समय आ गया है बस अब सम्भल जा : नरेश सिंह नयाल
क्या हो रहा है……
न जाने क्यों!
पर लगता है
वो आज खफ़ा है
अपने किए पर ही
शायद वो शर्मिन्दा है,
सोचता होगा मैंने इंसान रचा था
उसमें मानवता भरी थी
एक दूसरे के लिए ममता का
आदर का भाव भरा था
पर कहाँ है वो
किधर खो गया है
बार-बार उसे जब
रह-रहकर ये ख्याल आया होगा
तब उसने ये विनाशक
रूप धरा पर लिया होगा,
पर हमने भी तो
कसर कहाँ कुछ छोड़ी है
प्रकृति का दोहन किया
अपनी इच्छाओं के लिए
स्वार्थ में लिप्त होकर
पहाड़ों का कद छोटा किया
मन तब भी कहाँ माना
फिर हमने नदियों के जल पर
अपनी बेरबम निगाहें डाली
चैन की रेत पर पसरी थी
पसरा करती थी नदियां
हमने रेत ही हटा डाली,
इतना भी शायद वो सह लेता
अदृश्य असीम है माफ कर देता
फिर हमने उसके ही रूपों को
अपनी ईर्ष्या का कारण बनाया
धर्म और जाति के नाम पर
आपस में ही रंज फैलाया,
अब सब हदें पार कर
उसने मूक के जीवन को
और उसके भीतर पल रहे
जीवन को भी नष्ट किया
क्रूरता की हद हुई
अपने खेल के खातिर
उस बेजुबान के जीवन के
खेल से ही खिलवाड़ किया,
अब भला कहो
कैसे वो चुप रहता
बताओ और कितना सहता
अब बारी उसकी थी
मानव पर भारी पड़ा
जग में महामारी का दंश
अपने चरम पर जाने लगा
फिर न संभला इंसान तो
तेज़ हवाओं का तूफान आया
कहीं पानी से तर-ब-तर
कहीं गर्मी की मार पड़ी
किसी को लहरों ने झकझोरा
कहीं आग ने उग्र रूप लिया,
सबक तो सिखाना ही था
क्योंकि ये अब भी कहाँ सुधरा
चार दिन निहारता है
वाह-वाह करके मात्र
पुनः गर्त में डाल देता है
औकात भूल जाता है
फिर टक्कर लेना चाहता है
यों ही हर बार बस
व्यर्थ प्रयास करता ही रहता है
अहम को अपने
औंधे मुँह गिरने तक
न जाने क्यों ये
आजमाइश करता रहता है,
वक्त है सुधर जा
जरा सा सम्भल जा
परिधि में रह अपनी
मर्यादा की हदों को जान
बची है जो मानवता जरा भी
उसी को प्रयोग में ला
वरना वो दिन भी दूर नहीं
सफाया होगा मानव जाति का भी
इशारा समझ
रौब छोड़कर सौम्य बन
और मानवता को ही
अपने हर कर्म में
अब तू शामिल कर
समय आ गया है
बस अब सम्भल जा।

आदर्श विद्यालय
एन आई ई पी वी डी, देहरादून
उत्तराखंड
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Thanks a lot for publishing my piece of writing in your esteemed magazine.
Regards
Naresh Singh Nayal