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मधेशवादी दल प्रति प्रधानमन्त्री ओली में बदला की भावना

 

काठमांडू, २४ अप्रील । यह निश्चित है कि बिगत ४ दिनों की राजनीतिक घटनाक्रम की चर्चा आगे कई महीनों तक जारी रहनेवाला है । गत सोमबार सरकार द्वारा जारी राजनीतिक दल विभाजन संबंधी अध्यादेश का प्रमुख लक्ष्य समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) की ओर था । सरकार अध्यादेश के बल पर दोनों पार्टी को विभाजन कर रहा था । लेकिन समाजवादी और राजपा सम्बद्ध शीर्ष नेतृत्व की ओर से रातो–रात जो निर्णय किया गया, उससे प्रधानमन्त्री ओली सम्पूर्ण रुप में असफल हो गए । अन्ततः समाजवादी–राजपा ने पार्टी एकता की, सरकार ने अपने अध्यादेश वापस किया ।

ओली ने ठान लिया कि अब पार्टी को ही विभाजन क्यों ना करें

आखिर प्रधानमन्त्री ओली तत्कालीन समाजवादी और राजपा के प्रति क्यों इसतरह नाराज दिखाई दे रहे हैं ? क्यों वह दोनों पार्टी में विभाजन चाहते थे ? प्रधानमन्त्री ओली द्वारा बुधबार मन्त्रिपरिषद् बैठक में व्यक्त अभिव्यक्ति पर थोड़ा–सा ध्यान देते हैं तो कुछ रहस्य समझ में आ जाता है । उक्त अभिव्यक्ति से स्पष्ट होता है कि प्रधानमन्त्री ओली में मधेशवादी दलों पर आज भी बदला की भावना है । मन्त्रिपरिषद् बैठक में अध्यादेश संबंधी प्रसंग में उन्होंने स्पष्ट कहा था– ‘मधेश में मुझे क्यों प्रतिबंध किया ?’

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हां, दल विभाजन संबंधी अध्यादेश और समाजवादी पार्टी विभाजन के लिए किया गया सम्पूर्ण हरकत के पीछे प्रधानमन्त्री में रहे यही बदला की भावना प्रमुख कारण है । प्रधानमन्त्री ओली ने कहा है कि वि.सं. २०७०–०७१ में जारी मधेश आन्दोलन के दौरान मधेशवादी दलों ने उनको मधेश में प्रतिबंध किया है । इसमें सत्यता भी है । मधेश आन्दोलन के दौरान तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष ओली और नेकपा एमाले संबंद्ध शीर्ष नेतृत्व को तराई–मधेश के जिलों में प्रवेश करना नामुकिन था । विभिन्न समूह में विभाजित मधेशवादी पार्टी (जनता समाजवादी पृष्ठभूमि) के नेता–कार्यकर्ताओं की मूल तार्गेट तत्कालीन एमाले अध्यक्ष ओली पर ही था । संविधान संशोधन संबंधी विषयों को लेकर जारी आन्दोलन में भी ओली द्वारा व्यक्त भावना को लेकर तराई–मधेश में तीव्र असंतोष पैदा हुई ।

जिसके चलते घोषित रुप में ही तत्कालीन मधेशवादी दलों ने उस समय ओली और एमाले नेताओं को तराई–मधेश जिला (विशेषतः आज के २ नं. प्रदेश) के भीतर प्रवेश निषेध किया । बुधबार आयोजित मन्त्रिपरिषद् बैठक में प्रधानमन्त्री ओली ने उसी घटना की ओर संकेत करते हुए कहा कि मुझे मधेश में प्रतिबंध करनेवाले…! तत्कालीन समय में ओली द्वारा व्यक्त विचार मधेश आन्दोलन में ‘आग में घी’ का काम कर रहा था । ओली द्वारा व्यक्त ‘माखे साङ्लो’, गिर हुआ आम’ जैसे कई शब्द के कारण मधेशी जनता ओली से आक्रोशित थे । जारी आन्दोलन में ऊर्जा भरने के लिए आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करे रहे मधेशवादी नेताओं ने भी ओली अभिव्यक्ति को काफी प्रयोग किया ।

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उसका प्रभाव स्थानीय चुनाव और केन्द्रीय चुनाव तक पड़ गया, तत्कालीन एमाले संबंद्ध नेता–कार्यकर्ता खुलकर तराई–मधेश के कई जिलों में नहीं जा पाए । तराई–मधेश में मधेशवादी दल ही हाबी हो गए । लेकिन समग्र चुनावी परिणाम में एमाले–माओवादी गठबन्धन को ही बहुमत मिला । ओली ही प्रधानमन्त्री बन गए । लेकिन प्रधानमन्त्री ओली में बदला की भावना खत्तम नहीं हो रहा था ।

 

इसीलिए वह समाजवादी और राजपा को विभाजन करना चाहते थे । दो वर्षीय कार्यकाल में समाजवादी और राजपा के साथ प्रधानमन्त्री ओली जिसतरह पेश आ रहे है, उससे भी स्पष्ट होता है कि प्रधानमन्त्री ओली की नजर में समाजवादी और राजपा की कोई मूल्य नहीं है । विशेषतः संविधान संशोधन संबंधी मुद्दा में ऐसी रुख देखन को मिलता है । संविधान संशोधन संबंधी मुद्दा उठाने पर ही तत्कालीन समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव को सरकार से हटने के लिए बाध्य होना पड़ा । समाजवादी पार्टी सत्ता से बाहर होते ही उन्होंने राजपा नेपाल को सत्ता में लाने की कोशीश की । लेकिन राजपा की प्रमुख मुद्दा ‘संविधान संशोधन’ प्रधानमन्त्री ओली सुनने के लिए तैयार नहीं थे ।

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ओली ने ठान लिया कि अब पार्टी को ही विभाजन क्यों ना करें !

गत सोमबार से बुधबार तक जो–कुछ भी हुआ, वह प्रधानमन्त्री ओली की मानसिकता से सिर्जित घटनाओं की क्लाइमेक्स था । तब भी ओली अपने अभियान में असफल हो गए । लेकिन नेकपा निकट कार्यकर्ताओं को मानना है कि ओली में उक्त बदला की भावना आज भी शान्त नहीं है, वह कभी भी नयां चाल के साथ आगे आ सकते हैं ।

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