एक निवर्तमान रेमिट्यान्स मशीन का सरकार के नाम खत : विन्देश्वर_ठाकुर
विन्देश्वर_ठाकुर
हेल्लो सरकार!
विश्व के दो अक्षांस और
देशान्तर में अवस्थित
इस तीसरे देश से
एक लाचार युवा का
नमस्कार सहित का
अभिवादन स्वीकार करें
और स्वीकार कीजिए
देश के प्रति इनके योगदान और
त्याग को भी।
सोचिए सरकार!
जिसने
अपने शरीर के गरम लहू को
मरुभूमि में सुखाकर
जन्म और कर्मस्थली को उर्बर बनाया
अपनों के लिए दो वक्त की
रोटी का इंतजाम किया
समाज का भला चाहा
देश के लिए रेमिट्यान्स भेजा
हाँ सरकार मैं उसी देश का एक
निवर्तमान रेमिट्यान्स मशीन हूँ
याद कीजिए सरकार!
जिसने
सिर पर सगरमाथा
आँखों में रारा -फेवा
और छाती में
चन्द्र-सूर्य अंकित झण्डा का प्यार लेकर
अपने स्वभिमान की खातिर
बर्षों तक खाड़ी में भटका
हाँ हजुर मैं वही एक
कर्मठ नेपाली हूँ।
जरा यह याद कीजिए सरकार
मेरी जवानी को ही बेचकर
करते रहे मन्त्रीमण्डल में मौज ?
मेरे पसीने के तालाब में ही तैरकर
कितनी बार गंगा स्नान किया है ?
मेरे श्रम की बलि चढाकर
कितनी ही बार कर चुके विदेश की यात्रा ?
बोलिए हजुर, मैं तो
हजुर की सुख-सुविधा के लिए
काम आने वाला एक दुरुस्त श्रोत हूँ।
पर आज,
कोरोना के कहर में तडपता
रोजगार खो चुके
विश्व के तीसरे देश में फसा
घर अपने देश वापस लौटना चाहता हूँ
किन्तु कभी तो मंहगा हवाइ टिकट डराता है
तो कभी कोरेन्टाइन का फीस
तो कभी सरकारी नीति का डर
बताइए ना सरकार!
मैं लाचार नेपाली नागरिक
जिन्दगी भर रेमिट्यान्स चुकाने वाला नेपाली नागरिक
भीक्षा मांग कर नेपाल वापस आऊँ या
अस्तित्व रक्षा के लिए
इसी देश में आत्महत्या करुँ


