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इन्सानियत धर्म निभाए : ज्योति अग्रवाल

 

अहसास हुआ है मानव को, करी उसने नादानी है।
अब न गंदा होगा कभी, गंगा का पानी है।
खिलवाड करके कुदरत से, भुगत रहा इन्सान है।
रब की बनाई धरती पे, मानव बस मेहमान है।
जाने कितनो को रौंदकर, सीढी चढा है सफलता की।
समझना मुश्किल है किसने, खाल पहनी लोमडी की।
जो हुआ सो हुआ, अब न गल्ती दोहराए हम।
समझ इसको आखरी चेतावनी, इन्सानियत धर्म निभाए हम।

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ज्योती अग्रवाल, काठमांडू

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