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न होगी राह-ए-ज़िंदगी हमवार, डर है कहीं डूब न जाउँ मझधार ? लक्ष्मण नेवटिया

Laxman Nevatiya
 

अब भी हुई देर तो

आना उनका
उम्मीदों से
मेरी आँखों में
खडी करता है
इत्मीनान की मिनार।

बहकते पाँव मेरे
मुड जाते हैं
राह-ए-ज़िंदगी
कर गिले शिकवा
दरकिनार।

पानी में कागज की नाव सा
अधूरा जीवन
चराग़-ए-रहगुज़र बन
लौटने लगता है
सहमति के किनारों में
जब उगता है ए’तिबार।

बुनने लगती आसियाना
दिनरात के तिनकों से
हमारी समझदारी
मस्लहत का ये तक़ाज़ा है
आओ ना प्रिये ! एकबार।

उडिकते उडिकते
कहीं देर न हो जाए
अब भी हुई देर
न होगी राह-ए-ज़िंदगी हमवार
डर है कहीं डूब न जाउँ मझधार?

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लक्ष्मण नेवटिया,
विराटनगर -९

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