युधिष्ठिर का राजधर्म : हेमराज सिंह ‘हेम’
युधिष्ठिर का राजधर्म
प्राची की स्वर्णिम आभा में, नूतन तेज भरा था,
दिनकर रथ आरूढ़ गगन में, तमिस्त्र देख डरा था।
लहर रही थी नील गगन में,कपि अंकिता पताका,
लहर लहर गर्वित थी जिसकी,और दण्ड था बांका।
बंदरवार सजी हर चौखट, स्वर्ण रजत की झालर,
तोरण द्वार सुशोभित सुन्दर,आज अलग था अम्बर।
गर्वित था हर जन पांड़व कुल, गर्वित थी हर नारी,
गर्वित था हर पुरजन परिजन, गर्वित हर महतारी।
आज गर्व उन्माद भरा था, इंद्रप्रस्थ का वासी,
विजयमाल शोभित था हर उर, हर्षित थी हर दासी।
कौरव कुल विध्वंस हुआ रण, जीत गये थे पांड़व,
विजय कोई आसान नहीं थी, मचा भयंकर तांडव।
खैर जीत तो जीत भले ही, राह चुनी कैसी भी,
विजय पताका लहर रही थी, रक्त रंगी जैसी भी।
सजा हुआ दरबार सभासद, मदमय नेत्र चलाते,
विरुदावली गा भाट गर्व से, फूले नहीं समाते।
मध्य भाग के पास सजा था, स्वर्ण रजत सिंहासन,
शोभित था माणिक मोती से,रण नायक का आसन।
कृष्ण पार्श्व में धर्मराज थे, पांडव कुल अधिनायक,
नियत जगह आसीन बंधुजन,पांड़व वंश सहायक।
तुमुलघोष के साथ बंदिजन, वंश बेल बतलाते,
शंखनाद सुन अम्बर-अवनी, मन ही मन हर्षाते।
सबसे पा आशीष युधिष्ठिर, केशव सम्मुख बोले,
राजधर्म मर्यादा क्या है ?, धर्मनीति सब खोले।
केशव सुन ये धर्मराज से, मन ही मन हर्षाये।
कर प्रणाम पांड़व कुल दिनकर, गदगद हो मुस्काये।
धर्मराज! ये प्रश्न नीतिगत, जो तुमने पूछे है,
ये राजा के प्रथम नियम है, जो तुमको सूझे है।
इन सारे प्रश्नों के उत्तर, एक जगह पाओगे,
पूर्ण समर्पित होकर जब तुम,भीष्म शरण जाओगे।
उठा धर्मसुत शीश नवाया, सर्वप्रथम केशव को,
माँ चरणों में शीश झुकाया, इसके बाद विदुर को।
आज्ञा ले सब सभासदों से, रथ आरूढ़ हुए है,
राजधर्म मर्यादा पाने, उत्सुक पूर्ण हुए है।
उधर, पितामह भीष्म उनींदें, शरशय्या के आसन,
जिनके बल पौरुष के आगे, थर्राते सिंहासन।
दिनकर की आभा है तन पर,शशि सदृश्य शीतलता,
रजत केश अध खुले नेत्र पट ,देख काल था डरता।
आज विवश हो पड़े हुए है,कांटो के आसन पर,
जिनके रहते आँख उठी ना,कौरव कुल शासन पर।
विटप घनेरा दूर एक था , धर्मराज रथ ठहरा,
उतर बढ़े चुपचाप युधिष्ठिर,मन विषाद भर गहरा।
नेत्र धरा की ओर ताकते, अविरल टपक रहे थे,
शरशय्या पर देख भीष्म को,अतिशय बिलख रहे थे।
पद समीप जा धर्मराज ने, अपना शीश झुकाया,
साष्टांग गिर पड़े युधिष्ठिर, अपना नाम बताया।
कौन? भीष्म ने धर्मराज को, नहीं यहां पहचाना,
कहा दास ने धर्मराज है,सुना पांडु सुत आना।
राजन आप! प्रणाम किया फिर, अपना हाथ उठाया,
दे आशीष पितामह ने फिर, अपने पास बिठाया।
पूछ कुशलमंगल सब जन की,अनवरत प्यार लुटाया,
केशव का ले नाम भीष्म ने ,अपना शीश झुकाया।
कहो युधिष्ठिर आने के सब, कारण मुझे बताओ,
समय नहीं अब अधिक पास जो, लेना है ले जाओ।
कहा युधिष्ठिर शीश झुकाकर,बैठ भीष्म के सम्मुख,
राजधर्म का पाठ पढ़ाओ, न धर्म नीति हो विमुख।
सुनो धैर्य के साथ युधिष्ठिर, राजधर्म कहता हूँ,
धर्म नीति मर्यादा नृप की, आज तुम्हे देता हूँ।
राजधर्म का प्रथम नियम है,निज कर्तंव्य निभाना,
धर्म जाति कुल वंश देख कर , नहीं भेद अपनाना।
सदा ईश विश्वास धर्मरत, नेक राह पर चलना,
अहंकार छल कपट भाव से, रिक्त सदा ही रहना।
तुम ईश्वर के निमित मात्र हो, इसे भूल मत जाना,
प्रेम समर्पण ईश चरण रत,व सदा आस्तिक रहना।
देखो, युधिष्ठिर कभी महिपति, क्रूर नहीं होता है,
सदा विनम्र उदार भाव से, नृप शासन करता है।
निज वैभव निज खर्च हेतु ले,कर संग्रह मत करना,
देश काल निज प्रजा भलाई, मर्यादित कर लेना।
रहे सदा मृदुभाषी भूपति, जनक रहे निज बालक,
करे सदा संवाद प्रजाहित,बने प्रजा हित पालक।
सदा रहे आरूढ़ अश्व पृष्ठ, नेत्र चपल चंचल हो,
शूरवीर रणवीर कुशल रण, निर्णय बीच अटल हो।
दानशील गुणवान निपुण सब,न्याय ज्ञान कौशल में,
कला गीत विज्ञान साहित्य, निड़र साहसी बल में।
दानशील नृप सदा पात्र को, देख दान देता है,
सुनो वीर धर्मराज भूपति,दान नहीं लेता है।
थाम युधिष्ठिर हाथ भीष्म कर , बोले सुनो युधिष्ठिर,
नृप बलवान साहसी प्रियजन,कभी न हो नृप निष्ठुर।
नृप विश्वास जगाये निज जन, राष्ट्रद्रोही थर्राये,
करे राष्ट्र के साथ द्रोह जो, दंड कठोर सुनाये।
दुष्ट मिलन आघात क्षति निज,नृप विनाश होता है,
कुल कलंक मर्यादा खो नृप, निज गौरव खोता है।
राष्ट्रभक्त दे प्राण देशहित, ऐसे जन तुम चुनना,
निज रक्षा पर राष्ट्रसुरक्षा , उचित प्रबंधन करना।
आँख टिकी हो राष्ट्र रेख पर,पल को ना ओझल हो,
शर संधान शत्रु से पहले ,तरकस बाण प्रबल हो।
कुटिल दुष्ट मशखरा नीच को, गुप्तचर मत बनाना,
प्रजा कष्ट दे स्वार्थ साध निज, मंत्री मत अपनाना।
कान ध्यान दे सुनो धर्मसुत,सदा श्रेष्ठ वह नृप है,
कर्म वीर का साथ सदा दे, राज्य वही समृद्ध है।
निज पुरुषार्थ साधने खातिर, दुष्ट संग जो लेता,
दुर्योधन सा नष्ट समूल व, निज कुल गौरव खोता।
न्याय सदा दे धैर्य संग रख,उचित विवेकी होकर,
न्याय सदा सिद्धांत समाहित, ना आवेशित होकर।
दंड सदा अपराध देखकर ,उचित प्रबंधन करना,
क्षणिक वेग में आ कौन्तेय न,प्राण सुजन के हरना।
गुप्त बात को कभी भूल कर, भी मुँह पर मत लाना,
प्राण देह पर्याय भार्या , को भी मत बतलाना।
हनन अपरिग्रह अस्तेय का, संग्रह कहां उचित है
पर अधिकार हनन कर मानव,नृप तक नहीं धनिक है।
कृतध्न पर विश्वास भूलकर, धर्मराज मत करना,
उपकारी का संग सदा हो ,उसे दूर मत करना।
मिटा शत्रु उल्लास मनाना,तनिक शोक मत करना,
धर्म नीति मर्यादा नाशक, शत्रु इन्हे समझना।
सुनो युधिष्ठिर राजधर्म का, पालन जरा कठिन है,
धर्म विवेकी नीति निपुण को,निश्चित सहज सरल है।
धर्मराज नृप सरल सहृय हो, न्याय निपुण सक्षम हो,
राष्ट्र सदा उन्नत सुरक्षित, प्रजा विकास न कम हो।
राजधर्म का राजनीति का, ये संदेश सुनाया।
हाथ पकड़कर भीष्मपिता ने,सुत को गले लगाया।
किया प्रणाम् युधिष्ठिर नत हो,नेत्र नीर भर आया,
शिरोधार्य कर सब विधान को,अंत विदा ले आया।
परम आदरणीय विद्वान विदुषी गुणीजन साथियों मेरी इस रचना को पढ़कर उचित सुझाव जरूरदेना यह मेरी विनती है आपसे यह मेरी आज तक की सबसे कठिन मेहनत है।



