जब तक राज्य संरचना समावेशी नहीं होगा, तब तक विकास सम्भव नहीं : तेजुलाल चौधरी
मतलब आप महसूस कर रहे हैं कि तराई–मधेश में रहे कांग्रेस का ‘ वोट–बैंक’ खतम हो रहा है ?
हिमालिनी पत्रिका। व्यापार के लिए नेपाल आनेवालों को नागरिकता दिया जाता है, शादी कर आनेवाली बहू को नागरिकता प्राप्ति से रोकनेवाले आप कौन हैं ?
तेजुलाल चौधरी सप्तरी निर्वाचन क्षेत्र नं. ४ से निर्वाचित नेपाली कांग्रेस संबंद्ध सांसद हैं । इतना ही नहीं, शिक्षाविद् तथा काठमांडू उपत्यका स्थित नाइटिंगेल कॉलेज के संस्थापक भी हैं । आपकी मान्यता है कि राजनीति समाजसेवा तथा देशसेवा के लिए है, कमाने (भ्रष्टाचार करने) के लिए नहीं । इसीतरह आप कहते हैं कि देश एवं राज्य संरचना में में एक ही जाति (ब्रम्हणों) की बहुल्यता है, जो हमारे विकास के लिए बाधक है । आप ने कहा कि जब तक राज्य संरचना समावेशी नहीं होगी, तब तक देश में विकास एवं सुशासन संभव नहीं है । ऐसे ही विचार रखनेवाले सांसद् चौधरी जी से हिमालिनी मासिक के लिए लिलानाथ गौतम ने सम–सामयिक राजनीतिक विषयों को लेकर बातचीत की है । प्रस्तुत है– बातचीत का संपादित अंश–

० देश कोरोना वायरस से सृजित परिस्थितियों का सामना कर रहा है । सत्ताधारी दल नेपाल कम्युनिष्ट पार्टी (नेकपा) आन्तरिक राजनीतिक विवादों में फंसी है, जो आम जनता की अपेक्षा नहीं है । प्रतिपक्षी दल संबंद्ध सांसद् के हैसियत से आप इस को किस तरह मूल्यांकन कर रहे हैं ?
– विश्व–तथ्यांक अनुसार लगभग १ करोड़ व्यक्ति कोरोना वायरस से प्रभावित हो चुके हैं, नेपाल में भी १६ हजार से अधिक व्यक्ति वायरस से संक्रमित हैं । जब से पड़ोसी देश चीन से कोरोना वायरस फैलने की सूचना सार्वजनिक हो गई, तब से हम लोगों ने संसद् में अपनी आवाज को बुलंद किया । वायरस के संबंध में गम्भीर होने के लिए विशेष प्रस्ताव भी लाया गया । उसी समय से हम लोगों ने सरकार को कहा था कि कोरोना वायरस के विरुद्ध लड़ने के लिए नेपाल के पास आवश्यक अस्पताल, परीक्षण प्रविधि, औषधीजन्य मेडिकल सामग्री और जनशक्ति नहीं है, पूर्वाधार विहीन होकर हम लोग वायरस से नहीं लड़ सकते । इसीलिए आवश्यक पूर्व तयारी करने के लिए सरकार को बार–बार कहना पड़ा । क्वारेन्टाइन निर्माण, अस्पताल का पूर्वाधार निर्माण, चिकित्सकों के लिए आवश्यक तालीम तथा प्रोत्साहन के लिए हम लोगों ने विशेष जोर दिया, कहा कि संसदीय विकास कोष में जो रकम है, उस को ले–जाकर कोरोना वायरस नियन्त्रण तथा रोकथाम के लिए खर्च कर सकते हैं । लेकिन सरकार ने अनसुनी की । आज आकर सरकार में रहनेवाले लोग कहते हैं कि श्रावण महीना के भीतर नेपाल में कोरोना वायरस से संक्रमितों की संख्या ४०–५० हजार पहुँचने की संभावना है । अगर समय में ही हम लोगों का सुझाव ग्रहण किया होता तो संभवतः ऐसी परिस्थिति नहीं आती ।
हां, सत्ताधारी दल अपने ही पार्टी के अंदर विकसित राजनीतिक लड़ाई में फंस गई है । देश और जनता के पक्ष में जो काम होना चाहिए, वह नहीं हो रहा है । जैसे भी हो, उन लोगों को पद–प्राप्त करना है, इसके लिए ही नेकपा के शीर्ष नेता आपस में झगड़ रहे हैं । यहां तक कि देश के प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली खुद ओझा और तान्त्रिक की तरह पेश आते हैं, कोरोना–सृजित त्रास में रहे जनता को डाक्टर बन कर औषधि सिफारिश कर रहे हैं, जो आम लोगों के बीच मजाक का विषय बन रहा है । मापदण्ड अनुसार क्वारेन्टाइन निर्माण, परीक्षण के लागि आवश्यक कीट की उपलब्धता, आम लोगों के बीच अधिक से कोरोना परीक्षण, विदेश में फंसे गए नागरिकों का उद्धार आज की आवश्यकता है । लेकिन इसकी ओर केन्द्रीत होने के बजाय वे लोग पार्टी की आन्तरिक लड़ाई में व्यस्त हैं ।
० कोरोना वायरस नियन्त्रण के सवाल में हो या भ्रष्टाचार नियन्त्रण के सवाल में, सरकार को खबरदारी करने की जिम्मेदारी तो प्रतिपक्ष में रहे दल नेपाली कांग्रेस की भी है । कई लोगों का मानना है कि प्रतिपक्षी दल सशक्त ना होने के कारण भी सरकार मनमौजी कर रही है । ऐसी आलोचना को आप किस तरह ले रहे हैं ?
– हां, आप के कथन अनुसार सरकार की अकर्मण्यता के विरुद्ध सड़क से लेकर सदन तक आवाज बुलन्द होनी चाहिए थी । लेकिन जनता की अपेक्षा अनुसार ऐसा नहीं हो पा रहा है, यह मुझे भी महसूस हो रहा है । इसमें प्रतिपक्षी दल की हैसियत से हमारी ओर से भी कुछ कमी–कमजोरी रही होगी । जनता की अपेक्षा यह भी हो सकती है कि कांग्रेस में ‘डायनामिक लीडर’ आए, और सड़क से लेकर सदन तक सरकार की अकर्मण्यता के विरुद्ध आवाज बुलंद करें । संभवतः यह सब नहीं हो पा रहा है । जनअपेक्षा संबोधन के लिए अब कांग्रेस को भी खुद की ओर झांकना होगा, कमी–कमजोरियों को सुधारना होगा । तब भी मैं कहता हूं कि कांग्रेस, संसद् में प्रतिपक्षी दल की भूमिका में आज भी क्रियाशील है । जो कर रहा है, हो सकता है कि उसका आवश्यक प्रचार–प्रसार बाजार में नहीं हो रहा है, तब कुछ लोगों को लगता होगा कि कांग्रेस निष्क्रिय हो रही है ।
० सरकार आलोचित है, इसमें कोई आशंका नहीं है । इसीलिए सरकार परिवर्तन की बात भी हो रही है । लेकिन हम लोग आज जिस परिस्थिति में हैं, क्या यह समय सरकार परिवर्तन के लिए उपर्युक्त है ?
– देश और जनता जिस परिस्थितियों गुजर रही है, उसको देखकर सरकार परिवर्तन के लिए बहस करना लगता है कि एक प्रकार का अपराध है । लेकिन सरकार चारों ओर से असफल है, सरकार के विरुद्ध आलोचना तीव्र हो रही है और अन्य कोई योग्य व्यक्ति सरकार में नेतृत्व के लिए आने की संभावना है तो उस को स्वीकार करना ही बेहतर है । संसदीय प्रजातन्त्र में प्रधानमन्त्री को संसद् और पार्टी दोनों की ओर से विश्वास का मत हासिल करना होता है । अगर प्रधानमन्त्री के प्रति पार्टी के भीतर अविश्वास पैदा होता है तो सरकार परिवर्तन स्वाभाविक माना जाता है, यह प्रजातान्त्रिक अभ्यास भी है । अब तो संवैधानिक प्रावधान के अनुसार भी सरकार परिवर्तन के लिए कोई व्यवधान नहीं है ।
० पिछली बार नेपाल में चीनी राजदूत होउ यान्छी की सक्रियता अधिक दिखाई दी । इसको लेकर भी बहस हो रही है । आप इसको किस तरह ले रहे हैं ?
– कूटनीतिक मूल्य–मान्यता को देखते हैं तो यह सक्रियता ठीक नहीं है । नियमानुसार नेपाल सरकार तथा परराष्ट्र मन्त्रालय से अनुमति लेकर ही विदेशी कूटनीतिज्ञ यहां के लोगों से भेटघाट कर सकते हैं । लेकिन यहां ऐसा नहीं हो रहा है । जिसके चलते पूरे विश्व में ही गलत सन्देश प्रवाहित हो रहा है । आन्तरिक राजनीतिक परिस्थिति और पड़ोसी देशों के साथ आवश्यक कूटनीतिक संबंध के दृष्टिकोण से भी नेपाल आज विशेष परिस्थिति में है । परिस्थितिजन्य विशेष पृष्ठभूमि को अनदेखा करते हुए राजदूत यान्छी की सक्रियता जो दिखाई दी, उसके वजह से भी यह विषय अधिक चर्चा–परिचर्चा का विषय बन गया ।
० चीनी हो या भारतीय, अथवा अन्य देश के कूटनीतिज्ञ ही क्यों ना हो, सामान्यतः नेपाल में परराष्ट्र मन्त्रालय को जानकारी किए बिना कई भेटघाट होती रहती है, प्रोटोकल की दृष्टिकोण से कभी–कभार यह बहस का विषय बन जाता है । सच तो यही है न ?
– सवाल भारत अथवा चीन का नहीं है । किसी भी देशों के राजदूत और विदेशी प्रतिनिधियों के साथ यहां के राजनीतिक तथा प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भेंटवार्ता होती है तो कूटनीतिक मर्यादा को भी देखना जरूरी है । पिछली बार चीनी राजदूत के साथ हो रहे सत्ताधारी दल संबंद्ध नेताओं की भेट–वार्ता कूटनीतिक मर्यादा से बाहर है, जो ठीक नहीं है ।
० सरकार द्वारा प्रस्तुत नागरिकता ऐन संशोधन विधेयक को लेकर भी पक्ष और विपक्ष में बहस जारी है । विशेषतः तराई–मधेश से प्रतिनिधित्व करनेवाले लोग इसके विरोध में अधिक दिखाई दे रहे हैं । संभवतः आप भी विरुद्ध में हैं । क्यों ?
– नागरिकता संबंधी विषयों को लेकर तराई, पहाड़ हिमाल का बात करना ठीक नहीं है । मुख्य सवाल– नेपाल में रहनेवाले नेपाली नागरिकों को नागरिकता मिलती है या नहीं ? नागरिकता किस के लिए लिया अथवा दिया जाता है ? यह मूल सवाल है । इतिहास को देखे तो नेपाल में वि.सं. २००९ साल से नागरिकता देने का प्रचलन है । उसके बाद ‘नागरिकता’ ही इस देश का नागरिक होने की पहचान है । इसीलिए नेपाल में स्थायी रूप से रहने वाला कोई भी व्यक्ति ‘अनागरिक’ ना रहे, वह चाहे हिमाल का हो या पहाड़ या तराई का । हमारी मान्यता यही है । प्रचलित कानून और व्यवहारिक मूल्य–मान्यताओं से अगर कोई व्यक्ति नेपाल के नागरिक हैं तो उसको ‘नागरिकता’ से वञ्चित करना ठीक नहीं है । अब बात करें अंगीकृत नागरिकता की । आज का युग ग्लोबलाइजेशन का युग है । भारत, चीन, बंगलादेश या अमेरिका के नागरिक ही क्यों ना हो, उन लोगों की शादी नेपाली नागरिक से होने की संभावना हरदम रहती है । हां, भारत–नेपाल के बीच भाषा, धर्म और संस्कृति के बीच समानता है । इसीलिए तुलनात्मक रूप में नेपाल–भारत के बीच होनेवाला वैवाहिक सम्बन्ध अधिक होना स्वाभाविक है । पितृसत्तात्मक सामाजिक मूल्य–मान्यता अनुसार विवाहित महिला का घर वही है, जो पुरुष का है । इसीलिए नेपाल में शादी कर आनेवाली विदेशी बहू को नागरिकता सहज प्राप्त होना जरुरी है । नागरिकता प्राप्ति के लिए ७ सालों का प्रावधान मान्य नहीं है । मानवीय मूल्य–मान्यता विरुद्ध सरकार ने जो नागरिकता ऐन संशोधन विधेयक लाया है, उसका विरोध होना स्वभाविक है । प्रस्तावित ऐन तो संवैधानिक अधिकार के विरुद्ध भी है । अगर सरकार के पास हिम्मत है तो ऐसा प्रावधान लाए ताकि विदेशी नागरिकों से शादी–ब्याह ही ना हो सके । नहीं तो नागरिकता प्राप्ति के लिए ७ साल की प्रावधान स्वीकार्य नहीं हो सकता ।
० विदेशी नागरिकों को नागरिकता प्रदान करने के लिए अन्य देशों में जो प्रावधान है, उस का अभ्यास (नकल) भी ठीक ही है, इस तरह आप लोग क्यों नहीं सोचते हैं ?
– हां, अन्य देशों में अलग–अलग प्रावधान हो सकता है । भारत में या चीन में जो प्रावधान है, वही प्रावधान नेपाल के लिए क्यों आवश्यक पड़ा ? विगत दिनों यहां जिसतरह नागरिकता दी जाती थी, उसके अनुसार प्रदान करने से क्या फरक पड़ने वाला है ? यहां मैं एक स्मरणीय बात करना चाहता हूं– आज भी तराई–मधेश में रहनेवाले बहुसंख्यक लोग समानता की अनुभूति नहीं कर पा रहे हैं । समान अधिकार प्राप्ति के लिए बार–बार आन्दोलन की बात होती रहती है । मैं थारु समुदाय से हूं, थारु समुदाय के लोग भी समान अधिकार प्राप्त से वंचित हैं, यह वास्तविकता है । फिर नागरिकता विधेयक लाकर एक और विभेद का वातावरण बनाया जा रहा है । यह स्वीकार्य नही है । हां, विदेशी नागरिकों को नेपाली नागरिकता नहीं मिलना चाहिए, इसमें मैं भी सहमत हूं । लेकिन हमारी सामाजिक मूल्य–मान्यता और व्यवहारिक दृष्टिकोण से शादी कर आनेवाली बहू क्या विदेशी नागरिक है ? इसीलिए वैवाहिक सम्बन्ध के हक में यह बात लागू नहीं हो सकती । स्मरणीय बात यह भी है कि वि.सं. २०६२–६३ साल में सम्पन्न जनआन्दोलन के बाद नेपाल में लगभग २५ लाख नागरिकता बांटी गयी । उसमें से १३ लाख आस–पास पहाड़ में और १२ लाख के आस–पास तराई में वितरित है । गृह मन्त्रालय के तथ्यांक अनुसार आज तक ३ लाख आस–पास के नागरिकों को ही अंगीकृत नागरिकता प्राप्त है । लेकिन नागरिकता के संबंध में यहां गलत प्रचार–प्रसार हो रहा है । वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता के संबंध में बहस करना है या विदेशी नागरिकों को प्राप्त नेपाली नागरिकता के सवाल में ? आप को इसकी ओर देखना होगा । यहां पैसा लेकर विदेशी नागरिकों को नेपाली नागरिकता दिया जाता है । लेकिन प्रश्न तराई–मधेश में रहनेवाले मधेशी और थारु के ऊपर किया जाता है । इसतरह की ढोंगी परम्परा का अब अंत होना चाहिए ।
मैं दावे के साथ कहता हूं कि वि.सं. २०६२–६३ के बाद वितरित नागरिकता में से बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जो विदेशी हैं । वे लोग पहाड़ में रहनेवाले भी है, तराई में रहनेवाले भी । सबसे पहले उसकी छानबीन की जाए, उसके लिए आयोग बनाया जाए । यह सब करने के लिए क्या सरकार के पास हिम्मत है ? मैं खुली चुनौती के साथ कहता हूं– मेरे ही गाँवपालिका में नेपाली नागरिकता लेनेवाले विदेशी नागरिक हैं । अन्य गांव और शहर में भी हो सकते हैं । नेपाल में व्यापार–व्यवसाय के लिए आनेवाले विदेशी नागरिकों ने नेपाली नागरिकता प्राप्त किया है, उनमें से कई लोगों के पास तो दोनों देशों की नागरिकता है । ऐसे लोग पहले अकेले आते हैं, जब व्यापार–व्यवसाय में तरक्की होती है तो पूरा परिवार लेकर आते हैं, उन लोगों को सहज ही नागरिकता मिलती है । राजनीतिक क्षेत्र में भी ऐसे लोग हैं । मैं मेर ेही जिला सप्तरी का उदाहरण पेश करता हूं, जहां वडाध्यक्ष में निर्वाचित एक जनप्रतिनिधि भारतीय नागरिक हैं, उनके बारे में स्थानीयबासी सब–कुछ जानते हैं । ऐसे लोगों की नागरिकता खारिज करने के बदले शादी कर आनेवाली बहू के ऊपर प्रश्न करने का अधिकार आप को नहीं है ।
० संशोधित ऐन के अनुसार नागरिकता प्राप्त करने से पहले ‘स्थायी आवासीय परिचयपत्र’ देने का प्रावधान है । क्या उसे काम चलनेवाला नहीं है ?
– अच्छी तरह गीत गानेवाले व्यक्ति हम लोग दार्जिलिङ से लाते हैं और उनको नागरिकता देते हैं । लेकिन शादी कर आनेवाली महिला को आवासीय परिचयपत्र ? आवासीय परिचयपत्र में राजनीतिक अधिकार है ? क्या उस परिचयपत्र से उनको सरकारी नौकरी करने का अधिकार है ? गीत गाने की क्षमतावाले को नागरिकता मिलती है तो शादी कर आनेवाले में लोकसेवा पास करने की क्षमता है तो उसको वंचित क्यों किया जाता है ? इसीलिए शादी कर आनेवाले को नागरिकता ना देना और निश्चित अवधि निर्धारण करना ठीक नहीं है । हां, अगर किसी का आचरण गलत है, देश के विरुद्ध काम करता है, आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है तो उस की नागरिकता खारिज का प्रावधान रख सकते हैं, लेकिन आम आदमी को नागरिकता से वंचित करना ठीक नहीं है । दूसरी बात, किसी के पास दोनों देशों की नागरिकता ना हो, इसके प्रति भी सजगता अपनानी चाहिए ।
० अब आप की पार्टी नेपाली कांग्रेस की बात करें । कुछ सालों से राजनीति में बहस हो रही है कि अब पुरानी पीढ़ी के नेताओं से नेपाल में परिवर्तन संभव नहीं है । नेपाली कांग्रेस ने १४वें महाधिवेशन की तिथि तय की है । ऐसी पृष्ठभूमि में नेपाली कांग्रेस में भावी नेतृत्व नयी पीढ़ी से होने की संभावना कितनी है ?
– तत्काल नेपाली कांग्रेस के भीतर यह संभव नहीं है । दूसरी बात, नयी पीढ़ी किस को कहा जाए ? क्या जो एक बार भी सभापति नहीं बने हैं, उसको ? या उम्र के हिसाब से ! उम्र की दृष्टिकोण से देखते हैं तो नेपाली कांग्रेस में जो भी संभावित भावी नेतृत्व हैं, वह सब ६० साल से अधिक उम्रवाले हैं । इसीलिए नयी पीढ़ी कौन है ? इस में भी अलग बहस आवश्यक है ।
० वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन होने की संभावना कितनी है ?
– हां, वर्तमान नेतृत्व परिवर्तन की संभावना तो अधिक है । आज के नेतृत्व प्रति बहुसंख्यक कार्यकर्ता सन्तुष्ट नहीं हैं । इसीलिए मेरी व्यक्तिगत मान्यता भी है कि आज के नेतृत्व में परिवर्तन आवश्यक है ।
० आगामी महाधिवेशन में आप भी पार्टी के अन्दर किसी पद के लिए प्रतिस्पर्धी हैं ?
– पिछले महाधिवेशन में केन्द्रीय सदस्यता के लिए मैं प्रतिस्पर्धी रहा । लेकिन दुर्भाग्य ! जीत हासिल नहीं हो सकी । सप्तरी तराई–मधेश का जिला है, यहां मधेशी–थारु–मुस्लिम की बाहुल्यता अधिक है । अगर यहां से कोई प्रतिनिधि चयनित होते हैं तो उसी समुदाय से होना चाहिए था । लेकिन कांग्रेसी मित्रों ने पहाड़ी समुदाय के ही दो मित्रों को चुनाव में विजयी बना दिया । यह हमारे लिए दुर्भाग्य की बात है । इस बार भी मैं कम से कम केन्द्रीय सदस्य के लिए प्रतिस्पर्धी हूं, अगर माहौल बन जाता है तो उससे आगे के लिए भी सोच रहा हूं ।
० आप ने समानुपातिक–समावेशी प्रतिनिधित्व के ऊपर सवाल उठाया । राजनीति में बहस होती है कि राज्य–संरचना में समानुपातिक–समावेशी प्रतिनिधित्व होना चाहिए । लेकिन पार्टी के भीतर ही ऐसा नियम लागू नहीं हो रहा है । यह तो सच है न ?
– हां, यह विडम्बनापूर्ण है । नेपाली कांग्रेस हो या अन्य पार्टी, सभी ने भाषण में और लिखित दस्तावेजों में समानुपातिक–समावेशी प्रतिनिधित्व को स्वीकार किया है । लेकिन व्यवहार में और नेताओं के चरित्र में सभी पार्टी के अन्दर समस्या है । इस बार नेपाली कांग्रेस क्या करती है, देखना है । दूसरी बात, तराई–मधेश कांग्रेस के लिए ‘वोट–बैंक’ भी है । अगर कांग्रेस को अपना ‘वोट–बैंक’ को सुरक्षित रखना है तो यहां रहनेवाले जनता की भावना और प्रतिनिधित्व को भी हृदय से स्वीकार करना होगा । नहीं तो मैं दावे के साथ कहता हूं, नेपाली कांग्रेस अब कभी भी प्रथम पार्टी के रूप में आनेवाली नहीं है ।
० मतलब आप महसूस कर रहे हैं कि तराई–मधेश में रहे कांग्रेस का ‘ वोट–बैंक’ खतम हो रहा है ?
– खतम नहीं हुआ है । आज भी हमारे ‘वोट–बैंक’ सुरक्षित है, उसको वापस कर सकते हैं । हां, चुनाव में कांग्रेस कमजोर दिखाई दी । पार्टी में जो नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं, उन लोगों की गलत नीति और व्यवहार के कारण ऐसा हुआ है । मैं भी कांग्रेस में हूं, इसीलिए मेरी भी कुछ गलतियां हो सकती है । लेकिन तराई के निवासी बहुसंख्यक जनता आज भी नेपाली कांग्रेस के प्रति आस्थावान हैं, वे लोग सही नेतृत्व की प्रतीक्षा में हैं, अपने प्रतिनिधि में अपना चेहरा देखना चाहते हैं । लेकिन जब उन लोगों को नेतृत्व प्रदान करनेवाले व्यक्ति बाहर के होते हैं तो उन लोगों का मनोविज्ञान बदल जाता है, उसी का परिणाम आज हम लोग भुगत रहे हैं । अब कांग्रेस को पुरानी मानसिकता और चिन्तन में परिवर्तन लाना आवश्यक है ।
० समावेशी–समानुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए ही अधिक आन्दोलन करनेवाली शक्ति आज प्रदेश नं. २ में सरकार में नेतृत्व प्रदान कर रही है । लेकिन आलोचना हो रही है कि वही सरकार की संरचना समावेशी चरित्र का नही है । इससे स्पष्ट होता है कि भाषण–बाजी में अब्बल नेता और पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनने से राज्य–संरचना समावेशी नहीं हो सकता । राज्य–संरचना में हो या पार्टी–संचरना, समावेशी–समानुपातिक सिद्धान्त कार्यान्वयन के लिए नेताओं के चरित्र में सुधार आवश्यक है कि नहीं ?
– आप ने ठीक कहा, आज की समस्या भी यही है । कहते हैं कि मैं समाज और देश को परिवर्तन करने के लिए राजनीति में हूं । लेकिन चिन्तन और व्यवहार परम्परागत रहता है । ऐसे लोगों से परिवर्तन संभव नहीं है । प्रदेश नं. २ की अवस्था भी यही है । समावेशी सिद्धान्त की बात हो या विकास निर्माण का सवाल । प्रदेश नं. २ सरकार खुद को सिद्ध करने में असफल है । यहां तक कि प्रदेश नं. २ के कुछ मन्त्रियों को देखता हूं तो मुझे खुद शरम आती है । इसीलिए भाषण–बाजी और लिखित दस्तावेज से समाज परिवर्तन संभव नहीं है, सबसे पहले पहले खुद को परिवर्तन करना आवश्यक है ।
० अन्त में, आप शिक्षा क्षेत्र से जुड़े हुए व्यक्तित्व भी हैं । निजी स्कूल–कॉलेज संचालन करते हैं । जारी लकडाउन का प्रभाव शिक्षा क्षेत्र में किस तरह पड़ रहा है ?
–यातायात और शिक्षा क्षेत्र ही आज सबसे अधिक प्रभावित है । शिक्षा क्षेत्र की बात करें तो कुछ निजी शिक्षालयों ने भर्चुअल क्लास भी संचालन किया है । लेकिन अधिकांश स्कूल नहीं कर पा रहे हैं । सभी विद्यार्थियों की पहुँच में इन्टरनेट सुविधा भी नहीं है । व्यक्तिगत बात करें तो मेरे शिक्षालय से आबद्ध लगभग ८० प्रतिशत विद्यार्थी भर्चुअल क्लास में सहभागी हैं । सच है कि नेपाल के सन्दर्भ में भर्चुअल क्लास अधिक प्रभावकारी नहीं है, तब भी हम लोग अपनी क्षमता के अनुसार कर रहे हैं । दूसरी बात, निजी शिक्षालय संचालक अपने कर्मचारी को पारिश्रमिक नहीं दे पा रहे हैं । मैं खुद अपना उदाहरण पेश करता हू– मेरे यहां ३०–४० गाडि़यां हैं,उनके चालक और सह–चालक हैं । मैं उन लोगों को कब तक बिना–काम पारिश्रमिक दे सकता हूं ? ऑनलाइन क्लास सञ्चालन करनेवाले कुछ शिक्षकों को तो आजतक दे रहा हूं । लेकिन यह भी अब मुश्किल हो रहा है । मैं कहां से लाकर उन लोगों को पारिश्रमिक प्रदान करूँ ? सरकार कहती है कि अभिभावकों से फीस वसूल ना करें । हां, तत्काल बहुसंख्यक अभिभावक अपने बच्चों की फीस देने के लिए असमर्थ हो सकते हैं । लेकिन कुछ ऐसे भी अभिभावक हैं, जो देने के लिए राजी हैं और सक्षम भी हैं । हम लोग कहते हैं कि ऐसे अभिभावक से फीस लेने की अनुमति दी जाए । नहीं तो राज्य की ओर से हम लोगों को राहत प्याकेज घोषणा होनी चाहिए ।
प्रस्तुति लीलानाथ गौतम

