यदि बचाना है खुद को, छोड़ना होगा कवच में जकड़ा वजूद अपना : रश्मि
जिंदगी ने जो दिया
रश्मि
नहीं ढो सकती अब मैं
जमाने की दी हुई तल्खी
नदी की तरह मुहाने पर
उगल देना चाहती हूँ
वह सब
जिंदगी ने जो दिया तिल तिल कर
समंदर तक ना ले जा सकूँ शायद
नहीं उडेलना उसमें जमाने का दिया गम
बस लौटा देना है तट पर
वह सब कुछ उसी के हवाले
यदि बचाना है खुद को
छोड़ना होगा कवच में जकड़ा वजूद अपना।


