नज़रिया बदलिए नज़ारा बदलेगा
करुणा झा, राजबिराज,
कोरोना वैश्विक महामारी है जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी जाति, धर्म, समुदाय, राष्ट्रीयता और सामाजिक स्तर में आबद्ध नहीं है बल्कि समान रूप से पूरी दुनिया के हर इंसान को अपने चपेट में लेने को बेताब है यदि इसके लिए आवश्यक सुरक्षा विधियों का ठीक से पालन न हुआ तो। चीन के वुहान से शुरू हुए इस मारक वायरस ने यूरोप के सभी देशों, अमेरिका सहित तमाम अन्य देशों में कहर बरपाने के बाद भारत में प्रवेश किया और धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करते-करते अब विभीषिका के रूप में सामने है। मूलतः हवाई सफ़र करने वालों से शुरू हुए इस वायरस ने गरीब और कामगार जनता को खून के आंसू रुला दिये हैं। बिना किसी पूर्व तैयारी के साथ अचानक शुरू की गई लॉक डाउन की अवधि लगातार बढ़ती रही और उसके समानांतर बढ़ता रहा सबसे असुरक्षित कामकाजी मज़दूरों और बेबसों का दुःख। लॉक डाउन की घोषणा के साथ ही भय, आशंका, अनिश्चयिता एवं अराजकता की जो शुरुआत हुई उसने लॉक डाउन के मूल उद्देश्य को ही व्यर्थ कर दिया। देश के एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा को पैदल ही निकल पड़े मज़दूरों की बेबसी, भूख और बदकिस्मती पर शहरी मध्यम वर्ग भले आज हंस रहा हो लेकिन इस संकट के बाद शहरों में काम के लिए मज़दूरों का जो टोंटा पड़ेगा वह भी अलग रंग दिखायेगा। अब जब लॉक डाउन को धीरे-धीरे शिथिल करने की कवायद शुरू हो गई है लेकिन मज़दूर अभी भी सड़क पर हैं भूखे-प्यासे अपने परिवार, बूर्गों के साथ और किसी तरह घर पहुँचने को बेताब। इस बीच में उनको लेकर राजनीतिक दाव-पेंच के कई दौर गुजर गए मगर उनकी खस्ताहाली पर कोई ठोस कदम उठाया जाना अभी तक बाकी है। रेल में कटकर, सडकों की दुर्घटना में भूख-प्यास से अब तक सैकड़ों मज़दूर जिंदगी की जंग हार चुके हैं। आत्महत्या और अवसाद में भी बहुत सी जिंदगी होम हुई है। केंद्र और राज्य सरकारों ने जुबानी रहमत की रेवड़ी तो खूब बांटी है लेकिन हकीकत में इसका कोई फायदा मज़दूर वर्ग को होता नहीं दिखा है। आश्चर्य यह भी है कि आत्ममुग्ध सत्ता पक्ष के बरक्स विपक्ष भी अधिकाँश मामलों में सिफर ही साबित हुआ अहै। मज़दूरों की समस्या को लेकर जो तीव्रता उनके माध्यम से व्यक्त किया जाना चाहिए था उसका घोर अभाव दिखा है। हालांकि कुछ अपवाद जरुर हैं। विपक्ष के कतिपय नेता ने कोरोना संक्रमण के फैलाव से पहले और बाद में जन सरोकार की दृष्टि दिखाई मगर उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेने की सत्ता की जिद्द ने स्थिति को विस्फोटक ही बनाया। यह तय है कि कोरोना का यह आतंक बहुत जल्द ख़त्म होने वाला नहीं है या सीधे शब्दों में कहें कि अब हमें कोरोना के साथ जीने-मरने की तैयारी के साथ आगे की जिंदगी बितानी है। लेकिन कोरोना संक्रमण के दौरान जिस तरह के राजनीतिक विद्वेषी हथकंडे अपनाए गए हैं उसने देश की सामाजिक, सामुदायिक, धार्मिक जगत को विषाक्त ही किया है जिसका खामियाजा भुगतने के लिए हमें तैयार रहना होगा। अपनी गलतियों का भार दूसरे पर डालकर बच निकलने की चालाकी कोरोना के संक्रमण में बहुत कारगर नहीं रहने वाली है और यह हम कई मामलों में देख चुके हैं फिर भी क्षणिक राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा दोषारोपण हमारी देशभक्ति और मानवीयता पर सवाल खड़े करता है। हम एक निर्मम, मूर्ख, संकीर्णता से भरे मुर्दा समाज का हिस्सा बनने को अभिशप्त हो गए हैं। जनतंत्र में जनता और सरकार के बीच कोई सीमारेखा नहीं होती मगर अपने देश में जनतंत्र टी से गुंडातंत्र में तब्दील होता जा रहा है जहां राजनीतिक परिवारों का अभ्युदय हो रहा है और वे अपने स्वार्थ के अनुरूप देश की दिशा और दशा तय कर रहे हैं। कोरोना संकट से निजात पाने के लिए तत्काल हमें युद्धस्तर पर काम करने की जरुरत है। कोरोना की टीका न बनने तक लोगों को सुरक्षित रखना, इस संकट से उत्पन्न हुए आर्थिक दुरावस्था को बेहतरीन उपायों ने पाटना एवं बेरोजगारी की बढ़ती समस्या पर लगाम कसना देश में खुनी आन्दोलन को रोकने के लिए वक़्त की जरुरत है। अब यह सरकारों पर है कि वह अपनी आबादी की जिंदगी को खुशहाल बनाने की ओर कदम बढ़ाती है या खुनी संघर्षों से अपने स्थायित्व का रसद जुटाती है ?

