Thu. Jul 2nd, 2020

भ्रष्टाचार से आत्मघाती संस्कार की ओर : अजयकुमार झा

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भ्रष्ट+आचार=भ्रष्टाचार । अर्थात जिनके आचरण, संस्कार और जीवन शैली आदर्श से पतन होकर तुक्ष सोच और व्यवहार पर आश्रित है । तथा जो जड़ वस्तु के लोभ में अपनी परम चैतन्य आत्मा तक को नष्ट करने पर तुला है । ऐसे लोग, जिन्हें भौतिक द्रव्य, वस्तु तथा क्षणिक पद में ही जीवन का परम उद्देश्य दिखाई देता है । परम सफलता दिखाई पड़ती है ।

 

ये सब के सब इस समाज में भ्रष्टाचार को सामाजिक संस्कार में परिणत करने के लिए प्रयासरत हैं और दिनानुदिन उन्हें इस कार्य में सफलता भी मिलती दिखाई देती है । ध्यान रहे, जिस व्यवहार को समाज में सहज स्वीकृति मिल जाती है, वो उस समाज का एक संस्कारित अंग बन जाता है । आज नेपाल में मात्र १ प्रतिशत व्यक्ति ऐसे मिलेंगे जो सार्वजनिक पदों पर रहते हुए भी भ्रष्टाचार में लिप्त न हो । यहाँ तो गाँव के पीयुन से लेकर देश के प्रधान तक सब के सब अपनी आत्मा को बेच चुके हैं ।

क्षुद्रता उनके लिए गहना बन गया है । धोखेवाजी हृदय का अभिन्न अंग बन गया है । मिथ्या भाषण आनन्दायक लगने लगा है । धनवान होना ही जीवन में सौभाग्य और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है ।

अतः प्रातः पूज्यनीय हमारे महिमावान भ्रष्टाचारी संस्कार के संस्थापकों से मेरा एक करबद्ध निवेदन है कि जÞरा नजर घुमा के भारत के चाय बेचनेवाला विश्वविख्यात व्यक्तित्व, भू–श्रेष्ठ महामानव, विश्वपुरुष, प्रधान सेवक सम्माननीय श्री नरेन्द्र भाई मोदी जी को भी जानने का प्रयास करें । कलयुग का यह देवता एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिसे दलीय क्षुद्रता के कारण अपशब्द बोलने वाला भी एकांत में खुद को दोषी मानकर प्रायश्चित करता है । तो क्या, नेपाल की मिट्टी इतनी गन्दी हो गई है कि यहाँ एक भी कमल न खिल सके ! यह प्रश्न मैं अपने आदरणीय पाठकों पर छोड़ता हूँ ।

ट्रान्सपरेन्सी इन्टरनेशनल नेपाल के द्वारा सार्वजनिक सीपीआई २०१९ के रिपोर्ट अनुसार नेपाल को भ्रष्टाचार सम्बन्धी विश्वव्यापी सूचकांङ्कों में १ सौ १३ वें स्थान में दिखाया गया है ।

सन् २०१८ में नेपाल ३१ अंक सहित १ सौ २४ वें स्थान पर था । सन् २०१९ में ३ अंक ज्यादा प्राप्त कर ३४ अंक मिलने के बावजूद भी सर्वाधिक भ्रष्टाचारी देशों में २० वें स्थान पर स्थित है । १ सौ ८० देशों में ९ अंक प्राप्त कर सोमालिया भ्रष्टाचार का सिरमौर साबित हुआ है । इसी प्रकार ८९ अंक प्राप्त कर डेनमार्क सबसे कम भ्रष्टाचार होनेवाला देश प्रमाणित हुआ है । भ्रष्टाचार अवधारणा सूचकांङ्क में १०० अंक प्राप्त होनेपर अति स्वच्छ और ० (शून्य) अंक प्राप्त होनेपर अति भ्रष्टाचारी देश की संज्ञा प्राप्त होती है । अब हमें देखना यह है कि इतनी जबरदस्त बहुमत तथा अपने को गरीबों का मसीहा कहने वाली सरकार आखिर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कड़ा कदम कब उठा पाती है ?
कर्मचारी और आम नागरिकों के खिलाफ तुरंत सक्रीय दिखने वाले नेताओं को जब अपने ऊपर यह प्रश्न चिन्ह लगता है तब सिद्धांत और नैतिकता का पता चलता है । वैसे दुनिया में लोगों की कमजोरी है कि उनको नेता चाहिए । फिर नेता कहां ले जाता है, इसका भी कोई सवाल नहीं है । नेता को भी कुछ पता नहीं कि वह कहा जा रहा है । अंधे अंधों का नेतृत्व करते रहते हैं । बस, नेता और अनुयायी में इतना ही फर्क है कि अनुयायी को कोई चाहिए जो उसके आगे चले, और नेता को कोई चाहिए जो उसके पीछे चले । इस आधुनिक वैज्ञानिक युग में भी हम सब भेड़ की जिंदगी जी रहे हैं । शैक्षिक प्रमाणपत्र की उच्चता हमारी उच्चतम भ्रष्टाचार का सम्मानपत्र बन गया है ।

विश्वविद्यालय अब भ्रष्टाचार प्रशिक्षण विद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है । देश का सर्वाङ्ग पतित हो चुका है । क्या राजतन्त्र का खात्मा इसी उद्देश्य को पूर्ति करने के लिए किया गया था ? क्या माओवादी जनयुद्ध में नेपाली नागरिकों का बलिदान और हत्या इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया गया था ? मंत्रियों के द्वारा करोड़ो की भ्रष्टाचारी, उच्चाधिकारियो के द्वारा देश और जनता की भावनाओं के साथ दलाली, राष्ट्रधर्म और सांस्कृतिक विरासत का सौदेवाजी करना क्या दर्शाता है देशभक्ति या देशद्रोह ?

स्वतंत्र व्यक्ति वह है, जो न आगे देखता है और न पीछे देखता है, जो अपने पैर से चलता है । पर बड़ी कठिन है बात, क्योंकि तब किसी दूसरे पर भरोसा नहीं खोजा जा सकता, किसी दूसरे पर जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती । सब जिम्मेदारी अपनी है । इतना जिसका साहस हो, वही केवल स्वतंत्र हो पाता है । न नेता स्वतंत्र होते हैं, न अनुयायी स्वतंत्र होते हैं ।

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स्वतंत्रता इस जगत में सबसे बड़ी क्रान्ति है । क्या हम स्वतंत्र हैं ? क्या हमारा नेतृत्ववर्ग स्वतंत्रता की परिभाषा को समझ पाया है ? या की एक गुलाम दूसरे निर्दोष व्यक्ति को स्वतंत्रता के नाम पर गुलामी का संस्कार सिखा रहा है । ध्यान रहे ! जो दूसरे के सिद्धांत को अपनाकर चलता हो वो कदापि स्वतंत्र व्यक्ति या विचारक नहीं हो सकता । मार्क्सवादी सभी के सभी मार्क्स के गुलाम हैं, उनका अपना न कोई दृष्टिकोण है न कोई संस्कार । इसी प्रकार लेलिनवादी, माओवादी, ये सभी गुलामों के संकेत हैं । वैचारिक गुलामी और ज्ञातव्य हो कि शारीरिक गुलामी तो सिर्फ कुछ दिनों के लिए होती है, परन्तु वैचारिक गुलामी पीढि़यों तक को सहज रूप में गुलामी के अदृश्य जंजीर से जकड़ लेता है, जिससे मुक्ति के लिए विचार ही नहीं बचता । शारीरिक गुलामी तो प्रत्यक्ष है, हम उससे मुक्ति के लिए निरंतर प्रयास करते रहते हैं और जल्द ही मुक्त भी हो जाते हैं । परन्तु मानसिक और वैचारिक गुलामी सीधा सम्बन्ध हमारे अन्तःकरण के संस्कार से होता है । इस अन्तःकरण को क्षुद्र सिद्धांत और विचार से संस्कारित कर देने के बाद इस भौतिक संसार में आध्यात्मिक मार्ग के अलावा शुद्ध करने का दूसरा कोई उपाय नहीं बचता । अब हमें ध्यान इस बिंदु पर देना है कि क्या हम अपनी आध्यात्मिक संस्कृति, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत है, उसे बचा पा रहे हैं ? क्या हम अपनी संस्कृति को सम्बद्र्धित कर पा रहे हैं ? क्या हमारे बच्चों में अपनी संस्कृति का झलक हमें दिखाई दे रही है ? ध्यान रहे जो हममें झलक रहा है, वही हमारे बच्चों में चमकेगा ।

अर्थतन्त्र के आकार की तुलना में राजस्व का अनुपात सार्क क्षेत्र में ही नहीं वल्कि विश्व में उच्चतम रहे देशों में नेपाल भी एक है । कर राजस्व भारत में ११ प्रतिशत, श्रीलंका में १२ प्रतिशत, अति कम विकसित राष्ट्रों में १० प्रतिशत और विश्व में १५ प्रतिशत के एवज में नेपाल में २२.५ प्रतिशत है । कुल सरकारी राजस्व करीब २५ प्रतिशत है जिसके कारण बजट का आकार और सरकारी खर्च भी अन्य देशों की तुलना में बहुत ज्यादा है । इस अवस्था में भी हमारी आवश्यकता अनुरूप राजस्व पर्याप्त नहीं है । देश संघीय ढांचा में जाने के कारण स्रोत और खर्च की आवश्यकता अत्यधिक हो गई है । हमारे नेताओं के सुख सुविधा में खलल महसूस हो रहा है । यही कारण है कि कुछ लोग संघीयता के विरुद्ध ही आवाज उठाने लगे हैं । उनकी रोटी प्रादेशिक नेताओं की झोली में जा रही है । ध्यान रहे कुल कर में आयकर का हिस्सा करीब २५ प्रतिशत ही है । बाकी ७५ प्रतिशत गैर आयकर अर्थात् अप्रत्यक्ष कर के जरिए राजस्व संकलन होने से हम गरीब जनता के ऊपर कर का भार थोपा जा रहा है । अप्रत्यक्ष कर से धनी और गरीब के बीच अंतर नहीं हो पाता है । एक किलो चीनी खरीदते समय हरेक नागरिक को समान रूप में अप्रत्यक्ष कर देना पड़ता है । इस हालात में गरीब दिन प्रतिदिन गरीब होते जाएंगे और धनी लोग धनवान बनते जाएंगे । शायद यही गरीबों के मसीहा का सिद्धांत भी है । अन्यथा साम्यवादी देश के नागरिक भी विश्व में धनवानों की सूची में आते ।

राजनीतिक क्षेत्र में इमानदार, निष्ठावान, समर्पित चरित्र के नेतृत्व का विकास नहीं हो पा रहा है । इसके लिए पार्टी भीतर में युवाओं को सक्रिय होने की आवश्यकता है । इस देश में लोकतन्त्र, गणतन्त्र और संघीयता के लिए आन्दोलन करने बाले शीर्ष नेतृत्ववर्गों का व्यवहार से पता चलता है कि उनमे अकूत सम्पत्ति कमाने और कमजोर निर्वाचन प्रणाली की आड़ में सत्ता में स्थापित होने की हैकमवादी मानसिकता विकसित होने लगी है । जबकि यह नेपाली राजनीति के लिए भयानक पक्ष है ।

हमारे संविधान का मार्मिक पक्ष ही मल्टिपार्टी डेमोक्रेसी है । इसमे राजनीतिक दल रहेंगे, परन्तु लोकतंत्र के मौलिकता पर आघात पहुंचाने का अधिकार किसी को नहीं है । अन्यथा इतने भीषण क्रान्ति का क्या प्रयोजन रह जाएगा ! परन्तु आज तक राजनीतिक दलों के नेतृत्व पंक्ति से पञ्चायत काल के परम्परागत कर्मचारीतन्त्र के कार्यशैली और व्यवहार परिवर्तन करने पर मजबूर होने के लिए प्रयास नहीं किया गया । अब तो कर्मचारीतन्त्र गणतान्त्रिक शासन प्रणाली में प्रवेश कर चुके हैं, फिर भी इनकी कार्यशैली पुराने ही है । मतलब, राजनीतिक नेतृत्व की खुशामदी, कमीशन का खेल, लूट प्रवृत्ति से कर्मचारीतन्त्र को मुक्त नहीं किया जा सका । संघीय गणतन्त्र प्रणाली होने के कारण कर्मचारीतन्त्र को संघ और गण तथा जनता के प्रति विशेष जिम्मेवारी वहन का भावबोध होना चाहिए था, उनका व्यवहार पारदर्शी और निष्कलंक होना चाहिए था, जबकि व्यवहार ठीक उल्टा है ।

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नेपाल में २०४६ साल के प्रजातंत्र के वाद स्व. गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बनी जिसे गिरिजाबाबू ने तीन वर्ष के भीतर ही नष्ट कर डाला । यह राष्ट्रीयता से ऊपर खुद के व्यक्तित्व वाला सोच का परिणाम था । जनता ने बहुमत दिया और आप शिशु प्रजातंत्र के नाम पर खुद को वाला बोध प्रमाणित कर देश को और नागरिक को बेहाल कर गए । अब ये कौन समाजवादी संस्कार है कि मैं नहीं तो तुम भी नहीं और देश भी नहीं । जनता को पूछता कौन है ! और यहीं से देश अधोगति की ओर अग्रसर हुआ जो आजतक लुढ़क ही रहा है । आज वामपंथी एकता और राष्ट्रीय भावना को जागरण के कारण नेपाल के इतिहास में अबतक के सर्वशक्तिशाली सरकार का निर्माण हुआ है । जनता ने दिल खोलकर इन्हें समर्थन किया है, परन्तु भ्रष्टाचारी संस्कार से संस्कारित होने के कारण भ्रष्टतम नेता पार्टी के उच्चतम व्यक्तित्व माने जा रहे हैं । करोड़ो के भ्रष्टाचार को संरक्षण किया जा रहा है ।

देश के संवैधानिक अंग अख्तियार दुरूपयोग अनुसंधान भी इनपर कार्यवाही करने से हिचकिचाते हैं । इसका मतलब ये नहीं वो कदम नहीं उठा सकते, परन्तु जब एक हत्या का दोषी खुलेआम सरकार के संरक्षण में न्यायालय को चुनौती देता हो तो वहाँ एक ईमानदार अधिकारी कितना हिम्मत दिखा पाएगा ? जीवन सबका प्रिय है, सब अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी को वहन करने के लिए ही उद्योग धंधा तथा नौकरी पेशा को अपनाते हैं । इस हालात में जहाँ सब ओर षडयंत्रकारी और भ्रष्टाचारियों का बोलबाला हो वहाँ मुठ्ठीभर कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार लोग क्या विद्रोह कर पाएंगे ? जहाँ का पूरा तंत्र ही जर्जर और लूट स्थल बन गया हो वहाँ क्या किसी पर भरोसा किया जा सकता है ? जहाँ गरिमामय न्यायिक पदासीन व्यक्तित्व भी नकली प्रमाण पत्र लेकर गौरवान्वित होते हों वहाँ के नागरिक किससे न्याय की आशा करेंगे ? जहाँ के विश्वविद्यालय में सफल को असफल और असफल को सफल कर दिया जाता है वहाँ के आम नागरिक अपने देश के किस प्राज्ञ पर गौरव करे ?

परम्परागत राजनीतिक दल के नेताओं ने सत्ता और सरकार में जा कर भी राजनीति को शुद्ध करने का अभ्यास किया हो ऐसा एक भी प्रमाण नहीं मिलता है । राजनीतिक सिद्धान्त, निष्ठा, त्याग, समर्पण और सेवा भाव से की जाती है, इस विषय को राजनीतिक दल के नेताओं ने नजर अंदाज कर दिया । वास्तव में वे लोग एकबार सत्ता और सरकार के शीर्ष स्थान में पहुँच जाने के वाद सात पीढी तक के लिए लूटने की योजना से अभिप्रेरित होकर काम करने लगते हैं ।
इस योजनाबद्ध भ्रष्टाचार की सफलता के लिए कुत्तों को दिए जाने कौड़े की तरह केंद्र से गाँव तक के लोगों को भ्रष्टाचारी का संस्कार परोसते रहते हैं । आज नेपाल के हर क्षेत्र में दिख रहे भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है । अब हालत ऐसी हो गयी है कि भ्रष्टाचारी ही सभ्य और संस्कारी दिखने लगे हैं । वे लोग ही सम्मानित और जनप्रिय लगने लगे हैं । समग्र समाज आज उनका अनुयायी बन चुका है । राजनैतिक दल में नैतिक सोच का अब कोई स्थान नहीं रहा । गणेशमान सिंह का त्याग और श्री कृष्णप्रसाद भट्टराई जी का संस्कार को उसी समय तिलांजलि देकर पदीय षडयंत्र का बीज बोया गया था । आज नेपाली राजनीति में वही पतित बीज अब विशाल बरगद के वृक्ष के रूप में टोल से राजधानी तक देखने को मिल रहा है ।
समाज में बड़ा बंगला, महंगी गाडि़याँ और समर्थकों के भीड़ का प्रदर्शन करनेवाली सोच से ग्रसित राजनीतिक षडयंत्र के कारण देश में एक विकृत पूँजीवाद को खड़ा कर आम नागरिक के जीवन को योजनाबद्ध रूप में तबाह करने का प्रयास किया जा रहा है ।
चुनाव जीतकर सत्ता में पहुँचने के लिए तस्कर, गुन्डा, दलाल, विद्यार्थी, शिक्षक, कर्मचारी तथा एन. जी ।ओ । और आई. एन. जी । ओ । के साथ साथ कार्यकर्ता को प्रयोग कर पढ़े लिखे लोगों में एक भ्रम का माहौल तैयार किया जाता है तो वही भोलेभाले नागरिक के आत्मा तक को खरीद लिया जाता है । आनेवाले समय में यही लोग सत्ता लिप्सा के कारण विदेशी कट्टरपंथी को भी प्रश्रय देने से नहीं चूकेंगे । विभिन्न देशों में वर्तमान में हो रहे जातीय और धार्मिक दंगे ऐसे ही क्रूर लोगों के दूरगामी योजना का परिणाम है । सोचना आखिर उसको है जिसके पास सोचने की क्षमता ही नहीं है । जो इनके जाल में फसते जा रहे हैं, उन्हें उनकी मूढ़ता तथा क्षणिक स्वार्थ के कारण भविष्य का अंधकारमय युग दिखाई ही नहीं दे रहा है ।
लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल में आधा भूखण्ड और ८५प्रतिशत आबादी आज भी पूर्णतः सरकारी सुविधा और संवैधानिक अधिकार से वंचित है । मधेस में मधेस सरकार के द्वारा किया जा रहा विकास कार्य दिखाई तो पड़ता है, लेकिन लोगों में इससे खुशी नजर नहीं आ रही है । संभवतः विकास कार्य की योजना से लोग मायूस नजर आ रहे हैं । वैसे सड़क निर्माण, मंदिर, मस्जिद, स्कुल और अन्य धार्मिक, सांस्कृतिक संस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है । विकास के लिए वैज्ञानिक गुरू योजना का अभाव दिख रहा है । मधेसवादी नेताओं का भविष्य मधेसियों को संवैधानिक अधिकार दिलाना है । इसी मुद्दे को लेकर सैकडों मधेसियों के शहादत के परिणाम स्वरूप ये लोग सत्ता का सुख ले रहे हैं । इन नेताओं तथा पार्टियों के राजनीतिक लक्ष्य भी समय–समय पर डगमगाते हुए दिखाई देता है । यहाँ के नागरिक इन सभी तथ्यों का मूल्यांकन भी करते दिखते हैं । एक ममत्व और अपनत्व के कारण मधेसी नेताओं के ऊपर इनका उबलता हुआ दमित क्रोध क्रियात्मक रूप नहीं ले पा रहा है । इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि इनकी सभी गलतियों को मापÞm कर दिया जाएगा । अभी काफी समय इनके पास है । मधेस का रीढ़ कृषि है, इसका वैज्ञानिकीकरण करना इनका परम कर्तव्य है । युवाओं का सुनहरा भविष्य ही आधुनिक मधेस का आधार होगा, अतः अत्याधुनिक प्राविधिक शिक्षा तथा विश्व सापेक्ष समसामयिक तालिमों की अविलम्ब व्यवस्था करना भी इस सरकार के लिए किसी भी प्रकार के विपक्षी आँधी से टकराने का माध्यम बनेगा । साथ ही मधेस को सँवारने का अवसर मिलेगा । सरकार का गिरना और बनना उतना मायने नहीं रखता जितना विकास का ठोस आधार स्तंभ निर्माण महत्व रखता है । इसलिए नेतृत्व पंक्ति को चाहिए कि वो मधेस के समग्र विकास को ध्यान में रखकर ही कोई निर्णय ले । न कि क्षणिक स्वार्थ तथा बहकावे में आकर बचपना दिखावे । मधेस में खासकर मधेसी पार्टी और नेताओं को अन्य किसी भी पार्टी के नेताओं से अधिक संवेदनशीलता और सक्रियता दिखानी पड़ेगी । भावी संतान के सुखद भविष्य के लिए पूर्णतः सजग और सुक्ष्मान्वेशन कर उत्तमतर उपाय को अपनाते रहना होगा । जनता के बीच उपस्थित और कार्य दोनों दिख रहा है, यह शुभ संकेत है, परन्तु आधुनिकतम सोच को उपयोग में लाकर मधेस को सबल और मधेसी को समृद्ध बनाना भी आपका ही दायित्व है । इस प्रकार एक अच्छे नेतृत्व का जन्म हो सकेगा, एक समस्या समाधान मुलक वातावरण का निर्माण हो सकेगा । और भ्रष्टाचार रूपी कलंक से हम बच सकेंगे ।
ऐसे बहुत सारे सवाल है जिसका उत्तर अब हमें और आपको ढूंढना है । नेताओं का क्या है, वो तो देश को लूटकर हमें विदेशियों के हाथों में मरते छोड़कर विदेश पलायन हो जाएंगे । फिर नारकीय जीबन हमें जीना पड़ेगा । पाषाण और जंगली युग का पीड़ा हमें भुगतने होंगे । आक्रान्ताओं और क्रुरता का भयानक प्रहार हम हमारे बच्चों को सहना पड़ेगा । दाने दाने को मोहताज होकर दासता के बज्र प्रहार हमें सहने होंगे । अतः आम नागरिकों में राष्ट्रीयता और देशहित हेतु दूरगामी संरक्षण और संवर्धन के लिए सतर्कता पूर्वक एक वृहद् संवाद के शैली को अपना होगा ।

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