क्या भारत विश्वगुरु बन सकता है ? प्रियंका पेड़ीवाल अग्रवाल
प्रियंका पेड़ीवाल अग्रवाल, विराटनगर | इतिहास में बड़े-बड़े भविष्यवक्ता हुए पर एक नाम इन सबमें सबसे पहले आता है वो है “नास्त्रोदमस”! उन्होने अपने जीवनकाल मे दूरदर्शी होने की वजह से हजारों भविष्यवाणीयाँ की जिनमें से ज्यादातर आज तक सत्य हुई और आगे भी होती रहेगी। उन्हीं की इन भविष्यवाणीयों में से एक भविष्यवाणी ऐसी थी जिसने आज के इस शीर्षक को जन्म दिया है।
उन्होने अपने जीवनकाल मे भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि एक दिन जमीन से जुड़ा हुआ एक आदमी आएगा और भारत की मान मर्यादा इज्जत बढाएगा। सारे भारतवासी उसको आदर्श मानेगें और वो भारत का भाग्य बदल देगा और भारत विश्वगुरु बनेगा।
वैसे तो भारत को पहले भी ‘सोने की चिड़िया’ (Golden Bird)कहा जाता रहा है , फिर अंग्रेजी हुकुमत का भारत मे कदम रखना और भारत की सौ से ज्यादा वर्षों की गुलामी ने भारत का यह ओहदा भारत से छीन लिया |
पर आज की परिस्थिति देखी जाये तो ऐसा प्रतीत होता है कि क्या यह भविष्यवाणी सच में यथार्थ मे तबदील हो सकती है ? एक तरफ खुद को सुपर पावर मानने वाला अमेरिका दोहरी मार झेल रहा है।पहले कोविड-१९ और फिर अपने ही देश में George Floyd की पुलिस हिरासत में मृत्यु के बाद नश्लभेद के आरोप की वजह से पनपे गृहयुद्ध जैसे हालात से जूझ रहा है।दूसरी तरफ चीन अपने कोविड-१९ को प्रसार में संदेहात्मक भुमिका की वजह से विश्व भर के मुलकों के निशाने पर है, और सभी देश उस पर Sanctions लगाने और उसके सामानों का अपने-अपने देशो में बहिष्कार करने की तैयारी में जुटे है। जहाँ चीन सस्ते उत्पाद बनाने में प्रथम आता है वहीं चीन के बाद भारत का ही नाम आता है क्योंकि चीन के सस्ते कामदारों के बाद भारत के ही कामदारों का नाम आता है। उस पर चीन को छोड़ती बड़ी-बड़ी कंपनियाँ भारत को नया निवेश स्थल के तौर पर देख रही है और यदि चीन पर अन्तराष्ट्रीय संस्थानों द्वारा Sanctions और उनके उत्पादों का बहिष्कार विश्व के देश करते है और इसी तरह बड़ी-बड़ी कंपनियाँ चीन को छोड़कर भारत के अपना निवेश स्थल चुनती है तो फिर भारत के लिये इस भविष्यवाणी को यथार्थ में तबदील करना संभव नजर आता हैं।
सोच के सृजन के बल पर ही भारत विश्व गुरु बनेगा। आने वाले समय में देश अब विचारों की दुनिया में जियेगा।
बच्चे देश के भविष्य होते हैं। बच्चों को ऐसी प्रेरणा दें कि वे ऐसा काम करें जिससे उनके परिवार व देश का नाम रौशन हो सके।
भारत यदि विश्व गुरु की उपाधि प्राप्त करना चाहता है तो निज भाषा का विकास और उन्नति उसका पहला ध्येय होना चाहिए। आज संख्याबल तथा शब्दसंख्या के आधार पर हिंदी विश्व की सबसे शक्तिशालिनी और बहुप्रयुक्त भाषा है पर हमें गुणवत्ता एवं वैज्ञानिक और तकनीकी धरातल पर भी उसे विश्व- स्तरीय बनाना होगा। आने वाला समय हिंद और हिंदी का है। ऐसी स्थिति में हमें हिंदी के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयास करना होगा।

बिराटनगर, नेपाल

