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पीर पराई जानें रे : रविन्द्र सिंह डोगरा

 

पीर पराई जानें रे

जीवन के वो क्षण आपको एहसास करवाते हैं की आप सच में कुछ अच्छा कर रहे हैं , जब बेगाने लोग आपको अपनों से बढ़ कर चाहने लगते हैं और उनकी चाहत आपके लिए आंसू बन कर दुआओं के रूप में बहते हैं । ऐसा ही एहसास मुझे तब हुआ , जब एक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र के गाँव में सैनेटाईजेशन का काम करने मैं गया, वहाँ एक माता जी घर में अकेली थी । जब उनको पता लगा की हम वहाँ कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए आये हैं , तो वह बहुत खुश हुई , परंतु जैसे ही मैं सैनेटाईजेशन करके घर से निकला उस माँ की आंखों से आंसू फफक पड़े , ” आंसुओं की धारा ने मेरे जाते कदमों को ऐसा भीगोया की मेरे कदम जम गए ” , मैं रोती हुई माँ के पास वापिस चला गया और कहा माता जी यहाँ सब ठीक कर दिया है फिर आप रो क्यों रहे हो ? उनके जब मैंने रोने कारण पूछा तो वो गले लग कर कहने लगीं बेटा यहाँ तो तुमने हमें सुरक्षित कर दिया इस बात की खुशी है और दवा भी दी परंतु हमारे परिवार के जो लोग बाहर फ़ंसे हैं वहाँ उनके लिए ऐसा कौन करता होगा ?.. यही सोच रही हूँ के काश तुम्हारे जैसा वहाँ भी कोई हो । इस मां के दर्द को कौन समझेगा के उसे मुझ पर तो विश्वास है लेकिन शायद जहाँ उनके परिवार के लोग हैं वहाँ की सरकारों और प्रशासन या प्रतिनिधियों पर नहीं । कोरोना महामारी में यह एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे सरकारों और राजनीतिक लोंगो जनप्रतिनिधियों तथा बड़े बड़े दावे करने वाले लोगों को इस तस्वीर को देख कर समझना होगा के आम जन के हालात क्या हैं ।

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