Sat. Aug 15th, 2020

मनोहर सूक्तियाँ : समीक्षकः डॉ. बीना राघव

  • 30
    Shares

मनोहर सूक्तियाँ
पुस्तकः मनोहर सूक्तियाँ
लेखकः हीरो वाधवानी
प्रकाशकः के. बी.एस. प्रकाशन
मूल्यः ४५०–
समीक्षकः डॉ. बीना राघव
साहस, सोने से भरा थैला है– हीरो वाधवानी
जीवन की समझ रखने वाले, अध्ययनशील, मननशील, चिंतन वीर और श्रेष्ठ साहित्यकार व सूक्तिकार हीरो वाधवानी जी की हीरों सदृश्य बहुमूल्य पुस्तक ‘मनोहर सूक्तियाँ’ प्राप्त हुई । पढ़कर अनुभूति हुई कि इस जीवन में बहुत कुछ ऐसा है जो जानने हेतु शेष है । अनमोल निधियाँ संजोते हुए समाज को सही दिशा दिखाते हुए आप उचित मार्गदर्शन कर रहे हैं । जीवन की चुनौतियों से मिले संघर्ष को भी सरल और आनंददायक हम बना सकते हैं अगर इन सूक्तियों को अपना दर्शन और सिद्धांत बना लें तो । इस संग्रहणीय पुस्तक की विशेषता है कि इसमें संजोयी मनोहर बातें मौलिक एवं सहज हैं । सुंदर समाज के निर्माण और विकास में ये आवश्यक प्रतीत होती हैं । मानवता के हित में ये अनमोल निधि हैं । यह किताब हमें जीवनभर सहेज कर रखनी चाहिए तथा आने वाली पीढि़यों के मंतव्य के निराकरण व परिष्करण के लिए संगृहीत करना भी श्रेयस्कर है क्योंकि नैतिक शिक्षा का स्रोत इससे बढ़कर और क्या होगा । प्रत्येक सूक्ति गहन चिंतन–मनन और अनुभव की स्याही से रची गयी है । कुछ सूक्तियों को पढ़कर मन अत्यंत प्रफुल्लित हुआ । कुछ की वानगी यहाँ दृष्टव्य है–
 साहस संजीवनी बूटी है ।
 परोपकारी ही समाजसेवी है ।
 साहस, सोने से भरा थैला है ।
 सबसे बुद्धिमान वह है जो अपनी प्रशंसा, दूसरे की निंदा व चिंता न करके समय बचाता है ।
 सबसे बुद्धिमान वह है जो यह मानकर चलता है कि अच्छा स्वास्थ्य अच्छी आदतों का परिणाम है । जिसे ज्ञात है कि दुस् ख और सुख का कारण स्वयं का विचार और व्यवहार है ।
 नेक बनना मतलब अधिक सुंदर होना है ।
 हर शहर का हरा–भरा बगीचा प्रमुख दर्शनीय स्थल है ।
 ईष्र्यालु अंधा होता है । जिससे ईष्र्या करता है उसके त्याग और परिश्रम को नहीं देखता है ।
 नहीं चलने वाला वाहन धूल और हवा खाता है ।
 सादगी नारी की, पेड़ पृथ्वी की शोभा है ।
 नारी का बहुत जगह से फटा हुआ कपड़ा फैÞशन नहीं, निर्लज्जता है ।
 ईश्वर को हँसने और मुस्कुराने वाले होंठ सबसे अधिक अच्छे लगते हैं ।
 स्त्री का मायका उसके लिए मंदिर की मूर्तियाँ हैं, उनका अपमान उसके लिए असहनीय है ।
 जब सास–बहू मिलकर हँसती हैं तो घर मुस्कुराता है ।
 खड्डे से बड़ा कुआँ है, कुएँ से बड़ा तालाब से बड़ा समुद्र है, समुद्र से बड़ी इंसानियत और मन की शांति है ।
 परिश्रम सभी समस्याओं का हल है ।
लगभग २००० सूक्तियों के लेखक वाधवानी जी ने यह नवीनतम पुस्तक अपनी माँ लाली बाई जी को समर्पित की है । धनहीन होते हुए भी उच्च शिक्षित होना दर्शाता है कि वे स्वयं भी आदर्शवादी, संस्कारी और कर्मठ हैं । उनको स्वर्णिम भविष्य की अनंत शुभकामनाएँ देते हुए कामना करती हूँ कि वे इसी तरह साहित्य के अनमोल मोती समाज को बाँटते रहें । अस्तु
समीक्षकः डॉ. बीना राघव, गुरुग्राम, (हरियाणा)

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: