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एक ज्वलंत प्रश्न–कुरूप लड़की होती है या कुरूप मानसिकता वाला हमारा समाज है…** : “नव्या”

 
रीमा मिश्रा”नव्या”
 जब हम कहीं जाते है तो लोगों से मिल उनके बारे में जानना, बातें करते हुए विचारों का आदान प्रदान करना और सबसे दिलचस्प उनकी और अपनी सोच का विश्लेषण उस समय आसानी से किया जा सकता है ।
      पिछले दिनों मेरे साथ भी ऐसा  हुआ, जब शादी के लिए मेरे बायो-डाटा बनाने की बात छिड़ी। कुछ लोगों से बात करते हुए उनकी मानसिकता से परिचित होने का अवसर मिला । बातों का सिलसिला यूँ चल पड़ा कि  – -विवाह योग्य हो जाने पर किसी भी लड़की और लड़के के बायो – डाटा  में उसके रंग के विषय में क्यों लिखा जाता है । क्या मात्र रंग ही व्यक्ति की पहचान होती है …?
उसका व्यवहार और उसकी बुद्धि का उसके जीवन में कोई महत्व नही है…?
क्यों जब परिवार वालों के सम्मुख लड़के और लड़की को मिलाया जाता है तो उस समय लड़की के चलने , बैठने , उठने की प्रक्रिया को उस लड़के के पारिवारिक सदस्य अथवा अन्य रिश्तेदार गौर से दृष्टि लगाये देखते है…?
यह सब एक महिला की बातें सुन मैंने भी अपना विचार रखा और कहा—  उस समय विवाह हो भी जाता है और विवाह उपरांत वह लड़की सबके दिलों में अपना स्थान बना भी लेती हो , किंतु कभी  एक वक़्त ऐसा आ जाये  जिसमे उसी लड़की के अकस्मात अत्यधिक चोट लग जाए और उसके शरीर की कई हड्डियाँ टूट जाए और वह चलने में असमर्थ होने के कारण अपने कार्ये करने में भी सक्षम ना हो तथा उसका वह रूप  भी पहले जैसा ना रहे  जिस रूप और रंग पर आसक्त हो कर उस लड़के के घरवालों ने हामी भरी थी ,  और स्वयं उस लड़के ने सातवचन ताउम्र निभाने का वादा उस पूरे समाज  के सामने उस लड़की से किया था तो ऐसी स्थिति में यदि वह लड़का उसे छोड़ दे अथवा उससे तलाक ले ले तो उस लड़की की कहा गलती है …?
क्या उसका वह रूप रंग ही  उसे उस घर में स्थान दिला पाने में सफल हुआ था , जो अब कुरूप होने पर  उसके लिए अभिशाप बन गया…?
तभी हमारे गाँव के एक बुजुर्ग सदस्य जो कि वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर है, हमारे ही देश की पिछले दिनों एक घटी घटना को हमसे साझा करा जिसने हमें हैरान और विचलित कर हमारी  शिक्षा प्रणाली के विषय में प्रश्न चिन्ह लगा दिए।
उन्होंने बताया –  महाराष्ट्र के औरंगाबाद के हायर सेकेंडरी स्कूल के सोशलॉजी के एक चैप्टर में विद्यार्थियों को “भारत की बड़ी समाजिक समस्याएं के अंतर्गत यह पढ़ाया जा रहा है कि बदसूरत और दिव्यांग लड़कियों को ज्यादा देना पड़ता है दहेज”।
 यह सत्य है कि आधुनिक कहे जाने वाले भारत में ऐसे विषयों को  समाचार पत्र में स्थान मिलना आकर्षित करेगा ।आज हम 2020 में प्रवेश कर चुके हैं अथवा कह सकते हैं कि 21वीं सदी में आधुनिक और अत्यंत खूबसूरती से जीना आ गया है हमें । हमने प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति करते हुए विश्व के प्रति जो अपना विशेष स्थान सुनिश्चित किया है , क्या वह मात्र मान लेने से  हमें संतुष्ट हो जाना चाहिए।
       आज जिस प्रकार भारत में स्मार्ट सिटी , स्मार्ट एजुकेशन की बड़ी बड़ी  योजनाएं बनाई जा रही है क्या उनके बनाने मात्र से हम आधुनिक हो गए…?
 प्रश्नों का मन में उठना स्वभाविक है। ऐसे शब्दों का पाठ्य पुस्तक में गलत छपने से द्वि अर्थ रूप में अपनी व्याख्या देते इन शब्दों को भारत को आगे ले जाने वाले भविष्य रुपी इन छात्रों को विद्यालयों में पढ़ाया जाना कितना उचित है । इस समाचार ने आधुनिक कहे जाने पर प्रश्नचिंह लगा दिया । समाज में मुट्ठी भर संकीर्ण मानसिकता लिए हुए लोगों के कारण संपूर्ण समाज को एक ही चश्मे से देखने पर विवश कर दिया है।
     यद्यपि समाज में लड़की का बदसूरत अथवा दिव्यांग होना एक अभिशाप है तो उपरोक्त वक्तव्य से सुंदरता कहां तक सफल होती है।
               हमें अपने इतिहास की उस घटना को नहीं भूलना चाहिए जहां रानी पद्मावती जो अत्यधिक रूपवान मानी जाती थी तथा जिसने पति के मारे जाने पर अलाउद्दीन के भय से जोहर कर अग्नि में आहुति दे दी क्योंकि वह रूपवान थी। सुंदरता और कुरूपता किसी भी व्यक्ति के व्यव्हार और बुद्धि की सफलता को मापने का पैमाना नहीं बनाना चाहिए।
          आजादी पूर्व भारत के समाज सुधारक राजा राममोहन राय,  रवीन्द्रनाथ टेगोर जैसे  समाज सुधारको ने स्त्रियों, लड़कियों को उनकी सुंदरता और कुरूपता के आधार पर समाज में सम्मान दिलाने के लिए आंदोलन नही किए अपितु उनका आजीवन सम्मान बना रहे इसके लिए उन्होंने नारी शिक्षा पर  बल दिया । क्या केवल इसलिए यह सब उन्होंने किया था की एक दिन  आजाद भारत अपनी संकीर्ण और संकुचित मानसिकता लिए ही अपना आधुनिक भारत का निर्माण करेगा…?
    लड़की की सुंदरता और दिव्यांगता का आकलन हम उसके रूप , वर्ण अथवा शारीरिक गठन से कर लेते हैं भीतरी सुंदरता तक तो हमारा ध्यान जाता ही नहीं…।
  थोड़ा इधर  गौर किया जाए तो सुंदरता ही सबकुछ होती तो वर्तमान समय में आज भी कोई लड़का अपना प्रेम असफल होने पर अथवा लड़की द्वारा उस के प्रस्ताव को ठुकराने पर तेजाब उस पर नही फेकता।
  ऐसे दुष्कर्मों का मूल कारण उसका प्रेम नही होता बल्कि संकीर्ण मानसिकता लिए हुए उस पुरुष का  अहं होता है जिसे वह एक लड़की के समक्ष स्वयं को हारा हुआ मान लेता है।
क्योंकि प्रेम करने वालों के लिए प्रेम मात्र शरीर तक ही सीमित नही होता । उनके लिए प्रेम एक पवित्र शब्द है इस राह पर वही कदम रखते है जो इसे निभाने में विश्वास रखते है।  इस राह पर चलकर वह अपने प्रेमी के साथ प्रत्येक सुख दुख बाँटते हुए इस रिश्ते को निभाते हुए अलग मिसाल कायम करते है।
       किन्तु वर्तमान समाज में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।
   आज परिस्थितियां ऐसी हो गयी है कि कई बार अधिक दहेज की आशंका के कारण अथवा किसी लड़की के अशक्त होने पर परिवार वाले जबरन उसका विवाह उसकी आयु के अधिक उम्र के पुरुष से करा देते हैं , जिससे परिवारजन को  सुविधा हो जाती है किंतु वह लड़का लड़की को अशक्त एवं  निर्बल समझ उसके साथ जबरन संबंध बनाने का प्रत्यन करता है।
   देखा जाए तो दोनों ही स्थितियों में एक लड़की के शरीर के साथ – साथ वह आत्मा पीड़ित होती है जो समाज में सम्मानीय स्थान  पाने योग्य होती है।  किंतु अपनी ऐसी अवहेलना होते देख वह इसी समाज को जिसे वह अपना  निर्माता समझती होती है , भ्रम टूटने पर उसे ही बदसूरत की परिभाषा देने पर विवश हो जाती है…।
         ऐसे विषयों और घटनाओं  के माध्यम से हम अपने मानव मूल्यों को हानि पहुंचाने के लिए जिस शिक्षा का निर्माण कर रहे हैं क्या वह उचित है …?
    आज देश कई नए कार्यक्रम और विजन बना रहा है , इसके लिए भारत सरकार ने ‘बेटी बचाओ-  बेटी पढ़ाओ’,  अशक्त को दिया नया शब्द “दिव्यांग”,  ‘सुकन्या लाडली योजना ‘आदि कई योजनाओं एवं विजन को अपने समक्ष रख  निरंतर प्रयास में लगी हुई है । ऐसे समय में शिक्षा के पाठ्यक्रम में ऐसे पाठों का अध्ययन कराना जिससे समाज का भविष्य गलत सीमित वर्गों तक सिमट कर रह जाएगा कहां तक उचित है…?
 प्रारम्भ से दी हुई शिक्षा का ज्ञान ही आगे चलकर एक शिक्षित और एक अच्छी मानसिकता को विकसित करने में सहायक होता है। यह हमें सोचना है कि हम समाज में कैसी मानसिकता को विकसित कर रहे है।
     मेरे विचारानुसार समाज में लड़की का बदसूरत होना और दिव्यांग होना अथवा सुंदर होना  इतना प्रभावित नहीं करता । मूल समस्या यह है उसमें ईश्वर द्वारा दिए अनंत गुणो , असीम शक्ति का होना तथा प्रत्येक क्षेत्र एवं  प्रत्येक कार्य में निपुण होना…।
  जब से  इस सृष्टि का निर्माण हुआ तब से आज  तक एक मात्र तुलसी ऐसा पौधा है जिसमें फूल कभी नही आते फिर भी वह अनेक औषधियों का काम करती है और हमारे अनेक रोग दूर करती है। उसी प्रकार एक स्त्री भले ही सुन्दर ना हो किन्तु वह तुलसी समान अपने में  निहित गुणों और कार्यों से समाज में अपनी भूमिका निभाती आयी है। यदि मेरी इस  बात में कोई संदेह लगा  हो तो एक दृष्टि अपनी माँ और अपनी बहनों के कर्तव्यों पर भी डाल कर मेरी इस बात का स्वयं ही विश्लेषण कर लीजिये …।
वह विवाह पूर्व और विवाह उपरान्त भी पूरे परिवार, समाज के समक्ष आने वाली मुसीबतों का सामना करते हुए अपने कर्तव्यों को निभाती है, हमें यह कदापि नही भूलना चाहिए।
    आज समाज से इस अन्याय को  मिटाने के लिए लड़की के पास एकमात्र अस्त्र  है – “उसकी शिक्षा”।  जिसे प्राप्त कर वह अपने ज्ञान की कला से अपनी कुरूपता  और दिव्यांगता को पराजित कर सकती है जैसे आज समाज में अनेक लड़कियों ने कर दिखाया है ।
कुछ वर्ष पूर्व एसिड अट्टेक का शिकार हुई लक्ष्मी , सोनाली मुखर्जी जैसी अनेक लड़कियों ने आज अपने हुनर और संघर्ष से समाज में अलग पहचान बनाई है…।
एक मशूहर डांसर और एक साधारण लड़की सुधा चन्द्रन ने  किसी दुर्घटना में अपना पैर गवाँ दिया किन्तु फिर भी उन्होंने हार नही मानी और कृत्रिम पैर लगवा कर पुनः डांस करना प्रारंभ कर दिया और सभी के लिए आदर्श बन इस समाज का सामना किया।
  उसी तरह कुछ वर्ष पूर्व इरा सिंघल जो भारतीय सिविल सेवा में कार्यरत हैं। वह संघ लोक सेवा आयोग द्वारा वर्ष 2014 में आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। सिंघल चौथी बार में ये कामियाबी प्राप्त कर सकी हैं और वह पहली अपाहिज महिला हैं जिन्होंने सर्वजनिक श्रेणी में ऊँचा स्थान पाया है।
2010 में भारतीय राजस्व सेवा की परीक्षा में सफल होने के पश्चात भी अधिकारियों ने उनको  किसी वस्तु को “ढकेलने, खींचने या उठाने की अयोग्यता” का हवाला देते हुए उस पद को देने से मना कर दिया था।  इसके पीछे इरा की स्कोलियोसिस की समस्या थी।
 किसी विचारक ने सही कहा है कि – “हमें जीवन से सब कुछ मिल सकता है, लेकिन उसकी एक कीमत होती है, चाहे वह मेहनत के रूप में हो, राशि के रूप में या भावना के रूप में। यदि हम वह कीमत चुकाने को तैयार हैं, तो हम हर असाधारण सफलता को प्राप्त करने का सपना देख सकते हैं…। “
    फिर वह दिन दूर नहीं जब निश्चय ही लड़की का बदसूरत और दिव्यांग होना समाज की उस सुंदरता को उसका बदसूरत आइना दिखा देगा जिसके नशे में वह अब तक जीता आया है । लड़की की शिक्षा से समाज अपनी मानसिकता को टटोलने पर  स्वयं विवश हो जाएगा।
             फिर किसी लड़की के बायो डाटा में यह नही लिखा जायगा की उसका रंग क्या है ,और  ना ही यह देखा जायेगा कि उसके चलने , बैठने , उठने का तरीका कैसा है क्योंकि यह आजीवन उसके हाथों में नही है… ।
रीमा मिश्रा”नव्या”
आसनसोल(पश्चिम बंगाल)

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