एक दिन का सशक्तिकरण
मुन्नी भारती:अन्तर्रर्ााीय महिला दिवस मुख्य रूप से कामगार महिलाओं के लिए बनाया गया एक विशेष दिन है जिसे प्रत्येक वर्ष८ मार्च को मनाया जाताहै । यह वैश्विक स्तर पर मनाया जाने वाला महिलाओं के लिए एक मात्र दिवस है जिसकी शुरूआत सब से पहले १९ मार्च १९११ को जर्मनी में अमेरिकन सोश्लिस्ट पार्टर्ीीारा की गयीथी । बाद में औद्योगीकरण और आर्थिक असमानता से उत्पन्न कामगार वर्ग की स्थितियों पर विचार करने के लिए भी इस दिन को सामूहिक स्वीकृति मिली । रुसी क्रांति की शुरुआत भी महिला आंदोलन के साथ जोडÞकर देखी जानी चाहिए । इस क्रांति की जडÞ में भी महिला कार्य कर्ताओं ने बढ-चढ कर हिस्सा लिया था । इतना ही नहीं धर्म और रुढीवादिता को लेकर महिलाओं ने समाज के कई क्षेत्रों में क्रांतिकारी कदम उठाया जो विकासशील देशों की महिलाओं के लिए आज भी एक मिशाल है ।
विश्व की महान महिला लेखिकाएं जैसे-सिमोन द वोउआ, बर्जिनिया उल्फ आदि ने महिलाओं के हक में बहुत पहले से हीं कलम उठा लिया था । यूरोपीय देशों में यौन वर्जनाओं से लडÞने की क्षमता आज भी जितनी पश्चिम के स्त्रीयों में है उतना एशिया की महिलाओं में देखने को नहीं मिलता । भारत में तो महिलाओं को केवल संवैधानिक अधिकार हीं प्राप्त हो पाया है । समाज में आज भी वे जीवन के चारो चरणो अर्थात बचपन में मां बाप द्वारा शादी के बाद पति द्वारा और फिर बुढÞापे में अपने बेटों द्वारा अनुशासित होती रही है । मार्क्स ने संपति और परिवार में इस बात की तरफ इशारा किया है कि पुरुषवादी समाज पत्नी से अपने ही संतान की आशा रखता है भले हीं वह नपुंसक ही क्यों न हो बच्चा पैदा नहीं होने पर केवल पत्नी को ही बांझ और निर्बंसी जैसे उपनामों से नवाजा जाता है । इन वैज्ञानिक सामंस्यों पर भी महिलाएं ही प्रताडित की जाती है ।
लेकिन दूसरे अर्थाें में इन तमाम लांछनाओं के बावजूद पुरुष वर्ग अपने आपको स्त्रियों को सम्मान की नजर से देखने वाला घोषित करता है । साथ ही पुरुष वर्ग यह धौंस भी जमाते रहा है कि महिलाएं ज्यादा फूदकेंगी तो उनको कभी भी औकात दिखाया जा सकता है और वो कुछ भी नहीं बिगाडÞ सकती न देश में चल रहे कानून को बदल सकती है नहीं इस सर्ंदर्भ में कोई गंभीर कारवाई हो सकती है । पुरुष मन हमेशा यह दंभ भरते रहता है कि महिला यदि प्रेमिका नहीं बन सकती तो जब भी मौका मिले तो वह उसका मुंह काला कर सकता है, यह मानते हुए कि कोई भी लडÞकी बलात्कार की शिकायत घर पर करेगी तो कोतवाली में यह मानकर परिवार वाले रिपोर्ट कराने नहीं जाएंगे कि इससे घर की प्रतिष्ठा खतरे में आ जायेगी । स्त्रियाँ स्कूल/काँलेज जातीहैं तो मास्टर या प्रोफेसर बनकर, नौकरी करने जातीहैं तो अफ्सरबनकर, इलाज कराने जाती हैं तो डाँक्टर बनकर, सिफारिश कराने यदि जाती हैं तो नेता और मंत्री बनकर, मदद के लिए जाती हैं तो सेठ, साहूकार, जागीरदार और उद्योगपति बनकर नायिका बनने के लिए जाती हैं तो निर्माता और निर्देशक बनकर, पुण्य कमाने जाती हैं तो पुजारी और मठाधीश बनकर, और अदालत में न्याय के लिए जाती है तो वकील बनकर मैं हमेशा तुम्हारा पीछा करता रहूंगा तुम मेरे चंगुल से बच नहीं सकती । ऐसे में समाज में विद्यमान पुरुषवादी लोगों का नजरिया नहीं बदलेगा तब तक महिलाओं का विकास संभव नहीं हो सकता । आज के स्त्री प्रश्नों को अस्मितावादी विमर्श से जोडÞकर देखना समीचीन होगा ।
समाज के विभिन्नवर्ग की महिलाओं की समस्याएँ अलग-अलग है । इसका सबसे बडÞा कारण भारत में व्याप्त सामाजिक वर्ण्र्ाायवस्था है । इस देश में जहाँ एक महिला का शोषण जाति के नाम पर होता है तो दूसरी का उसको स्वतंत्रता प्रदान करने के नाम पर । एक घर के बाहर उत्पीडित होती है तो दूसरी घर के अंदर जलायी जाती है । यह महिलाओं में आपसी एकता की कमी को दर्शाता है । संसद में उठाये गए महिला आरक्षण के विधेयक को भी इसी चश्में से देखा जाना चाहिए । अब सवाल यह है कि समाज के विभिन्न वर्गाें से आनेवाली महिलाओं को किस तरह विकास के मुख्य धारा से जोडÞा जाए इस पर विचार किये बगैर विकास को परिभाषित कर पाना असंभव ही नहीं नामुमकिन भी है । सामाजिक विकास के लिए अपनाया गया कोई भी फार्मूला असफल साबित होगा यदि उसमें महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित न की जाय । साल में केवल एक दिन -डमार्च) महिला उत्थान के नाम पर रख देना और ३६४ दिनकान में तेल डालकर सो जाना राधिका तंवर की हत्या जैसी शर्मनाक घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाने में कारगर भूमिका निभाता है ।
खाप पंचायत की बात तो परिवार की मर्यादाओं के साथ जोडÞकर पहले से ही देखा जाता रहा है । जिसतरह से ग्रामीण विकास के बगैर देश का विकास संभव नहीं है ठीक उसी तरह से दलित, आदिवासी और पिछडÞे वर्ग की महिलाओं का विकास किये बिना इस समाज का आधा हिस्सा पंगु ही रह जायेगा । भूमंडलीकरण के इस दौर में महिलाएँ अपनी पहचान तब तक नहीं बना पाएंगी जब तक उनकों योजना निर्माण के कार्यां में हिस्सेदारी नहीं दी जाएगी ऐसे में सशक्तीकरण शब्द अधूरा रह जायेगा ।
-लेखिकाः शोध छात्रा, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली)

