Mon. Jul 13th, 2020

नेपाल भारत तनाव से चिंतित बंगाल में रह रहे नेपाली नागरिक, इस बार बंगाल से अनानास नेपाल नही आएगा

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भारत के साथ बढ़ते विवाद ने नेपाल से सटे पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाक़ों में रहने वाले नेपालियों को भी असमंजस में डाल दिया है।

उनको डर है कि इस विवाद के बढ़ने की स्थिति में कहीं स्थानीय लोगों की नाराज़गी का शिकार नहीं होना पड़े। दार्जिलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी जैसे शहरों और दूसरे इलाक़ों में नेपालियों की बड़ी आबादी है। यह लोग नौकरी के अलावा छोटे-मोटे रोज़गार भी करते हैं।

नेपाल के साथ नक़्शा विवाद के ज़ोर पकड़ने के बाद बंगाल के उत्तरी हिस्से के अनानास उत्पादकों ने इस साल नेपाल को अनानास का निर्यात नहीं करने का फ़ैसला किया है।

बंगाल में अनानास के कुल उत्पादन का 80 फ़ीसदी इसी इलाक़े में होता है और यहां से हर साल बड़े पैमाने पर नेपाल को इनका निर्यात किया जाता है।

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इस साल कोरोना और उसकी वजह से जारी लंबे लॉकडाउन की वजह से कीमतों में गिरावट से अनानास उत्पादकों को भारी नुकसान सहना पड़ा है।

इस बार अनानास की बंपर पैदावार हुई थी। लेकिन उत्पादकों और व्यापारियों का कहना है कि अनानास भले आधी क़ीमत में बिके या खेतों में ही सड़ जाएं, इनको किसी भी क़ीमत पर नेपाल नहीं भेजा जाएगा।

भारत-नेपाल के बीच जारी मौजूदा विवाद पर अनानास की खेती और कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि नेपाल पहले ऐसा नहीं था। लेकिन अब चीन की शह पाकर ही वह आंखें दिखाने का प्रयास कर रहा है।

एक उत्पादक धीरेन मंडल कहते हैं, “नेपाल ऐसा नहीं कर सकता । पीछे से चीन उसे शह दे रहा है। चीन की मंशा भारत को अलग-अलग मोर्चे पर परेशान करने की है।”

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एक निर्यातक सुरेश कुमार साहा कहते हैं, “पहले यहां से नेपाल सीमा पार करते समय कहीं कोई पूछताछ नहीं होती थी। लेकिन इधर कुछ महीनों से पूछताछ और जांच बढ़ गई है। नेपाल के तेवर बदल रहे हैं।”

इन लोगों का कहना है कि देर-सबेर नेपाल को अपनी ग़लती का अहसास होगा।

एसोसिएशन के मुताबिक़, हर साल नेपाल को तीन हज़ार मीट्रिक टन अनानास का निर्यात किया जाता है। सीज़न यानी जुलाई और अगस्त के दो महीनों के दौरान रोज़ाना औसतन 50 टन अनानास वहां भेजा जाता है। क़ीमतों के उतार-चढ़ाव के मुताबिक़ यह निर्यात 12 से 18 करोड़ रुपए के बीच है। लेकिन इस साल व्यापारी नेपाल के बदले उत्तर भारत के बाज़ारों में अनानास भेजने के उपायों पर विचार कर रहे हैं।

अनानास उत्पादकों के संगठन पाइनेप्पलल ग्रोअर्स एसोसिएशन के सचिव अरुण मंडल कहते हैं, “यहां से हर साल नेपाल को तीन हज़ार मीट्रिक टन अनानास का निर्यात किया जाता है। लेकिन इस साल वहां निर्यात नहीं किया जाएगा। इस नुक़सान की भरपाई के लिए देश को दूसरे राज्यो में नए बाज़ार तलाशे जा रहे हैं। सरकार से भी इलाके़ में फ्रूट प्रोसेसिंग इंडस्ट्री की स्थापना करने की मांग की गई है।”

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नेपाल के साथ बढ़ते विवाद ने सिलीगुड़ी और आसपास के इलाक़ों में रहने वाले नेपालियों को भी असमंजस में डाल दिया है।

एक स्कूल शिक्षक मोहन थापा कहते हैं, “दोनों देशों में सदियों से रोटी-बेटी का रिश्ता रहा है। यह विवाद शीघ्र ख़त्म होना चाहिए। ज़्यादातर लोग डरे हुए हैं कि विवाद बढ़ने की स्थिति में उनको कहीं स्थानीय लोगों की नाराज़गी नहीं झेलनी पड़े।”

 

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