पायल को जंजीर बनाकर , बाँधी मेरे पैरों की थिरकन : निशा अग्रवाल
अब मैं चुप रह ना सकूँगी
अभी अभी तो स्वर पाए हैं मैंने
कोयल बन सीखा है कूकना,
अब मैं गाऊँगी उच्च स्वर में
अब कंठ में स्वर थाम न सकूँगी
हाँ, अब मैं चुप रह न सकूँगी।।
पायल को जंजीर बनाकर ,
बाँधी मेरे पैरों की थिरकन,
कर लो सितम लगा लो जोर
अब तेरे इशारों पर नहीं
मन की थिरकन पर नाचूँगी
हाँ, अब मैं चुप रह न सकूँगी।।
नजरों का ताव जब सह न सके,
लाज का घूँघट उढा दिया ।
डाल के मेरे मुख पर पर्दा ,
नजरों को झुकना सीखा दिया।
उड़ा गयी हर घूँघट को
क्या हवा चली ये मस्तानी
नजरें मेरी भी अब तकती हैं,
वो दूर ऊँचाइयाँ आसमानी ।
विस्तृत अम्बर की झोली से
मैं अपना हिस्सा अब ले लूँगी
हाँ, अब मैं चुप रह न सकूँगी ।।
मैं भी तो परिंदा तुझ सा ही,
मैं भी चाहूँ भरना उड़ान ।
युगों से हूँ पिंजडे़ में कैद,
तोड़ी सलाखें, हुई लहुलूहान ।
क्यूँ कि……
अब मेरे ‘पर’ खुलने लगे हैं,
अरमानों की उड़ान भरने लगे हैं ।
अब कोई बंधन सह न सकूँगी
हाँ, अब मैं चुप रह न सकूँगी ।।

धरान

