“प्रवृत्ति – प्रभाव और परिणाम”
क्या मान लिया जाए कि “कालीदास प्रवृत्ति” के चक्रव्यूह में घिरा नेकपा “भस्मासुर चरित्र” आलिङ्गन कर लिया है ?
पाखण्डियों के “कर्मकाण्डी गणतन्त्र” में ओली के विकल्प का मतलब गणतन्त्र का विकल्प साबित न हो, इसकी क्या ग्यारेन्टी है ?
पदलोलुपता और उच्च-घृणित स्वार्थ सिद्धि ही “लोकतान्त्रिक आन्दोलन की प्राप्त उपलब्धियाँ” है क्या ?
भूत और वर्तमान की घटनाक्रम को सूक्ष्म अध्ययन किया जाए तो ओली ही सिर्फ “ओलीतन्त्र या ओली प्रवृत्ति” का दोषी नहीं लगता, हरेक दल भीतर और हरेक दल के दलपति एवं गुटपतियों के मन-मस्तिष्क-चरित्र-क्रियाकलाप- कार्यशैली-संस्कार-संस्कृति में “संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपाल की संविधान -२०७२” ने बहुत अन्दर तक अपना प्रभाव और प्रभुत्व स्थापित किया हुआ लगता है । इतिहास का पन्ना पलट कर देखें या अपनी स्मृति पर जोर दें तो, नेपाल के शीर्ष राजनीतिक ब्यक्तित्वों का ब्यवहार और कार्यशैलियों की तुलनात्मक विश्लेषण करने से लगता है कि नेपाल की संसदीय प्रणाली ही “विकृत एवं घृणित” हो गयी है, व्यवस्था भीतर की अब्यवस्था और जनादेश का अवमूल्यन, दम्भ, अहंकार नेपाली राजनीति का संस्कार ही बना हुआ महसूस होता है । समयानुकूल स्व-स्वार्थ सिद्धि हेतु ऐनकानून और संविधान एवं समय-परिस्थिति की ब्याख्या करते हुए प्रयोग एवं उपयोग-उपभोग करना ही नेपाल के राजनीतिक शब्दकोष में प्रजातन्त्र – लोकतन्त्र – गणतन्त्र कहा गया है । गिरगिट-चरित्र (Lizard Character) को प्रगतिशील, द्वन्द-ब्यापारी को क्रान्तिकारी, विध्वंसात्मक सोच से ग्रस्त को विकास पुरुष, आत्मसमर्पणवादी को कुटनीतिज्ञ, सुविधाभोगी को सन्यासी, भ्रष्ट एवं दुराचारी को स्वच्छ, क्रूर तानाशाह को प्रजातन्त्रवादी/लोकतन्त्रवादी नेपाली राजनीतिक शब्दकोष के प्रचलित एवं विख्यात शब्द है ।
स्व-अनुकूलता एवं स्व-प्रतिकुलता के हिसाब से शब्द जाल बुनना और उसका प्रयोग-उपयोग-उपभोग करने की कला में माहिर नेपाल के तथाकथित शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व स्व-स्वार्थ सिद्धि के सिद्धान्त में भी उतना ही माहिर है जितना गिरगिट अपना रंग बदलने में होता है । परन्तु वो स्व-स्वार्थ सिद्धि में इतना लीन हो गए है कि इतिहास को ही भुला दिए हैं, वो कालीदास प्रवृत्ति अपनाकर खुद को महा-पण्डित कालीदास समझ बैठे हैं क्योंकि कालीदाल के जीवन के दो पहलुओं में से एक ही पहलु को याद रखे है ।
वो खुद को भष्मासुर की तरह महा-पराक्रमी, महा-बलवान, अजय और हर परिस्थिति के लिए सक्षम और समर्थ समझते हैं पर भष्मासुर के जीवनकाल का दूसरा इतिहास और यथार्थ को भुला दिए हैं । वो ये बिल्कुल भुला दिए हैं कि, चरित्र जब चरितार्थ हो जाए, प्रवृत्ति जब प्रावधान की सभी सीमाएँ लाँघ जाए तो परिणाम बहुत ही भयानक हो जाता है । क्योंकि परिणाम निर्मम होता है कठोर होता है । परिणाम का पूर्व आकलन और विचार-विमर्श से अगर चरित्र, आचरण, प्रवृत्ति, ब्यवहार, संस्कार, संस्कृति का अनुसरण किया जाए तो उसका प्रभाव भी अनुकूल होता है और परिणाम भी सकारात्मक फलदायी होता है । इतिहास के पन्नों से सीख लेने के बजाय इतिहास को ही बदलने की कुचेष्टा करने बालों को भविष्य के निर्मम एवं कठोर प्रहार के लिए भी तैयार रहना चाहिए, समय के चक्र को ही बदलने का दिवा-स्वप्न देखनेबालों को अपना हद कभी भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि जो कोई भी अपने हद से बाहर जाने का दुस्साहस करता है उसका वर्तमान और भविष्य दोनो ही अस्तित्वहिन होना निश्चित है ।
तसर्थ, किसी दूसरे के चरित्र, प्रवृत्ति का विश्लेषण करने से परहेज करें, खुद का चेहरा एकबार आइने में देखने की हिम्मत करें । आत्मसमीक्षा, आत्मालोचना और भूल-सुधार ही ब्याक्तित्व विकास का माध्यम है । जिसका खुद के मुँह में कालिख पोता हो वह दुसरें को आँखें दिखाना कहाँ की बुद्धिमता और बहादुरी है ? राजनीतिक बिचलन, सैद्धान्तिक विसर्जन, द्वन्द उन्मुख राष्ट्र और समाज निर्माण को अब पूर्णबिराम लगाना ही होगा ।।
चेतनशील बने, मर्यादित रहे !
अनुशासित बने और सैद्धान्तिक राजनीति करें !!
अहिंसा पर्मो धर्म : !! धर्मो रक्षती रक्षित: !!
डा. मनोज मुक्ति “विवेक”
(डा. मनोज कुमार झा)
राष्ट्रिय अध्यक्ष
जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चा

