“राष्ट्रवाद :- प्रयोग और यथार्थ”
डा. मनोज मुक्ति “विवेक”
“राष्ट्रवाद” अपने आप में एक सकारात्मक उर्जा का संचार है, राष्ट्र, जनता, राज्यसत्ता के बीच एक मैत्रीपूर्ण एवं प्रगतिशील भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित कर देश और जनता को एक सूत्र में बाँधने की कडी है । “राष्ट्रवाद” ही समानता, समुन्नति, प्रगति, समग्र-विकास और समृद्धि का मार्गदर्शक/पथ-प्रदर्शक है और “राष्ट्रवाद ही राष्ट्रभक्ति भी सिखाता है” । “राष्ट्रवाद” ही किसी भी एक देश को दूसरे देश की जनता, शासन-सत्ता और राज्य के बीच समानता और सह-अस्तित्व के आधार पर परस्पर मित्रवत, भाईचारा, सहयोग, सहकार्य और Win – Win के भावना और सम्बन्ध को स्थापित करता है । सार्वभौमसत्ता, स्वतन्त्रता, स्वाभिमान, पहचान, एकता, अखण्डता, सम्मान, सु-शासन, पारस्परिक सदभाव, समानता, जिम्मेवारी, राजनीतिक एवं कूटनैतिक क्षमता, ब्यवस्थित शासन पद्धति एवं उत्तम तन्त्र का एकीकृत रुप ही “राष्ट्रवाद” है ।
आधुनिक विश्व और २१औं शताब्दी के अन्तर्राष्ट्रीय महाशक्ति राष्ट्र की राजनीति और कुटनीति का मूल-मन्त्र ही आज “राष्ट्रवाद” पर टिका है, आज वहाँ की राजनीति में वही शिर्ष पर है जो “राष्ट्रवाद” को प्रमुखता से उठा रहे हैं, वही लोग शासनसत्ता में काबिज हैं जो “राष्ट्रवाद” को जन-जन तक ले जाने में सक्षम है, चाहे वो अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प हो या रुस के पुतिन या फिर ईजराईल के नेतन्याहु से ले कर भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी या चीन के राष्ट्रपति सी जिङ पिङ सबका एक ही मूल-मन्त्र है “राष्ट्रवाद” । और इसीलिए ये लोग आज विश्व राजनीति के केन्द्र में है और उनके नेतृत्व में उनका देश विश्व महाशक्ति बनने की ओर निरन्तर आगे बढ रहा है, जो अपने आप में एक अच्छी बात है, सकारात्मक पक्ष है । परन्तु जब किसि भी देश के शासन-सत्ता में काबिज शीर्ष नेतृत्व या फिर शासन-सत्ता के बागडोर सम्भालने की ईच्छा/सोच रखने बाले राजनीतिक नेतृत्व जब “राष्ट्रवाद” की मूलभूत मूल्य-मान्यताओं और सिद्धान्तों के ठीक विपरीत प्रयोग करता है, उसको तोड-मरोड के उग्र और उत्तेजक बना आम जनता और कार्यकर्ता को दिगभ्रमित कर अपने स्वार्थ-सिद्धि का जरिया बनाता है तब वही “राष्ट्रवाद” उस नेतृत्व और राष्ट्र एवं आम जनता के लिए विनाशकारक सिद्ध होने मे देर नही लगता, विध्वंस एवं सर्वनाश के प्रतीक का रुप धारण कर लेता है और उसी “राष्ट्रवाद” को “खोखला राष्ट्रवाद या फिर आत्मघाती राष्ट्रवाद” कहा जाता है ।
जब हम “राष्ट्रवाद” की बात कर रहे हैं तब यहाँ नेपाल के सन्दर्भ भी जोडना अनिवार्य हो जाता है, क्योंकि संसार के दूसरे मुल्क और नेपाल के “राष्ट्रवाद” में काफी भिन्नता है, “राष्ट्रवाद” की परिभाषा और प्रयोग दूसरे मुलकों के मुकाबले नेपाल में भिन्न तौर-तरीका एवं परिवेश में किया जाता रहा है और इसकी परिभाषा और प्रयोग – उपयोग – उपभोग भी भिन्न है ।
नेपाल में मूलतः तीन (३) प्रकार के “राष्ट्रवाद” हैं,
(१) दरबार/राज संस्था द्वारा स्थापित राष्ट्रवाद :- जो नीति संगत, राष्ट्रहित, राष्ट्रभक्ति, जन-उत्तरदायी, पंचशील के सिद्धान्त और मूल्य-मान्यताओं पर आधारित असंलग्न परराष्ट्र नीतिको अवलम्बन करते हुए “राष्ट्रवाद” की मूलभूत मूल्य-मान्यताओं और सिद्धान्तों पर आधारित है ।
(२) मधेशवादी राष्ट्रवाद :- “राष्ट्रवाद” के स्थापित सभी मूल्य-मान्यताओं और सिद्धान्तों को स्वीकारते हुए नेपाल और नेपाली के अस्तित्व रक्षा हेतु निरन्तर क्रियाशील एवं संघर्षरत समुदाय जो वर्षों से नेपाल के सभी शोषित, उपेक्षित, अपहेलित, शासित, उत्पीडित वर्ग समुदाय क्षेत्र जाति वर्ण के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हुए निरन्तर शासक वर्ग को अपने वजूद को महसूस करा रहे मुक्तिकामी जन-समुदाय जिसे पहचानवादी भी कहा जा सकता हैं !
(३) ओलीयन राष्ट्रवाद :- पिछ्ले तीन दशक से नेपाल के शासन-सत्ता में काबिज वर्ग (नेपाल के संसदीय ब्यवस्था में समाहित और संसद का प्रयोग, उपयोग एवं उपभोग कर रहे संसदीय राजनीतिक दल) जो नेपाल और नेपालियों को सत्ता-स्वार्थ और ब्यक्तिगत स्वार्थ-सिद्धि हेतु निरन्तर प्रयोग, उपयोग और उपभोग करते आ रहे तथाकथित राष्ट्रवादी सिद्धान्त और उसके पक्ष-पोषक वर्ग और समूह । नेपाल के न्यायपालिका, ब्यवस्थापिका और कार्यपालिका में अपनी पकड बनाए रखने के लिए किसि भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं, जो वर्ग/समूह सत्ता की बागडोर हथियाने के लिए किसि भी दूसरे राष्ट्र के साथ कोई भी सहमति, सम्झौता, सन्धि करने के लिए तैयार हो जाते है और प्रतिकूल अवस्था में उसी सन्धि को राष्ट्रघात तक की संज्ञा दे कर आम जनता को मित्र राष्ट्रों के विरुद्ध नारा, जुलुस, प्रदर्शन जैसे गैर-कूटनीतिक एवं अमर्यादित क्रियाकलाप गतिविधियों द्वारा अपना “राष्ट्रवाद” प्रदर्शन करते रहते है, देश और जनता को भ्रमित करते रहना और सत्ता में बने रहना इनका “राष्ट्रवादी चरित्र” होता है । इनलोगों के गतिविधियों का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि “राष्ट्रवाद और राष्ट्रघात” दोनों एक ही विषय है सिर्फ समय और परिस्थिति अलग रहता है । देश और जनता को भाषण के भर पर बन्धक बना दिगभ्रमित कर सत्ता-स्वार्थ के लिए कुछ भी कर किसि भी राष्ट्र से सम्बन्ध बनाना और मित्र राष्ट्रों को बेज्जत करना शत्रु बताना और प्रचार प्रसार करना करबाना “ओलीयन राष्ट्रवाद” है । जिसके लपेट और चपेट में नेपाल के सभी राजनीतिक दल आ गए हैं चाहे वो नेपाली कांग्रेस हो या नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी या तथाकथित मधेशवादी दल ।
निष्कर्ष :- “नकारात्मक राष्ट्रवाद का ढोल पीटकर कोई शासन-सत्ता में तो क्षणिक काल के लिए सत्तासीन हो सकता है पर वह स्थायी नहीं हो सकता, देश और जनता का हित नहीं कर सकता, मित्रों के साथ मित्रवत नहीं हो सकता । भजनमणडली तो बना सकता है पर उसमे राग नहीं छेड सकता उसमे कोई सुर ताल नहीं हो सकता, वो अग्रगामी नहिं हो सकता, वो कभी स्थिरता और स्थायित्व नहीं ला सकता । सुख, शान्ति, समृद्धि, बिकास और समानता पर आधारित समतामूलक समाज निर्माण कभी नहीं करसकता ! हाँ एक बात वह जरुर कर सकता है और वो है विनाश और विध्वंस” ।।
अग्र चेती चिरञ्जीवी !!
धन्यवाद !
डा. मनोज मुक्ति “विवेक”
(डा. मनोज कुमार झा)
राष्ट्रिय अध्यक्ष
जनतान्त्रिक तराई मुक्ति मोर्चा

