्यादा मात्रा में टेस्ट हो तो ये आँकडा दोगुने से भी ज्यादा होगा । स्वास्थ्य विभाग के अनुसार भारत कोरोना संक्रमित देशों की फेरहिस्त में 17 पायदान पर आ गया है, जो हमें चिंतित कर रहा है । इतने बड़े देश में सभी का टेस्ट कराना हमारे बूते का नहीं है । हम तो डाक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को वो कपडा, मास्क और दास्तान नहीं दे पा रहें हैं जिनको पहनकर उन्हें ईलाज करना है । हमें सोचना होगा कि उनके सम्मान में ताली-थाली बजवाने से बेहतर उनके लिए वो किट उपलब्ध कराना ज्यादा महत्वपूर्ण है, जिसे पहनकर वो संक्रमित मरीजों का इलाज करेंगे।
आपको बता दें मनुष्यों में पहली बार कोरोना वायरस की खोज जून अलमेडा ने सन् 1964 में लंदन के सेंट थाँमस अस्पताल में स्थित लैब में की थी । आज 56 साल बीत जाने के बाद भी जब इंसान ने चाँद पर अपने कदम रख दिये हैं,इस वायरस के वैक्सीन की खोज न की जा सकी जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
साल 2002 में सार्स(SARS) का वायरस फैला था । इस वायरस के अधिकांश लक्षण कोविड-19 से मिलतेजुलते हैं । दोनों के हीं विषाणु अनुवांशिक रूप से 80% समान है । उस समय जोरशोर से इसके वायरस के वैक्सीन की खोज शुरू हुई थी मगर कुछ हीं दिनों बाद ये विलुप्त हो गया । कोई भी सरकार या कंपनी इसके रिसर्च पर पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं हुआ, मजबूरन इसके रिसर्च को बंद करना पडा था।साल 2012 में इस वायरस ने मिडिल ईस्ट रेसपीरेटरी सिंड्रोम(मर्स-कोव) के रूप में सर उठाया । फिर रिसर्च शुरू हुई मगर थोडे हीं दिनों में ये वायरस स्वतः हीं कमजोर पड गया मगर इस बार 2016 में कुछ लोग अपने रिसर्च के द्वारा वैक्सीन बनाने में बहुत हद तक सफल भी हो गए मगर उनकी बनाई दवा बाजार में नहीं आ पाई, कारण कोई भी इस प्रोजेक्ट में पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं था । प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया । आज जब कोविड-19 सर चढ बोल रहा है तो उस प्रोजेक्ट की फाइलों से धूल पोंछा जा रहा है और स्टडी की जा रही है । काश अगर हम इन 56 सालों में सार्थक प्रयास करते तो आज हमें लाखों बेकसूर जिंदगियों से हाथ नहीं धोना पड़ता।
हमें उम्मीद है कि हमारे वैज्ञानिक जरूर इस महामारी से बचाने का वैक्सीन तैयार कर लेंगे । जितना नुकसान होना था हो लिया है अब भी बहुत बहुमूल्य इंसानी जिंदगियों को बचाया जा सकता है।


