भद्रेश्वर का अध:पतन (लघुकथा) : राज शर्मा
लघुकथा
महाकाली मठ में एक सुप्रसिद्ध साधक बहुत काल तक भगवती की सेवा में लीन थे । वे अपने शिष्यों को हर वक्त यह प्रेरणा देते रहते थे कि मनुष्यों को अहंकार, कामासक्त एवं विकारों के अधीन होकर मनुष्यों के सद्कर्म व साधनाओं से प्राप्त तपोबल ऊर्जा क्षीण हो जाती है ।
एक दिन वह साधक हिममयी श्रृंखलाओं की योग साधना हेतु यात्रा पर निकले । महाकाली मठ की सारी पूजा यज्ञ व्यवस्था शिष्यों पर ही निर्भर थी । कुछ दिनों के पश्चात भद्रेश्वर नामक एक शिष्य वन के लिए यज्ञ समिधा हेतु जाता हैं ।
नदी के तट पर एक मल्लाह को पत्नी सहित देखा । भद्रेश्वर ने पहले मल्लाह को मार्ग से हटाना चाहा । भद्रेश्वर ने मल्लाह को अपनी सिध्दियों के विपरीत कार्य से स्मृतिविहीन कर दिया। मल्लाह की पत्नी रेवा जो बेहद खूबसूरत थी उसे देखकर भद्रेश्वर दिल हार बैठा । भद्रेश्वर ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग इच्छापूर्ति के लिए किया । उसने रेवा को अपने मोहपाश में बांध लिया । उधर हिममयी पर्वत की चोटी पर सिद्ध साधक को जब योगबल से यह सारी घटनाएं विदित हुई तो वह क्षण भर में योगसिद्धियों के बल पर रेवा और भद्रेश्वर की कुटिया में पधारे ।
सिद्ध साधक भद्रेश्वर जो कि उनका परम् शिष्य था उससे नाराज हो गए और दण्डस्वरूप भद्रेश्वर की सारी सिद्धियों को कीलित कर दिया । सिद्ध साधक ने मल्लाह को योगसिद्धियों के बल पर साधारणतः पहले की भांति कर दिया और रेवा को भी भद्रेश्वर के प्रभाव से मुक्त कर दिया ।
इससे सिख मिलती है भद्रेश्वर ने निज इच्छा पूर्ति के लिए योगसिद्धियों को माध्यम बना कर किसी को बिना कारण मन के विपरीत कार्य करने से खुद ही दुःख के दलदल में पहुंच जाते हैं । कर्म के अनुरूप सबको फल मिलता है ।

