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पितृ अमावस्या पर

स्मृति में बाबु जी

आधी रात का समय है भोर के ३:४५ हुए हैं पर मेरी आँखों से नींद कोसों दूर है । बाबूजी की यादें नींद नहीं आने देती और नींद न आने की वजह से मन में बहुत सी बातें खेल रही थी । सोचते-सोचते मन कल की दिन में हुई चर्चा पर चला गया ।

कल सुबह ही से संवेदना देने आए परिवार और मित्रों की अच्छी भीड़ थी । मिलने आये लोग तरह तरह की बातों पर चर्चा परिचर्चा कर रहे थे । सब के सब विषयों पर अपने-अपने तर्क थे । कुछ लोग बोलते थे बहुत से लोग सुनते थे, कभी कभार अपनी राय भी ज़ाहिर करते थे । सब अपनी धुन में मस्त थे पर मेरा मन इन सब बातों पर नहीं टिक रहा था । बार-बार एकाकी मन उड़ कर बादलों के पार मेरे पूजनीय बाबूजी के पास पहुँचने को मचल रहा था । अजीब सी बेचैनी, अजीब सी कश्मकश से गुज़र रहा था मैं । भीड़ में बैठे हुये भी अपने को नितांत अकेला महसूस कर रहा था । बाबूजी की चिर स्मृतियाँ मेरे चारों और घूम रही थी और मेरा मन बेहद मायूस था । बाबूजी की यादें बेहद सता रही थी ।

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इतने में ही मुझे मेरे दफ़्तर में बैठे-बैठे बाबूजी की कही एक बात अनायास मेरे ज़ेहन में आयी और मन और भी उदास हो गया ।

बात कई साल पुरानी है । हम दोनों मेरे दफ़्तर में बैठे थे । बाबूजी भी सीमित शब्दों के मालिक और मैं भी कम बोलने वाला इंसान । हम दोनों अक्सर ख़ामोशी में ही एक दूसरे की बात समझते थे । अपना दुःख सुख एक दूसरे पर ज़ाहिर करते थे । न गिला शिकवा होती थी, न ही कोई शिकायत । बाबूजी कभी भी ज़रूरत के सिवा एक भी शब्द ज़्यादा नहीं बोलते थे ।

उस दिन भी मैं कुछ चिट्ठी पतरियों पर काम कर रहा थे, बाबूजी लगातार मेरी तरफ देख कुछ सोचते थे फिर अपने ख़यालों में ही कहीं गुम हो जाते थे । फिर कुछ देर बाद, अनायास ही बोल पड़े ।

बसन्त, तुमने मेरी सारी अच्छे मानवीय गुण तो अपनाए-अपनाए पर मेरा एक ख़राब गुण को भी क्यों अपने में समाहित कर लिया? मैं एकाएक आश्चर्य से बाबूजी की तरफ़ देखने लगा की बाबूजी की बातों का तात्पर्य क्या है । मेरी उलझन को देख, वो मुझे समझाने लगे । हम लोग आपस में मारवाड़ी भाषा में ही बातें करते थे ।

देखो तुमने आपसी बँटवारे के समय भी मैंने जो फैक्टरियाँ स्थापना की थी  अपने ज़िम्मे वही फैक्टरियाँ ली, हालाँकि उनसे भी बेहतर और कम्पनियाँ अपने ग्रुप में थी । इसके पीछे छिपे जज़्बात को मैं समझता हूँ । तुमने मेरे सारे मानवीय गुण को भी अपनाया – न किसी का मन दुखाते हो, न किसी से ऊँची आवाज़ पर बात करते हो, छोटे से छोटा कर्मचारी हो या बड़े से बड़ा ऑफ़िसर, सब से नम्रता से पेश आते हो, किसी का दुःख तुम बर्दाश्त नहीं कर सकते, तुम किसी का दिल नहीं दुखाते, अपनी हैसियत से ज़्यादा लोगों को देते हो और इसी नाम का लोग ग़लत फ़ायदा भी उठाते हैं तुमसे । और सब से बड़ी बात तुम में ईमानदारी है ।

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पर इन सब अच्छे गुणों के बीच तुमने मेरी सबसे कमज़ोर आदतें, अपने में ही घुट घुट के जीना पर किसी के आगे अपनी दिल की बातें न कह पाना और कभी किसी को किसी भी चीज़ के लिए ‘ना’ नहीं कहना चाहे अपने बस में हो या न हो, फिर भी क्यों अपने में समाहित किया । मेरी इस आदतों से मैं ने तो जीवन में बहुत कठिनाइयों का सामना किया है । और तुम ठहरे कोमल मन के इंसान, कैसे निबट पाओगे इस स्वार्थी दुनिया से ? बस यही बातें मुझे अक्सर बेचैन करती है – इतना कहते हुये वो फिर गम्भीर होकर मुझे देखने लगे ।

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माहौल थोड़ा बोझिल हो गया था । ना मैं कुछ बोल पा रहा था, ना बाबूजी के चेहरे से नज़र हटा पा रहा था ।

सच ही तो कहते थे बाबू जी, कहाँ आसान होता है इन आदतों के साथ जीना । आप बहुत याद आते हैं बाबू जी ।

आप जहाँ हैं हम सब पर आपकी स्नेह दृष्टि अवश्य होगी । हमेशा कोशिश है कि आपकी तरह बन सकूँ । आपकी यादों के साथ ही तो मैं हूँ बाबू जी । पितृ ऋण से मुक्त नहीं हो सकता होना भी नही चाहता क्योंकि मैं सदैव आपके साथ रहना चाहता हूँ । विनम्र श्रद्धांजली अर्पित करता हूँ बाबू जी आपके श्रीचरणाें में ।

 

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