Thu. Jul 9th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

कोवीड-19 की दवा से हम कितने दूर-कितने पास

 

अजय श्रीवास्तव
केंद्र सरकार के द्वारा गठित कोवीड-19 की टीम के इतर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(AIIMS) के डायरेक्टर डा.रणदीप गुलेरिया ने दबीजुबान में हीं सही दिल्ली और मुबंई में “कम्यूनिटी ट्रांसमिशन” की बात को स्वीकारा है।उन्होंने बताया कि दिल्ली और मुंबई के कुछ इलाके हाँटस्पाँट हैं।हम कह सकते हैं कि उन्हीं इलाके में लोकल ट्रांसमिशन हो रहा है।फिलहाल अभी पूरे देश में ऐसी स्थिति नजर नहीं आ रही है।देश के 10 से 12 शहर ऐसे हैं,जहां लोकल ट्रांसमिशन के चांसेज हैं।
डा.गुलेरिया ने ये भी दावा किया कि अभी भारत में कोरोना का पीक पर आना बाकी है।उनका मानना है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग वक्त पर इस संक्रमण के और भी मामले बढ़ सकते हैं।
कोरोना की दवा के बारे में एम्स के डायरेक्टर ने कहा कि अगले दो-तीन महीने में कोरोना की दवा आने की संभावना है।इस संक्रमण की वैक्सीन इस साल के अंत तक आ सकती है।
डा.रणदीप गुलेरिया के उम्मीद के अलहदा विश्व स्वास्थ्य संगठन(W.H.O) के हेल्थ इमेरजेंसी के डायरेक्टर माइकल रेयान का कहना है कि “भविष्य में हमें इस वायरस के साथ लंबे समय तक रहना पड सकता है।”उन्होंने ये भी आशंका जताई है कि वैक्सीन के बनने में देर भी हो सकती है और ये भी हो सकता है कि कारगर वैक्सीन कभी न बन सके।उन्होंने ये भी कहा कि “कई बार ये कोशिशें बेकार भी जा सकती हैं और कई बार अच्छे नतीजे भी आ सकते हैं जैसा इबोला के मामले में हुआ।”
माइकल रेयान की बात में भी दम है और उन्होंने धरातल पर आकर ये बात कही है।कोरोना वायरस की दवा बनाने का दावा बहुत से देश कर रहें हैं मगर हम अतीत में झांक कर देखें तो आज भी हम चार जानलेवा वायरस एचआईवी, एवियन इन्फ्लूएंजा, सार्स और मर्स जैसी वैक्टीरिया जनित रोगों की दवा खोज नहीं पाएं हैं।
आपको बता दें मनुष्यों में पहली बार कोरोना वायरस की खोज “जून अलमेडा” ने साल 1964 में लंदन के सेंट थाँमस अस्पताल में स्थित लैब में की थी।जब ये खोज मुक्कमल हुई थी उन दिनों डा.अलमेडा ने डा.डेविड टायरेल के साथ रिसर्च का काम शुरू किया था।उन दिनों डा.टायरेल यूके के सेलिसबरी क्षेत्र में सामान्य सर्दी-जुकाम पर शोध कर रहे थे।डा.टायरेल ने जुकाम के दौरान नाक से बहने वाले तरल के कई नमूने एकत्र किये थे और उनकी टीम को लगभग सभी नमूनों में सामान्यतः सर्दी-जुकाम के दौरान पाये जाने वाले वायरस दिख रहे थे लेकिन इनमें एक नमूना जिसे B-814 नाम दिया गया था और उसे साल 1960 में एक बोर्डिंग स्कूल के छात्र से लिया गया था, बाकी सबसे अलग था।डा.टायरेल को लगा,क्यों ना इस नमूने की जाँच डा.जून अलमेडा की मदद से इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के जरिए की जाए।
यह सैंपल जाँच के लिए डा.अलमेडा के पास भेजा गया जिन्होंने परीक्षण के बाद बताया कि ये वायरस इंनफ्रूएंजा की तरह दिखता है, पर ये वो नहीं बल्कि उनसे कुछ अलग है।इस वायरस की पहचान के बाद डा.अलमेडा ने इसे “कोरोना वायरस” का नाम दिया।
सैंपल संख्या बी-814 से हुए इस नई खोज को वर्ष 1965 में प्रकाशित हुये ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में और दो वर्ष बाद जर्नल ऑफ जेनेरल वायरोलॉजी में तस्वीर के साथ प्रकाशित किया गया।(ब्रिटिश मेडिकल जर्नल से प्राप्त जानकारी)
कुछ दिनों पहले आब्जर्वर के साथ साक्षात्कार में विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेष दूत डेविड नाबरो ने आशंका जताई थी कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आनेवाले महीनों में कोवीड-19 का वैक्सीन तैयार हीं कर लिया जाए।वैक्सीन निर्माण एक लंबी प्रक्रिया है और इसमें सफलता की गारंटी बेहद कम होती है।उन्होंने बताया कि वैक्सीन ट्रायल को लेकर कई तरह के रिस्क होते हैं।यह किसी तरह से सुरक्षित नहीं होता है।हमें अच्छा इम्यून रिस्पांस चाहिए होता है।
लोगों की आशंकाओं के इतर वैक्सीन की खोज जारी है।दूनिया भर के वैज्ञानिक इस पर काम कर रहें हैं।बहुत से देशों ने तो कोवीड-19 के वैक्सीन की ह्यूमन ट्रायल भी शुरू कर दी है जिसके परिणाम अभी तक बेहद सकारात्मक रहें हैं।गौरतलब है कि किसी भी वैक्सीन के निर्माण में सालों लग सकते हैं।इबोला वायरस संक्रमण के वैक्सीन को 16 साल बाद मंजूरी मिली है।वैश्विक मंजूरी के बावजूद ये उतना मारक नहीं है जितना इसे होना चाहिए था।
कोई भी वैक्सीन तैयार करने से पहले उसे कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।पहले उसका परीक्षण लेबोरेटरी में होता है फिर उसका परीक्षण जानवरों पर किया जाता है।जब जानवरों पर परीक्षण सफल रहता है तो फिर इंसानों पर प्रयोग किया जाता है।इंसानों पर यह परीक्षण तीन चरणों में होता है।विभिन्न आंकड़ों द्वारा इसके डाटा का परीक्षण होता है।वैक्सीन को तीनों चरणों में खरा उतरना पड़ता है तभी इसकी मंजूरी मिलती है।एक आँकड़े के अनुसार इंसानी परीक्षण के अंतिम चरण तक पहुँचते पहुँचते लगभग 90% वैक्सीन के प्रयोग असफल हो जाते हैं।
उम्मीद पर दूनिया कायम है और हम उम्मीद करते हैं कि जल्द से जल्द कोवीड-19 का वैक्सीन बन जाएगा और संपूर्ण विश्व इस महामारी से निजात पा लेगा।अतीत में स्पेनिश फ्लू ने पाँच करोड़ से दस करोड़ के बीच इंसानी जिंदगियां लील ली थीं।आज से सौ साल पहले ये संक्रमण दस साल तक अपना तांडव मचाया था।मुझे उम्मीद है अब ऐसा नहीं होगा।चाँद पर कदम रखने वाले हमारे वैज्ञानिक इस सुक्ष्म परजीवी जो नंगी आँखों से दिखता भी नहीं है, अवश्य काबू पा लेंगे।हालात इतने भयावह हैं कि सभी इबादतगाह जहाँ जाकर आदमी अपनी खैरियत की दुआ करता है, उसके दरवाजे भी बंद हैं।सबसे बडी मुसीबत तो ये है कि इस बहुरूपिये वायरस ने अपने लक्षण दिखाने बंद कर दिये हैं।अब इंसान को ये भी पता नहीं लग रहा है कि वो संक्रमित है या नहीं।बहुत से टेस्ट में रिजल्ट निगेटिव आ रहा है मगर थोडे हीं दिनों में ये पाँजिटिव दिखने लगता है।भारत में अब ये संक्रमण ग्रामीण इलाकों में भी फैलने लगा है,जिसे अप्रवासी मजदूर महानगरों से अपने गाँव को लेकर आएं हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल किसी से छुपा नहीं है।वहाँ सोशल डिस्टेंनसिंग की बात बेमानी है।जागरूकता की कमी से ये संक्रमण हम पर बहुत भारी पड़ सकता है, ऐसा अंदेशा बहुत से स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगा रहें हैं।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *