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अब लिखो नई कहानी : श्यामानन्द ठाकुर

 

मैं जाति नही सिर्फ धर्म हूँ
मैं सीधा सादा कर्म हूँ ।।
मैं शीतल हूँ फिर भी गर्म हूँ ।।
मैं इस जीवन का मर्म हूँ ।

तो जाति का कारण क्या है ।
ये धर्म कर्म या जन्म है ।।
जन्म से कर्म से या फिर धर्म से ।
ये जाती बना किस ढंग से।।

जरा समझो बूझो जानो ।
खुद को थोडा पहचानो ।।
जाओ पिछे इतिहास में ।
अपने जीवन के अभ्यास में ।।

जब कुछ भी नही सिर्फ जीवन था ।
जीवन को जीना कर्म था ।।

“जीने की कला को सीखते ।
जो कुछ निकाला वो धर्म था ।।”

पूर्बज के इस बिज्ञान को
उनके जीवन के ज्ञान को ।
आगे लाना जरूरी था ।
जीवन का मजबूरी था ।।

ज्ञान बिज्ञान के इस मेल ने ।
आगे बढ़ने के इस खेल ने ।।

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“जो कुछ गढ़ा वो साथी था ।
गढ़ने के गूढ कला को
बढ़ाने बाला जाति था ।।”

गूढ ज्ञान को सिखाने वाला।
कोई ब्यबस्था तब बनि नही
सिर्फ अपने को ज्ञान देने की
कर्म प्रथा तब विकसित हुई।

जीवन का जो ज्ञान था उनको
उसका तब उपयोग हुआ।
एक सरह (कर्म)में संबंध गांठकर
जीवन में सहयोग हुआ।

सम से सम मिलने के कारण
गूढ कला का बिस्तार हुआ
समगुणों के समन्वय से
उत्कृष्ट कला का अविष्कार हुआ।

जीवन जीने के कठिन चक्र में
जब समाज का गठन हुआ ।
कर्म आधारित नीति बनी
और चार कर्मो का चयन हुआ ।।

अपने अपने बिसिस्ट गुणों से
लोगों ने कर्म का चयन किया ।
मिलजुल कर समाज चलाई
और अपना कर्म निर्वाह किया ।।

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इतिहास के सुंदर पन्नो में
सब कुछ लिखा है भाई ।।
पढ़ना इसको बहुत जरूरी
सुनने से कठिनाई ।।

धर्म ग्रंथ इतिहास हमारे
ज्ञान के हैं समंदर ।
जैसा खोजो वही मिलेगा
सब कुछ इसके अंदर।।

नए युग की नए समझ से,
बातें नही बनेगी ।
युग की बातें तब समझेंगे,
जब युग की समझ बनेगी ।।

जात जन्म से होती आज
फिर भी कर्म महान ।
अपने अपने कर्म धर्म से
छोटा बड़ा इंसान ।।

जाति बाद और पंथ बाद से
फायदा होगा थोड़ा।
सत कर्मो से ही आगे बढ़ोगे
जाती न पथ का रोड़ा ।

जाति पाति और भेदभाव को
पीछे रखना जरूरी ।
सबका सब सम्मान करें
औऱ खत्म करें ये दूरी ।।

जाति नाम से राजनीति
मत करना मेरे भाई ।
ऐसे बचनों से भला न होगा
बस जाति की खाई बढ़ेगी ।

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जाति हमारी मानव है,
सबका करो सम्मान ।
कर्म के जैसा फल मिलेगा
ये गीता का ज्ञान ।।”

देखो समझो सीखो प्रकृति से
कितने जाती प्रजाति।
सब कोई मिलकर साथ में रहते
सारे बनकर साथी ।।

समझ सको तो बात ये मेरी
समझना बहुत जरूरी ।
जाति पाती से कुछ न होबे
कर्म ही धर्म की धुरी ।।

याद ये रखना इतिहास के पन्नो में
तुम भी जब जाओगे ।
अपने अपने धर्म कर्म से ही
याद किये जाओगे ।।

आज के युग में जाति की बातें
हो गई बहुत पुरानी ।
“आगे बढ़कर ठीक करो
और लिखो नई कहानी ।।”

“अब लिखो नई कहानी ।”

संदर्भ… एक राजनीतिक ब्यबस्था को जाती गत नाम देना कितना उचित कितना अनुचित ।

श्यामानन्द ठाकुर (एस.एन.ठाकुर)
बनैनिया सप्तरी ।हाल विराटनगर..13

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