पति सिर्फ सिंदूर देता है : निशा अग्रवाल
निशा अग्रवाल, धरान | कुछ दिनों पहले एक विवाह में सम्मिलित होने का अवसर मिला।
यूं तो बहुतेरे विवाह होते हुए देखें हैं। कुछ अपनों के कुछ परायों के और खुद का भी। पर इस विवाह में आंखों के साथ-साथ मेरे दिमाग ने मेरी सोच ने कुछ देखा, कुछ महसूस किया।
विवाह मंडप फूलों से सजा किसी का जीवन सजाने को उल्लसित था । दुल्हन सोलह सिंगार किए मद्धम गति से पायलों की रुनझुन के साथ किसी जवाकुसुम सी आई और दूल्हे के पार्श्व में बैठ गयी। विवाह की विधियां शुरू हुईं। मंत्रोच्चार के साथ मालाओं और वचनों का आदान प्रदान हुआ। आखिर में दूल्हे ने दुल्हन की मांग में सिंदूर भरा, और इस तरह विवाह पूर्ण हो गया। पूरे विवाह में एक सिंदूर मात्र था जो दूल्हे ने दुल्हन को दिया। बाकी सारा श्रृंगार वह पहले से किए आई थी। उस दिन एक सोच ने मेरे अंदर जन्म लिया कि जब पुरुष किसी औरत को पत्नी के रूप में स्वीकार करता है, तो केवल सिंदूर देता है। फिर किसी पति के ना रहने पर औरतों से वो श्रृंगार की सारी चीजें क्यों छीन ली जाती है ??? जो वह बचपन से करती आई है। लाल जोड़े वो बचपन से पहनती आयी है, मेहंदी हर तीज पर उसने लगाई है, चूड़ियां पहले भी खनकती थी, पाजेब आंगन में बचपन से बजती थी। यह तो छोड़ो जो जीवन विधाता देता है, माता-पिता जिसे धरा पर लाते हैं, पति के ना रहने पर औरतों से वो जीवन तक छीन लिया जाता था। विधाता ने तो पुरुष और स्त्री को एक ही समय, एक ही ग्रह नक्षत्र में, एक साथ जीवन दिया। फिर यह कैसे समाज की रचना की हमने ??? पुरुष को देवता और नारी को दासी बना दिया। जहां पुरुष को अधिकारी और नारी को उसका अधिकार बना दिया। यह कैसी सभ्यता ???? यह कैसी संस्कृति ???
पुरुष के पुरूषत्व को केवल पुरुष समाज ने ही नहीं नारी समाज ने भी पोषित किया। नारी जीवन का केवल पुरुषों के द्वारा दमन नहीं हुआ, नारी जीवन का नारी ने भी दमन किया।
एक कदम बढ़ाओ और सोचो। जब कोई किसी को मारता है तो उसे हम कहते हैं कि ‘जब तुम जीवन दे नहीं सकते तो तुम्हें लेने का कोई अधिकार नहीं ‘ और यह पूर्णरूपेण सत्य भी है। फिर जो जीवन, जो श्रृंगार पुरुष नहीं देता वह सब उसके ना रहने से क्यों छीन लिया जाता है नारी से ?? क्यों विवश किया जाता है नारी को बदरंग और नीरस जीवन जीने के लिए या पति के साथ मर जाने के लिए ??
खैर उदारवादी दृष्टिकोण रखने वाले समाज सेवकों ने सामाजिक युद्ध से सती प्रथा का उन्मूलन कर दिया। विधवा विवाह का रिवाज भी चल पड़ा है। जो पूर्णरूपेण प्रशंसनीय है। आजकल बहुत से समाज में पति के ना रहने पर औरत के पहनने, ओढ़ने, खाने पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया है। फिर भी आज भी भारत के कोने कोने में ऐसी समाज है, जो पति के ना रहने पर औरतों को सम्मान पूर्वक सामाजिक जीवन नहीं जीने देता। सफेद और काले कपड़ों में लिपटी वह गठरी सी कहीं किसी कोने में अपनी सांसे गिनती रहती है।
जीवनसाथी का बीच रास्ते में चले जाना यह तो पुरुष और नारी दोनों के लिए समान दुख का विषय है। फिर पुरुष ज्यों का त्यों और नारी प्रतिबंधित क्यों ????
विधाता ने जीवन दिया, जीने का हक विधाता ने दिया, उसका हंसना, उसका मुस्कुराना, वह साज, वह श्रृंगार सब प्रकृति का दिया है।’ पति सिर्फ सिंदूर देता है’ तो उसके ना रहने से छोड़ना भी तो सिर्फ सिंदूर ही चाहिए। क्या यह तर्कसंगत नहीं ??? सोचो एक बार। जरूर सोचो।।

धरान

