राष्ट्र के समक्ष खडी सभी चुनौतियों का मूलगामी उपाय : हिन्दू राष्ट्र की स्थापना
इस भारतभूमि का इतिहास जितना प्राचीन और पराक्रम से भरा है, उतना अन्य किसी भी देश का नहीं है । राम, कृष्ण आदि अवतारों से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज तक इस भूमि ने आदर्श राज्यव्यवस्था देखी । अनेक यातनाएं सहन करने के उपरांत वर्ष 1947 में प्राप्त स्वतंत्रता के पश्चात भी, प्रत्येक भारतीय को रामराज्य की अर्थात आदर्श राष्ट्र की आशा थी । आज भी आदर्श राज्य कहते ही आंखों के सामने ‘प्रभु श्रीरामचंद्रजी का राज्य’ अथवा ‘शिवाजी महाराज का हिन्दवी स्वराज्य’ आता है । आज हिन्दुआें की दयनीय स्थिति को देखते हुए भारत को अपना गौरवशाली इतिहास दोहराना आवश्यक है । उसी के लिए इस लेख का प्रयोजन है !
कितना बडा यह दुर्भाग्य !
देश में कोरोना का प्रकोप बढाने में तब्लीगी जमात ने बडी भूमिका निभाई । देश–विदेश से आए अनेक तब्लीगियों ने कानून तोडा; इसलिए केंद्र सरकार उनके विरुद्ध कार्यवाही कर रही है । तब्लीगियों का सूत्र देखा जाए, तो धधकते ज्वालामुखी की मात्र एक लपट है । ऐसी घटनाएं इससे पहले भी हुई हैं । कश्मीर से विस्थापित हमारे ही देश के कश्मीरी हिन्दुआें को पुनः उनके घर भेजने के लिए 3 दशकों के पश्चात भी प्रयास नहीं किए गए; परंतु हजारों किलोमीटर दूर म्यांमार से खदेड दिए गए रोहिंग्या मुसलमान निकट के बांग्लादेश में न जाकर बडी सहजता से जम्मू में बस गए । जहां एक शहर से दूसरे शहर में जानेपर यदि हमारे पास पैसे न हों, तो हमारी स्थिति कठिन हो जाती है; वहीं ये विदेशी लोग अवैधरूप से भारत में घुस आते हैं, अंदरतक पहुंचते हैं और सुख–चैन से जीवन व्यतीत करते हैं ! वास्तव में यह भारत की एक जटिल समस्या है । आतंकियों के ‘जनाजों’ में हजारों की संख्या में भीड इकट्ठा करनेवाले देशद्रोही और इसी देश में जन्मे ‘टुकडे–टुकडे गैंग’ को देश के कुछ राजनेताआें से मिलनेवाला समर्थन सर्वविदित है, अन्यथा इस देश में भारतविरोधी मानसिकता तैयार होना संभव नहीं । जहां भारतीय सैनिकों द्वारा पाकिस्तान में घुसकर किए गए पराक्रमपर भी संदेह करनेवाले महानुभाव इस देश में हैं, वहां इससे अलग तो कुछ हो ही नहीं सकता था !
कांग्रेस ने सत्ता में आने के उपरांत बहुसंख्यक हिन्दुआें के संदर्भ में अपने कर्तव्यों की जानबूझकर उपेक्षा की । आज ‘सीएए’ और ‘एनआरसी’ जैसे देशहित के कानूनों का विरोध करने के पीछे अल्पसंख्यक समुदाय के तुष्टीकरण की नीति है, यह अलग से बताने की आवश्यकता नहीं । मूल संविधान में मनमानी पद्धति से संशोधन कर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान में ‘सेक्युलर’ शब्द घुसाया और उसके पश्चात ‘सेक्युलर’ शब्द के किसी भी अर्थ को आधिकारिक रूप में स्वीकार न कर हिन्दुआें के मौलिक अधिकारों की, साथ ही देशहित की बार–बार बलि चढाई गई और आज भी दी जा रही है । देशहित के लिए कोई कानून बनाते समय देश में दंगे जैसी स्थिति उत्पन्न होती है । कल चीन ने यदि भारत पर आक्रमण किया और चीन का खुला समर्थन करनेवाले पाकिस्तान ने भी यदि उसमें भाग लिया, तो हमारे पराक्रमी सैनिक सीमा पर शत्रु को पानी पिलाएंगे, इसके प्रति हम आश्वस्त हैं । परंतु पाकिस्तान का समर्थन करनेवाले देश के अंतर्गत शत्रुआें का सामना करने के लिए हम कितने तैयार हैं, इसका विचार प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी नागरिक को करना चाहिए । इसिस जैसे आतंकी संगठन में भर्ती होने के लिए इसी देश से पैसे और शिक्षित लोगों की आपूर्ति की जाती है, इसी से सबकुछ समझ में आता है ।
देश की धर्मांध शक्तियों का यह विचार है कि ‘भारत की जनता के लिए बनाए गए कानून और नियम हमारे लिए हैं ही नहीं ।’ जहां ऐसे पंथों की मुलभूत सीख ही यह है कि ‘पंथ ही सर्वोच्च है’, तो यहां इससे अलग और कुछ आशा नहीं की जा सकती; परंतु अन्य देशों में कानून और नियमों का पालन करनेवाले धर्मांध केवल भारत में ही अधिक कट्टर बन जाते हैं । अनेक वर्ष उपरांत न्यायालय द्वारा राममंदिर प्रकरण में निर्णय देने के उपरांत भी मंदिर के शिलान्यास के विषय से विवाद उत्पन्न होता है । एक ओर आतंकियों के जनाजे में भीड इकट्ठा होना, आतंकियों का वकालतनामा लेना जैसे देशघाती कृत्यों का कोई विरोध नहीं किया जाता । तो दूसरी ओर देश के विभाजन के समय ‘हमें हमारा प्रांत चाहिए’, ऐसा कहने के कारण मुसलमानों को पाकिस्तान देने के पश्चात, शेष भूमि स्वाभाविकरूप से ही खंडित भारत में रहनेवाले बहुसंख्यक हिन्दुओं की ही है; परंतु ‘हिन्दू राष्ट्र’ की मांग करने पर आकाश पाताल एक कर हिन्दुओं को ‘सांप्रदायिक’ कहा जाता है । कितने भी अन्याय–अत्याचार हो, ‘हिन्दुओं को ही सहन करना चाहिए; क्योंकि वे सहिष्णु हैं’, यह मानसिकता उत्पन्न करने में राज्यकर्ता सफल हुए हैं । सनातन धर्म में बताई गई पराक्रम, साहस और बुद्धिमानी की परंपरा हिन्दुआें के जन्म से ही उनके मन से मिट जानी चाहिए; इसके लिए आवश्यक व्यवस्था बनाई गई । अहिंसा, सहिष्णुता, परोपकार, त्याग जैसी संज्ञाआें का वास्तविक अर्थ एक ओर रखकर, स्वार्थी राजनेताआें को अपेक्षित अलग ही व्याख्याएं सिखाकर, हिन्दुआें को कायर बना दिया गया । इस कारण आज कोई भी हिन्दुआें की धार्मिक भावनाआें का अनादर करता है, देवी–देवताआें के नग्न चित्र बनाता है; नाटकों, फिल्मों और विज्ञापनों में देवता, संतों और राष्ट्रपुरुषों का कितना भी अनादर करता है, तब भी हिन्दू निष्क्रिय ही रहते हैं । यही परिणाम हिन्दुआें की राष्ट्रीय भावनाआें पर भी हुआ । इसके कारण ‘राष्ट्रध्वज का अनादर रोकें’ और ‘राष्ट्रगीत के समय खडे रहें’, जैसी सामान्य बातें भी हिन्दू जनजागृति समिति को कुछ वर्ष समाज में जाकर सिखानी पडी । हमारी धार्मिक और राष्ट्रीय भावनाएं 24 घंटे जागृत रहनी चाहिए, तभी राष्ट्र की और अंततः हमारी उन्नति होती है । आज इस देश में देशहित में बोलनेवालों और कार्य करनेवालों को ‘फैसिस्ट’ कहा जाता है । ‘हिन्दू आतंकवाद’ का हौवा खडा कर हिन्दू संगठनों को मिटाने का षड्यंत्र रचा जाता है । इसके विपरीत देशविरोधी गतिविधियां करनेवालों के लिए तथाकथित विचारक ‘पुरस्कार वापसी’ करते हैं । हमें इस षड्यंत्र को समझना होगा ।
‘राष्ट्रहित सर्वोपरि ।’ अथवा ‘तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे ना रहे ।’ की महान एवं संपूर्णतः निष्कलंक, निस्वार्थ और राष्ट्रनिष्ठ विचारधारावाले हिन्दू समाज ने देश की प्रगति के लिए अपना सबकुछ अर्पण किया है; इसलिए ऐसे समाज के हित के लिए ‘लोककल्याणकारी हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना करना, समय की मांग है । यही मानवता, व्यवहार, तर्क और विज्ञान आदी सभी स्तरों पर उचित और वस्तुनिष्ठ भी है ! अर्थात हिन्दू राष्ट्र की यह संकल्पना आध्यात्मिक स्तर पर अपेक्षित है । उससे ही वास्तव में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र पर सकारात्मक परिणाम होगा । वर्तमान में हिन्दू जनजागृति के प्रेरणास्रोत परात्पर गुरु (डॉ.) जयंत आठवलेजी ने सर्वप्रथम यह विचार रखा । एक समय जब ‘हिन्दू राष्ट्र’ शब्द भी अस्पृश्य था, परंतु आज लोकसभा और विदेश में भी इसकी चर्चा हो रही है । अनेक वर्ष से लंबित धर्म और राष्ट्र की अनेक समस्याआें का कालप्रवाह में समाधान हो रहा है ।
इन प्रयासों को गति प्रदान करने हेतु उसे ‘आध्यात्मिक हिन्दुत्व’ का समर्थन मिला है । हिन्दू राष्ट्र स्थापना हेतु देश–विदेश के क्रियाशील हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनों के प्रमुख, विगत 8 वर्ष से गोवा में हो रहे ‘अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन’के उपलक्ष्य में एकत्रित होकर क्रियाशील विचारों का आदान–प्रदान कर रहे हैं । हिन्दू राष्ट्र के समान सूत्र पर प्रत्येक महीने में राष्ट्रीय समस्याआें पर आधारित एकत्रितरूप से वैध आंदोलन चलाना, धर्मजागृति से संबंधित सभाएं करना, न्यायालयीन संघर्ष करना, संस्कृति को संजोना, हिन्दुआें को संगठित करना इत्यादि अनेक प्रकार के राष्ट्रव्यापी कार्य एकत्रित रूप से कर रहे हैं और उसे अच्छी सफलता भी मिल रही है । ये इन अधिवेशनों की फलोत्पत्ति है । वर्तमान में कोरोना प्रकोप के कारण एकत्रित होना संभव नहीं है; परंतु हिन्दू राष्ट्र की आशा से प्रेरित सभी हिन्दू धर्माभिमानी ‘नवम अखिल भारतीय हिन्दू राष्ट्र अधिवेशन’के उपलक्ष्य में पुनः एक बार हिन्दू राष्ट्र का जागरण करनेवाले हैं । हमें भी इस ऑनलाइन अधिवेशन में भाग लेकर मन पर यह बात अंकित करनी है कि हमें ‘नन्हा सा नहीं, अपितु महान योगदान देना है’ और उसके लिए ही क्रियाशील होना है । जयतु जयतु हिन्दुराष्ट्रम् ।
वर्तमान में भारत एक अत्यंत संवेदनशील मोड पर खडा है । देश पर भीतरी और बाहरी संकटों की श्रृंखला ही चल रही है । ऐसा काल भारत की स्वतंत्रता के 72 वर्षों में कभी भी नहीं आया था । एक ओर देश में कोरोना महामारी ने उपद्रव मचा रखा है । जिसकी रोकथाम हेतु भारत सरकार अथक प्रयत्न कर रही है । गत 4 माह से देश में लॉकडाऊन है । पूरा तंत्र सक्रिय है, परंतु अपेक्षित सफलता मिलती दिखाई नहीं दे रही । इस प्रकार देेश की आंतरिक स्वास्थ्य समस्या ने करोडों की जनता को घर बैठा दिया है, जिससे अर्थव्यवहार ठप्प है, बेकारी बढ गई है और विकास दर थम गई है । दूसरी ओर ऐसी परिस्थति में देश पर बाहरी आक्रमण आरंभ हो गए हैं । पडोसी राष्ट्र चीन भारत के विरुद्ध लडने को तैयार बैठा है । गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ कर, भारतीय सैनिकों पर प्राणघातक आक्रमण किया । इसमें भारत के 20 सैनिक हुतात्मा हो गए; परंतु भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को मारकर उन्हें अच्छा सबक सिखाया है । इससे चीन के अहंकार को ठेस लगी है ।
अमेरिका ने चीन को कोरोना महामारी के लिए उत्तरदायी घोषित किया है और भारत ने इसका समर्थन किया है, इसलिए भारत और अमेरिका के घनिष्ठ संबंध हो गए हैं । इसके साथ ही अमेरिका ने वैश्विक स्तर पर भारत को चीन केे विकल्प के रूप में सामने लाने का प्रयत्न आरंभ किया है । इस पूरी स्थिति से होनेवाली आर्थिक हानि के प्रतिशोध स्वरूप चीन ने अब भारत के विरुद्ध खुला युद्ध छेड दिया है । इसके लिए वह भारत को चारों ओर से घेरने का प्रयत्न करने लगा है । वह भारत के पुराने शत्रु पाकिस्तान को भारतविरोधी गतिविधियां करने के लिए उकसा रहा है, इसके साथ ही भारत के पारंपरिक मित्र नेपाल को भी वह भारत के विरुद्ध भडकाकर भारत के भूभाग पर दावा करने के लिए उद्युक्त कर रहा है । दूसरी ओर बांग्लादेश में उपनिवेश कर बांग्लादेश को भी अपने शिकंजे में रखने का प्रयत्न कर रहा है । इस प्रकार भारत पर चारों ओर से एक ही समय पर आक्रमण करने का चीन का षड्यंत्र सामने आ रहा है । कुल मिलाकर वैश्विक स्तर पर 2 गुट बन गए हैं – चीन और उसकी कठपुतली बने राष्ट्र एक ओर और चीन के विरुद्ध भूमिका लेनेवाले राष्ट्र दूसरी ओर । यह पूरी परिस्थिति तृतीय विश्वयुद्ध की पूर्वपीठिका बन रही है, यही इससे स्पष्ट हो रहा है ।
इस काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को कसौटी पर परखा जाएगा । चीन को हराने के लिए अमेरिका से संबंध दृढ करना, यूरोपीय राष्ट्रों की सहायता पाने का प्रयत्न करना, ऐसे प्रयास सरकार कर रही है । विदेशनीति के रूप में ऐसा करना योग्य है । वर्तमान में भारत द्वारा ली जा रही आक्रमक भूमिका प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों का मूर्त रूप है । तथापि देश के समक्ष उत्पन्न विकट स्थिति को देेखते हुए, इन प्रयत्नों में और अधिक गति आना अपेक्षित है । अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्रों का भारतद्वेष छिपा नहीं है । गत अनेक दशकों से भारतद्वेष के कारण उन्होंने पाक की आर्थिक सहायता की है । इस आर्थिक सहायता का दुरुपयोग करते हुए पाक ने यह पैसा जिहादी आतंकवाद के पोषण में लगाया । यह पाक समर्थित आतंकवाद और उसका छिपा समर्थन करनेवाले चीन अब अमेरिका और यूरोपीय राष्ट्रों के लिए सिरदर्द बन चुके हैं । इसलिए ये राष्ट्र अब भारत के पक्ष में खडे हैं; परंतु यह समर्थन मित्रता के कारण निर्माण नहीं हुआ है । अपितु भारत, चीन अथवा पाक के विरुद्ध कुछ तो कर रहा है, इसलिए अब उसके कंधे पर बंदूक रखकर अपना हित साधने का प्रयत्न ये राष्ट्र कर रहे हैं । इसलिए जब सचमुच युद्ध का समय आएगा, तब ये राष्ट्र भारत की कितनी सहायता करेंगे, यह प्रश्न है । इसके लिए ‘स्वयं ही युद्धसज्ज और स्वयंपूर्ण होना’ इसके अतिरिक्त भारत के समक्ष अन्य कोई पर्याय नहीं । इसे देखते हुए अब मोदी चीन, पाक और अब नेपाल को कैसे संभालेंगे, इस पर भारत का भविष्य निर्भर है ।
कूटनीतिक अथवा अन्य प्रयत्नों सहित शत्रु से श्रेष्ठ बनना हो अथवा आगे बढना हो, तो उसके लिए धर्माधारित राज्यव्यवस्था आवश्यक होती है । इतिहास इसका साक्षी है । काल की कसौटी पर यदि हमें वास्तव में सफल होना हो, तो छत्रपति शिवाजी महाराज का आदर्श अपने सामने रखना होगा । केवल सैद्धांतिक स्तर पर नहीं, अपितु वह आदर्श भारतीय नेतृत्व को अपनाना काल की आवश्यकता है । आज जैसी परिस्थिति 400 वर्ष पूर्व भी थी । उस समय छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे सर्व गुणसंपन्न राजा ने पांच मुगल साम्राज्यों को धूल चटाई थी । ऐसा राज्यकर्ता धर्माधिष्ठित होता है । इसलिए आज की परिस्थिति पर विजय प्राप्त करने के लिए धर्माधारित राज्यव्यवस्था निर्माण करना आवश्यक है । जब तक हमारा देश तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के घेरे में रहेगा, तब तक इस देश का भविष्य अधर में ही है ।
इस अवधारणा का एक और छोर है । आज जिहादी आतंकवाद और चीन–नेपाल का साम्यवाद इन बाहरी चुनौतियों के साथ ही भारत को आंतरिक असुरक्षा की समस्या ने भी ग्रसित कर लिया है । 30 वर्षों पूर्व ‘जिहादी आतंकवाद’ नामक रक्त से सने हुए ‘कश्मीरी हिन्दुआें के वंशविच्छेद’ तक जाने की आवश्यकता नहीं है । गत वर्षभर की घटनाएं भी भारत की आंतरिक कानून और न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती सिद्ध हो रही हैं । गत दिसंबर महीने में मानवता के हित में पारित ‘नागरिकता सुधार कानून’ का तीव्र विरोध करनेवालों ने देशभर में दंगे करवाए, आगजनी की, देश की संपत्ति की असीमित हानि की । राजधानी देहली से लेकर कानपुर, मुंबई तथा दक्षिण भारत में भी राष्ट्रद्रोही घटनाआें की लपटें फैली थीं । यह राष्ट्र घातक षड्यंत्र भारत को तोडने के लिए प्रयासरत है । यह उदाहरण अभी का है । वास्तव में हमने गत 7 दशकों से इस पर रोक लगाने के भरसक प्रयास किए हैं; परंतु दिन प्रतिदिन आंतरिक सुरक्षा की समस्या हाथ से निकलती जा रही है । इस समस्या पर वास्तव में देखें तो हिन्दुआें को अब सभी स्तरों पर आध्यात्मिक बल बढाना आवश्यक हो गया है । क्योंकि आध्यात्मिक स्तर को छोडकर भारत ने सभी स्तरों पर प्रयत्न करके देखा है; परंतु भारतीय व्यवस्था इस समस्याआें पर उपाय योजना करने में पूर्णतः असफल सिद्ध हुई है । यह हमें मानना ही होगा । समस्या की तीव्रता कम न होकर वह अनेक गुना बढती ही जा रही है, इससे स्पष्ट होता है कि आज की व्यवस्था व्यर्थ है ।
इसके लिए अब एक ही विकल्प बचा है, भारत को आध्यात्मिक स्तर का ‘हिन्दू राष्ट्र’ घोषित करना । यह साध्य होने के लिए हिन्दुआें को ही संगठित होकर राष्ट्र और धर्म के उत्थान हेतु सक्रिय होना चाहिए । इसी कार्य के लिए हिन्दू जनजागृति समिति पिछले 8 वर्ष से गोवा में अखिल भारतीय हिन्दू अधिवेशन का सफल आयोजन करती आ रही है । इस बार कोरोना महामारी के कारण 30 जुलाई से आरंभ होनेवाला नौवा अधिवेशन ऑनलाइन होगा । इस निमित्त देश–विदेश के हिन्दुत्वनिष्ठ अपने–अपने निवासस्थान में रहकर, इस अधिवेशन में ऑनलाइन सम्मिलित होंगे । इसी प्रकार, एक ही समय हजारों हिन्दुत्वनिष्ठ, राष्ट्राभिमानी, धर्माभिमानी, जिज्ञासु यह अधिवेशन देख सकेंगे । इस अधिवेशन में व्यक्त होनेवाले विचारों से ‘हिन्दू राष्ट्र की आवश्यकता’, ‘राष्ट्र और हिन्दू धर्म पर बार–बार होनेवाले आघातों के मूल कारणों का विश्लेषण और उनका उचित निवारण’ आदि विषयों पर व्यापक विचारमंथन होगा । यह अधिवेशन 30 जुलाई से 2 अगस्त और 6 अगस्त से 9 अगस्त 2020 के बीच होनेवाला है । यह अधिवेशन हिन्दू जनजागृति समिति के अधिकृत ‘फेसबुक पेज’ और ‘यू–ट्यूब चैनल’ पर देखा जा सकेगा । समस्त राष्ट्रप्रेमी और धर्मप्रेमी यह अधिवेशन अवश्य देखें, यह मैं विनती करता हूं ।





