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पराक्रमी व्यक्तित्वके धनी – समाजसेवी कालुराम तोदी : लक्ष्मण नेवटिया

 

 

” कर्मवीर कालुराम तोदीकी संघर्ष गाथा ” श्री कालुराम तोदी द्वारा लिखित ऐतिहासिक गाथा पढनेका सुअवसर मिला। पढते पढते कब अन्तिम पन्ना पढ चुका पता ही नहीं चला। एक ऐसा इमान्दारीसे लिखा हुआ संस्मरणीय स्मरणीय अनुकरणीय उदाहरणीय दस्तावेज जिसकी खोज व प्रकाशन कर उनके सुपुत्र श्री विश्वनाथजीने एक अमूल्य उपहार समाजको प्रदान किया है। यह एक ऐसी मंजुषा है जिसके अन्दर अनेक अनमोल रत्नरूपी जानकारियाँ सुरक्षित है।ये जानकारियां हमारे समाजकी धरोहर है जिसमें हम अपने विकासक्रमके प्रतिविम्बको देखते हैं। आज जिन पेडोंके स्वादिष्ट फलोंको हम खाकर लुत्फ उठा रहे हैं।उन पेडोंको उगानेमें हमारे पूर्वजोंने जंगल पहाड उफनती नदियोंकी परवाह किये बिना कितनी मेहनतकी इसका एक प्रामाणिक दस्तावेज स्वयंमें ही है यह पुस्तक।
स्व. कालुराम तोदीके जीवन प्रसंग में आत्मोन्नति के ढेर सारे संदेश भरे हैं, जो अनुपम और अमूल्य हैं। उनको जान कर, उन पर मनन और आचरण करना”गहरे पानी पैठने जैसा लाभप्रद है”।
मेरा भी अपने परिवारके संस्कारोंसे बाल्यकालसे ही साहित्य समाजसेवामें रुचि रहनेके कारण तथा मेरा आवास भी उनके आवासके मुहल्लेमें ही रहनेसे बाल्यकालसे ही उनके सम्पर्कमें रहा हूँ। सत्यनारायण मन्दिर व अतिथी सदनमें तो अक्सर उनसे मुलाकात हो जाती थी। समाजकी हरगतिविधियोंके प्रति वे सजग रहते थे। कहीं कोई कमी देखते तो तुरन्त उसे समझाना रोकना उनकी सर्वहितैषी स्वभावका परिचायक है। आज समाजमें ऐसे समाजकी हर गतिविधियोंमें ध्यान रखनेवाले सामाजिकजनोंकी कमी होती जारही है।
उन्हें जीवनके पुर्वार्द्धमें कविताके भाव आने लगे थे व वे उन्हें लिपीबद्ध कर मुझे अपनी गद्दीमें बुलाकर दिखाते थे। बिराटनगरमें अग्रसेन जयन्ती मनानी चाहिये इसके लिये भी उन्होंने व्यक्तिगतरूपसे मुझे प्रेरित किया था। जीवनमें हर परिस्थितिका कैसे सामना करना चाहिये उनका सम्पूर्ण जीवन इसका अनुपमेय उदाहरण है। इस क्षेत्रकी अनेक संस्थाओंके निर्माण संचालनमें उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जासकता है।
वे जब भी मिलते थे कुछ न कुछ जीवनके लिये उपयोगी बातें हमें जरुर बताते थे। आलस्य एवं अनुत्तरदायित्व से समग्र जीवन नष्ट हो सकता है। अतः जिस समय जो निर्णय
लेना है और कार्य करना हैं उसमें थोड़ा सा भी आलस्य न कर कर लेना चाहिये ऐसी उनकी बातें अनन्त प्रेरणा देती थी।
वे गाँधीजीके ” एक्ला चलो रे” के मन्त्र अनुसार जो काम ठान लेते थे वह अपने बलबुते ही करके आगे बढजाते थे । फिर तो उनकी कर्मठतामें शामिल होने अनेक हाथ आगे आजाते थे। कोई राजी हो या नाराज- जो बात सही लगती थी वे उसके ही पक्षपाती रहते थे ।औरोंको अपना पक्ष समझानेकी उनमें अद्भुत कला थी। समाजके हर व्यक्तिके दुखसुखमें वे साथ खडे रहते थे तभी तो वे सभीके प्रिय थे व लोग उन्हें आदरपूर्वक”कालू काका” कहते थे।
आज उनके द्वारा लिखी पुस्तक ” “” जो उनके संस्मरणोंका अनुपम संग्रह है, का प्रकाशन मारवाडी समाजके पूर्वजजनोंके सुकृत्यकी अमरगाथा बनकर प्रस्तुत हुआ है। यह पुस्तक मात्र उनकी जीवनी नहोकर उनकी व हमारे पूर्वजोंके संघर्षोंकी उनके जुझारुपन कर्मठता की ऐसी मसाल है जो हमारा संसार पाथेयमें मार्गदर्शन करता है। उनके सुपुत्र श्री विश्वनाथ तोदी धन्यवादके पात्र हैं जिन्होंने समाजके अन्य बन्धुवोंके विचारोंको भी आबद्ध कर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारियोंसे युक्त पुस्तकरूपी यह अमूल्य नीधी समाजको प्रदान कर रहे हैं और दिवंगत पुण्यात्मा स्व. कालुराम तोदीके प्रति इससे बडी कोई सच्ची श्रद्धाञ्जली कोई हो भी नहीं सकति है। उस महान व्यक्तित्वको मेरा सादर नमन कर लेखनीको विराम देता हुँ।

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लक्ष्मण नेवटिया,
विराटनगर -९

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