Thu. Jul 2nd, 2020

सम्राट अशोक बनने की आकांक्षा में संबन्धों को नष्ट करने पर तुली है सरकार : जय प्रकाश आनन्द

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जयप्रकाश आनंद, बिराटनगर । नेपाल में भारत द्वारा सभी पहलुओं में एक अजीब हस्तक्षेप था। भारत ने आम नेपालियों की सोच में बदलाव को नहीं समझा, समझने की कोशिश भी नही किया, ये सत्य है। ऐतिहासिक रूप से, भारत के प्रति पहाड़ी समुदाय और मधेसी समुदाय दोनों की बहुपक्षीय अंतर आबद्धता में गंभीर बदलाव आया है। दोनों का देश के प्रति एक ही दृष्टिकोण बनता गया फिर पहाड़ और मधेस के सभी हिस्सों में भारत के बारे में सवाल उठने लगे।

सत्ता में बैठे लोगों की अपनी कार्यशैली होती है। यह आंतरिक शक्ति के निर्माण के साथ बदलता भी है। जो राजा त्रिभुवन और बीरेंद्र के समय में, भारत की उपस्थिति से अलग है। मातृका प्र.कोइराला और केपी ओली के प्रधानमंत्रीत्व के बीच अंतर को उसी तरह से देखा जाना चाहिए। एक समय भारतीय राजदूत सीपीएन सिंह ने राजा महेंद्र की आरती की उतारी थी, जब राजा काठमांडू में भारतीय दूतावास गए थे।

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भृकुटी मंडप कांड में एक चीनी स्टाल को जलाने पर- अगर तत्कालीन चीनी राजदूत ने नियंत्रित नहीं किया होता तो काठमांडू की सड़कों पर राजा के सिर से फुटबॉल खेलने को भी कहा गया था। लेकिन आज भारत को वह आतिथ्य नहीं मिलता है, चीन ऐसा नहीं कहता है। ये प्र.म. ओली आज जंग बहादुर नही हो गए है बल्कि नेपाल बदल रहा है, बदलना ही चाहिए।

भारत भांग खा कर बैठा है, जो इस तथ्य को समझना नहीं चाहता। इसलिए, नेपाल एक संप्रभु देश है, यह दिखाने के लिए @kpsharmaoli का प्रयास; हम सभी के लिए निर्विवाद रूप से एकयबध्यता का विषय है, लेकिन इस बीच, एक मनोविज्ञान कूद पड़ा है। कहने का तात्पर्य यह है कि, क्या भारत के साथ विशेष संबंधों के सभी पारंपरिक तत्वों को अवयव किया जाएगा और नष्ट कर दिया जाएगा। ये “सभी पारंपरिक विशेष संबंधों के तत्व” एक निर्दोष प्रकृति के हैं। किसी समय मे यहाँ के राजा-महाराजा के परिजनों का विवाह भारतीय रियासत में होता था। मधेश और बिहार-यूपी के लोगो के बीच बहुउल्लेखीत रोटी-बेटी का संबंध भी इसी तरह
से विकसित हुआ है। समय के साथ, यह अधिक से अधिक आपस में जुड़ गया है।

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हमने लिपुलेक में भारतीय पोस्ट दिया है। दशकों से, हर कोई चुप था, किसी ने भी कुछ नहीं कहा। ओली जी चिल्लाए। हमारा कोई विरोध नहीं है। इसमे मधेशी समुदाय का कोई दोष भी नही है। लेकिन, इस मुद्दा से देश मे बने चुनावमुखी राष्ट्रीयता के उठान का मौक़ा देखकर सरकार ने भारत को ठीक करने के नाम पर अपने ही नागरिकों का शेखी उतारने का काम करना शुरू कर दिया है। वर्तमान नागरिकता संशोधन कानून को उसी रूप में लाया गया है।

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भारत पर विजय प्राप्त करने के लिए सम्राट अशोक बनने की आकांक्षा के नाम पर, हमारी सरकार भारत के साथ पारंपरिक लोगों के संबंधों के सभी पारंपरिक घटकों और आधारों को नष्ट करने पर तुली हुई है। ध्वस्त करने में लगी है। राज्य ने ऐसी सोच बनाई है। यह एजेंडा के बिना नहीं है, किस काम के बाद क्या करना है, इसकी कार्रवाई श्रृंखला राज्य द्वारा तैयार की गई है। इसमे देश के अपने सार्वभौम भू-भाग के भित्र के एक समुदाय बहुत प्रताड़ित होंगे यह निश्चित है । ऐसा नही हो-यह कहना प्रत्यूत्पादक होगा।

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